Hindi Opinion Philosophy Poem Poetry Social Values and Norms

पुरुष और नारी

FacebookTwitterGoogleLinkedIn


जमाने का रंग बदलता है,

दुनियां का रंग बदलता नहीं

आदमी की मांग बदलती है,

इंसानियत की मांग बदलती नहीं

धर्म की ध्वनि बदलती है,

मर्म की वाणी बदलती नहीं

विचार की पद्धति बदलती है,

आचार की नीति बदलती नहीं

भाव की भंगिमा बदलती है,

स्वभाव की भित्ति बदलती नहीं

अनुभव की बुद्धि बदलती है,

अनुभूति की दृष्टि बदलती नहीं

जीवन की वृत्ति बदलती है,

मन की वृत्ति बदलती नहीं

समाज के पहलू बदलते हें

जिंदगी की आरजू बदलती नहीं

 

आज युद्ध का हथियार

न तीर है न तरकस,

पर युद्ध की तह में

जो लोभ और क्षोभ हैं

वे न बदले हैं और न बदलेंगे

हमारी भावनाओं के नेपथ्य में

विरोधी वृत्तियों के सनातन

द्वंद के पैंतेरे

न जाने कब से चल रहे हैं

और कब तक चलते रहेंगे

यही सनातन तनातनी तो

जीवन का ताना बना है

हमारा हंसना और रोना

जो तब था वो आज भी है

मगर हां लुत्फ यह है कि

जीवन पर उसकी प्रतिच्छवि के

करिश्मे चिरनवीन हैं, चिरंगीन हैं

 

जवानी के हौसलों की

चकाचौंध में,

सत्य की पहचान में

भूल कर बैठने से अक्सर

जिंदगी की बाजी

खत्म हो जाती है

आखिर अपनी सत्ता के कितने

पहलुओं से हम परिचित हैं?

हमारी चेतना के अंतराल में

कितनी चुटीली वृत्तियां

घूँघट की ओट हैं?

 

क्या बात है कि बचपन का परहेजगार

अपनी बेखुदी के आलम में

बैठ रस की रंगीनियों पर

अपने होंठ चाटता है

जो बाहर से है उदासीन

वह भीतर से लवलीन क्यों हैं?

क्या मन का राग,

विचार और संकोच की

चपकलिश में पड़कर

विराग का नकाब पहने

दुनियां के सामने आता है?

क्या हम से भी चुराकर

हमारी प्रवृत्ति

किसी कामना की नागिन को

अपने आस्तीन में पाल

जवान कर लेती है?

 

एक दिन जब भूखी प्रवृत्ति की

उलंग लालसा

कर्तव्य की कठोर तीलियों पर

तड़फ़ड़ा कर

तावड़ तोड़ सर फोड़ती है

तो इस विप्लव की चमक से

इंसानियत की तमाम

कीलें हिल उठती हैं

 

दिल का यह जलजला शायद

पुरुष पर कुछ और रंग लाता है,

नारी पर कुछ और रंग लाता है

वह त्याग की तपिश में पड़

मानवता का गोमुख बनकर फूटे

या अन्दर ही अन्दर उबल कर

ज्वालामुखी की तरह

फुफकारता हुआ फूट पड़े

कोई तो प्रतिक्रिया होगी

और परिस्थिति के अनुकूल होगी

 

जो आधार अमिट है

उसे नारी की प्रकृति सर नवाकर

आँचल के तले सहेज लेती है

पुरुष उस प्रलय को

पी नहीं पाता

उसके गले से उतरा नहीं

कि छाती में आग लग जाती है

संभव है कि होश रहते वह

उस शोले की लौ को

जवान तक न उठने दे

पर नारी तो जान रहते उसे

आँखों के आइने  तक भी

झांकने नहीं देती है

 

नारी की प्रवृत्ति के तले बैठी है

विश्व की चिरंतन नारी,

त्याग और सेवा की

सहज वृत्ति की नारी

पुरुष में यह प्रेरणा शायद उसकी

महत्वकांक्षा की तह से फूटती है

इसलिए वह आदर्श की

ऊँचाई छूने को बड़ी सरगर्मी से

झपट कर उठती है,

पर चोटी की तपस्या पर

टिक नहीं पाती है

Leave a Reply


Your email address will not be published. Required fields are marked *