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बिटकॉइन आखिर है क्या ?

आये दिन कई कंपनियां ‘बिटकॉइन’ के बारे मे बात कर रही हैं। आखिर यह नई मुद्रा प्रणाली है क्या? क्या यह सुरक्षित है? क्या इससे घोटाले मे कमी आएगी? ऐसे कुछ प्रश्न मेरे दिमाग मे आये थे। चूँकि आजकल स्मार्टफ़ोन का ज़माना है, ‘बिटकॉइन’ के लेन-देन के लिए कंपनियों ने कई एप्लीकेशन निकाले हैं। सीधी भाषा मे यदि बात की जाए तो ‘बिटकॉइन’ आभासी मुद्रा है। यानी आप कंप्यूटर के माध्यम से बिटकॉइन यानी ‘वर्चुअल

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International Day of the Girl Child!

Today is International day of the girl child. It’s a day to take a step back and understand the status of gender equality in society. Even after 70 years after independence, India still doesn’t boast of having a high sex ratio. While the Southern state of Kerala registers a satisfactory 1047 females for every 1000 males but  National Capital of Delhi registers a meager 847 females per 1000 males as per the latest National Family

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दिल मछली कांसे की – भाग – ४

दरवाज़े के ठीक सामने वर्जिन मेरी की एक बहुत बड़ी तस्वीर टंग रही थी, जिसका ऑइल पेंट अब इतना धुंधला, इतना हल्का पड़ गया था कि अब उसपे बने चेहरे के भाव देख पाना,पढ़ पाना बहुत ही मुश्किल था| ये आगरा में रुथ का आख़िरी सन्डे था| इसके बाद कौन जाने दुबारा इस चर्च को अब देखना भी हो या नहीं| समय कितना बदल गया है उसने सोचा| इन्हीं वर्जिन मेरी की तस्वीर के साथ

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दिल मछली कांसे की – भाग – ३

कोहरे में डूबी सुबह का सूरज अभी निकला भी नहीं था कि फ़ोन की घंटी बज पड़ी | उसने करवट ले घडी देखी सुबह के छ: बज रहे थे| इतनी सुबह किसका फ़ोन होगा| उसने अलसाई आवाज़ में कहा| “हेलो” “हेलो हनी|” “कैसी हो मॉम? बहुत लो साउंड कर रही हो ” “ हाँ, हॉस्पिटल से फ़ोन कर रही हूँ| बंगलुरु से|” “बंगलुरु से,हॉस्पिटल से??” “हाँ डियाज़ एडमिट है| साल भर से किडनी प्रॉब्लम देने

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दिल मछली कांसे की – भाग – २

घर के पिछली तरफ़ जहाँ रूथ और सोफ़ी का कमरा हुआ करता था उसकी खिड़की से स्कूल का मेन गेट दिखा करता था|उसने खिड़की खोली तो सामने ही स्कूल का बड़ा सा बोर्ड चमक रहा था| कितनी-कितनी बातें रूथ के मन में हलचल सी मचाने लगीं| “ मॉम देखो सोफ़ी आज फिर मेरी स्कर्ट पहन के भाग गयी| अब मैं स्कूल कैसे जाऊँगी?” “तुम उसका स्कर्ट पहन कर चली जाओ रूथ, एक ही साइज़ है

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दिल मछली कांसे की – भाग – १

वो नवम्बर का आखिरी इतवार था, ठंड में लिपटा दिसम्बर की ओर बढ़ता हुआ| इवनिंग मास को खत्म हुए अभी पांच मिनट से कम ही वक़्त हुआ था पर भीड़ मानो एकदम ही कहीं गायब हो गयी थी| रूथ ने कंधे पे पड़ा शॉल खोल के ओढा और रोज़री पर्स के अंदर रख दी| वो चर्च का लॉन पार कर के बाहर निकल ही रही थी कि किसी ने कंधे पर हाथ रख दिया| उसने

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शाहबलूत का पत्ता!!! – भाग – ४

शाहबलूत का पत्ता!! मीलों-मील सूखी घास सड़क के दोनों तरफ़ बड़ी मुस्तैदी से फैली हुई है| इसी के बीच वो दौड़ी चली जा रही है| मृगतृष्णा सी ये घास एक ही बूँद के पड़ने से हरिया जायेगी| मन के विस्तृत बीहड़ में और है ही क्या  सिवाय इस जली-सूखी घास और इस सड़क के| ये सड़क इंतहाई तौर पे सीधी है  और इसकी बुनियाद इतनी टेढ़ी है, इसमें इतनी कज़ी है कि ज़रा दूर ही

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शाहबलूत का पत्ता!!! – भाग – ३

उदासियों के चेहरे कभी बूढ़े नहीं होते ! “लश्कर-बॉम्बे” यादों में झिलमिलाता ये नाम उसे अब भी रातों में जगा जाता था | वही उम्र थी उसकी सत्रह-अठारह साल, इंटर के इम्तिहान दिए थे| कैसी गरम आंधी भरी शाम की रात थी वो उसे आजतक याद है| उसके एक हाथ में सुनार का बटुआ था जिसमें सत्रह सौ रूपये, जीजी की एक चूड़ी और छोटी मामी की दो अंगूठियाँ थीं,और दूसरे हाथ में रतीश का

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शाहबलूत का पत्ता!!! – भाग – २

चिठ्ठियाँ जिंदा लाश होती हैं! धूप का तीखापन, दोपहर की निसंगता और उजाड़ सा अपना अस्तित्व खोता ये छोटा स्टेशन| उसने दायें-बायें सर घुमा के देखा, एक चमकदार चौंध हर ओर पसरा पड़ा था|दूर-दूर तक सिवाय चिमनियों के कुछ और नज़र नहीं आता था| या तो उस चौहद्दी के बाहर हर चीज़ बहुत छोटी है या अब ये चिमनियाँ बहुत ऊंची उठ गयीं हैं| पिछली बार जब आई थी यहाँ तो सात साल पहले आई

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शाहबलूत का पत्ता!!! – भाग – १

प्रेम, युद्ध से पलायित देवताओं का स्वांग भर है! चौमासों की रात, रात की उमस और आकाश में बादल| आकाश का हर हिस्सा आज बादलों से पटा पड़ा था | बूँदें लबालब भरी हुई थीं, इतनी कि कोई एक बूँद भी हिले तो बीच का तारतम्य ही टूट जाये | “आज पानी न पड़े” उसने सोचा | उधर छत पर कोई किसी को कहानी सुना रहा था जिसके टूटे-टूटे शब्द उसके कानों में पड़ रहे

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