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पुरुष मानसिकता और नारी (भाग-२)

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मैं बड़े आदर के साथ पूछना चाहता हूँ की जो प्रिंट,इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया अब तक भारत की छवि को दुनियाँ भर में महानता की बुलंदियों तक पहुँचा रहा था वह आज अचानक भारत की सच्चाई का आइना दिखाने पर देश की छवि को धूमिल करने वाला कैसे हो गया| वास्तव में मीडिया का कर्तव्य दुनियाँ में अच्छाई व बुराई की सच्चाई को ईमानदारी से समाज के सामने प्रस्तुत करना ही है| फिर यह समाज को चलाने वालों के ऊपर है की वे किस तरह से उसे सोचते हैं और कैसे उनका सदुपयोग अथवा दुरुपयोग करते हैं|

जहाँ तक मैं अपनी बुद्धि से समझ पाया हूँ पुरुष वर्ग द्वारा स्त्रियों के प्रति दुर्व्यवहार, अत्याचार, व बलात्कार जैसी घटनाओं के लिए पुरुष वर्ग की मानसिकता ही ज़िम्मेदार है जो उसे विरासत में मिली है| धनबल, शक्तिबल, अभिमान, सम्मान, दूसरों को नीचा दिखाना, बदला लेना और कभी-कभी वंशवृद्धि इस प्रकार की घटनाओं और पुरुष वर्ग द्वारा नारी के शोषण का मुख्य कारण हैं| इस बीमारी के फैलने पर हम कभी-कभी इसे दबाने का प्रयास करते हैं लेकिन उसके कारणों की जड़ तक पहुँच कर उसे समूल नष्ट करने का प्रयत्न नहीं करते हैं| परिणाम स्वरूप यह बीमारी समयानुसार कम या अधिक मात्रा में प्राचीन काल से लेकर अब तक चली आ रही है| निश्चित ही इस प्रकार की बीमारी की जड़ पुरुष वर्ग की मानसिकता व उसके द्वारा बनाए गये सामाजिक नियम व क़ानून ही हैं जिन पर विचार करने की आवश्यकता है|

पुरुष वर्ग की इस प्रकार की मानसिकता को समझने के लिए हमें प्रारंभ से समाज का अध्ययन करना होगा क्योंकि यह बुराई अभी की नहीं है बल्कि हज़ारों वर्षों से, पुरुष सत्ता कायम होने के समय से ही समाज में चली आ रही है| इसे समझने के लिए हमें समाज व्यवस्था चलाने वाले विधानों और शास्त्रों का अध्ययन करना होगा जिन्हें हम बड़े आदर के साथ धर्म-शास्त्र भी कहते हैं|

समाज में नारी को हमेशा पुरुष की संपत्ति, विषय वासना और भोग की वस्तु समझा गया है| उसे वंश वृद्धि का साधन बताया गया है| पति को परमेश्वर का स्थान देते हुए आजीवन उसकी सेवा करना, उसकी आज्ञा मानना ही नारी का कर्तव्य व धर्म माना गया| नारी को पुरुष के अधीन रहकर ही जीवन जीना है, वह स्वतंत्र जीवन नहीं जी सकती ऐसे विधान बनाये गये|

हम जिस भारतीय संस्कृति पर गर्व करते हैं जिसमें आर्य धर्म, वर्णाश्रम धर्म अथवा तथाकथित हिंदू धर्म की श्रेष्ठता का बखान करते हैं वास्तव में वे वैसे नहीं हैं| पुरुष तथा स्त्री के यौन व विवाह संबंधी नियम सृष्टि के आरंभ के समय भी इस प्रकार के बताये गये हैं कि– पिता अपनी पुत्री से विवाह कर सकता था| वशिष्ठ ने अपनी पुत्री शतरूपा से विवाह किया था| मनु ने अपनी पुत्री इला से तथा जहनु ने अपनी पुत्री जाहनवी से विवाह किया था| एक भाई अपनी बहिन के साथ विवाह कर सकता था| ब्रह्मा के पुत्र दक्ष ने अपनी बहिन से विवाह कर बच्चे पैदा किये थे| दादा भी अपनी पौत्री से विवाह कर सकता था| दक्ष की एक पुत्री का विवाह ब्रह्मा से हुआ था और उससे नारद का जन्म हुआ था| ऐसे धार्मिक अनुष्ठानों की प्रथा थी जिसमें पुरुष स्त्री के साथ खुले में सबके सामने सहवास कर सकता था| अपनी स्त्रियों को कुछ दिन के लिए भाड़े पर देने की प्रथा थी| उदाहरण के लिए राजा ययाति ने अपनी पुत्री माधवी अपने गुरू गालव को भेंट में दे दी थी| गालव ने माधवी को तीन राजाओं को अलग-अलग अवधि के लिए भाड़े पर दे दिया| उसके बाद उसने उसे विवाह रचाने के लिए विश्वामित्र को दे दिया| वह पुत्र उत्पन्न होने के समय तक उसके साथ रही| उसके बाद गालव ने माधवी को वापस लेकर पुनः उसके पिता ययाति को लौटा दिया|

एक और प्रथा के अनुसार स्त्रियों को संतान उत्पत्ति हेतु सर्वोत्तम पुरुषों को दे दिया जाता था| यह ऐसे लोगों का वर्ग था जो देव कहे जाते थे| यह प्रथा इतने व्यापक रूप से प्रचलित थी की देव लोग इन स्त्रियों के साथ पूर्वास्वादन को अपना आदेशात्मक अधिकार समझने लगे| किसी भी स्त्री का उस समय तक विवाह नहीं हो सकता था जब तक की वह पूर्वास्वादन के अधिकार से तथा देवों के नियंत्रण से मुक्त नहीं कर दी जाती थी| इसे अवदान कहा जाता था| ‘लाज़होम’ अनुष्ठान प्रत्येक हिंदू विवाह में किया जाता है| ‘लाज़होम’ देवों द्वारा स्त्री को पूर्वास्वादन के अधिकार से मुक्त किये जाने का स्मृति चिन्ह है| हिंदू विवाह में सप्तपदी के बिना विवाह को क़ानूनी मान्यता नहीं दी जाती| सप्तपदी का अर्थ है वर का वधू के साथ सात कदम चलना| यह इसलिए आवश्यक था की यदि देव क्षति-पूर्ति से असंतुष्ट हों तो सातवें कदम से पहले दुल्हन पर अपना अधिकार जता सकते थे और विवाह संपन्न नहीं माना जाता| सातवाँ फेरा पूर्ण होने पर ही वधू देवों के अधिकार से मुक्त मानी जाती थी  और तभी वह अपने पति के साथ पत्नी के रूप में रह सकती थी| यह प्रथा आज भी प्रचलित है| विष्णु जो भगवान माने जाते हैं ने भेष बदल कर शंखचूड़ की पत्नी तुलसी के  साथ बलात्कार किया था| शिव द्वारा पार्वती को कहा गया की स्त्रियाँ विषय वासना की जड़ होती हैं| महान आदर्श समझे जाने वाले राम के द्वारा सीताजी की लंका से लौटने पर अग्नि परीक्षा ली गयी तथा उन्हें एक साधारण आदमी के वार्तालाप के आधार पर देश निकाला दे दिया गया था| महाभारत काल में द्रौपदी की इच्छा के विरुद्ध पाँच भाइयों के साथ ब्याह करा देना, युद्धिष्ठिर के द्वारा द्रौपदी को संपत्ति की तरह जुए में दाव पर लगा देना, कृष्ण का अपनी कई पत्नियाँ होने के उपरांत भी सेकड़ों स्त्रियों से रास रचाना और हिंदू मान्यताओं के आधार पर लड़कियों का कन्यादान (वाग्दान) करना आदि सब स्त्री की गुलामी के प्रतीक है |

क्रमशः भाग

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