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जिस देश में खिलती है सुबहा

जिस देश में खिलती है सुबहा, जिस देश में रंगीं शाम ढले, जिस देश के बागों में कलियाँ , हंसतीं शबनम की बूँद तले, उस देश के हम वाशिंदे हैं I जिस देश की नदियाँ कहती हैं, इंसान की हिम्मत का किस्सा I जिस देश के मैदानों ने सुनी, इंसान की ताकत की गीता I हम रिंद हैं उस मैखाने के, जिसकी मदिरा ये जग पीता, देकर के अमन का पैमाना, इसके साकी ने जग जीता I है फक्र हमें इस गुलशन पर, इसके फूलों में प्यार बसे, जिस देश में खिलती हो सुबहा, जिस देश में रंगीं शाम ढले

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यदि तू विस्तार चाहता है

खुशबू बन उड़ जा यदि तू विस्तार चाहता है I मानव को कर प्यार यदि तू प्यार चाहता है I मोती बन मत बैठ कोष्ठ में, सीपी के जैविक प्रकोष्ठ में, सागर में मिल जा, यदि तू विस्तार चाहता है मानव को कर …… I क्या कहता है अंतर्मन में, शंखनाद बन विचार गगन में, चेतन को बिखरा, यदि तू विस्तार चाहता है मानव को कर …… I मनुज योनी का धर्म समझ ले, जीवन का यह मर्म समझ ले, शांतिदूत बन जा, यदि तू विस्तार चाहता है मानव को कर …… I क्यूँ सिमटा सकुचा बैठा है ? जीवन

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अपने आंसू को टीअारपी के बताशे मत बनने दीजिए मुन्नवर राणा साहब

मुन्नवर राणा साहब ! न्यूज चैनल के टीआरपी के बताशे बनानेवाले लोग आपकी शायरी, मुशायरा के लिए कम सास-बहू सीरियल के मेलोड्रामा पैदा करने की ताकत रखने के लिए ज्यादा याद रखेंगे..आपको शायद यकीं न हो लेकिन आपने पिछले चार-पांच दिनों में न्यूज चैनलों पर जो कुछ भी जिस अंदाज में कहा वो न्यूज चैनलों की डीएनए से हूबहू मेल खाते हैं. चैनल के जिन चेहरे ने साहित्य को बासी और उबाऊ चीज मानकर आज से दस साल पहले ही चलता कर दिया वो हैरत में पड़े होंगे कि इसमे भी ऐसे-ऐसे शख्स मौजूद हैं जो कॉमेडी सर्कस से लेकर सास-बहू

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देवी-देउता के ऐसे खिल्ली नहीं उड़ाते हैं मेरा बच्चा

मां: हैप्पी दशहरा विनीत. माता रानी,शेरोवाली बुतरू के खूब अकिल-बुद्दि दे. विनीत: हैप्पी दशहरा मां.. मां: की हाल है हमर बच्चा, मना लिया दुर्गापूजा ? विनीत: मनाना क्या, खाए दबाकर दोपहर में ठेठाके सोए, अभी जाकर जलेबी खरीदेंगे. तुम्हारे और घर के बाकी बच्चा लोगों के भीतर भी थोड़ा-थोड़ा रावण जिंदा रहे मां, बाकी तो पब्लिक जलाकर राख कर ही रही है. मां: सालभर के परब में कुछ औ नहीं तो रावण के जिंदा रहे के कामना करता है रे पगला.. जे सीता मईया के गृहस्थी उजाड़ दिया. विनीत: तुम तो मेरे ही साथ रामायण देखकर बूढ़ी हुई है मां और मैं जवान.

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चलो इस बार

चलो इस बार कुछ ऐसा भी कर लें I सेहर के वास्ते सूरज को चुन लें I   बोहोत सोये हैं हम गफलत की नींदें, खुली आँखों से भी कुछ खाब बुन लें I   हमारे हाथ में ताकत है सारी, चलो तदबीर को तकदीर कर लें I   हमीं हैं मुल्को मिल्लत की उम्मीदें, एक कोशिश करें सूरत बदल लें I

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मेरे अंदर का रावण

फेसबुक मैसेज बॉक्स और मेल बॉक्स में विजयदशमी के बहुत से संदेश पड़े हुए हैं, जिनमे शुभकामनाओं के साथ एक हिदायत भी दी गई है—अपने अंदर के रावण को मारें। मैसेज पढ़कर शोले फिल्म का डायलॉग याद आ जाता है—ठाकुर साहब आप क्या गब्बर सिंह को बकरी का बच्चा समझते हैं, जिसे कोई भी पकड़ ले। रावण ना हुआ भारतीय क्रिकेट टीम का पेस बॉलर हो गया, जिसे कोई भी ऐरा-गैरा आकर मार जाये। ये देश दूसरो के मामलो में ज़रूरत से ज्यादा जागरूक है। मेरे अंदर कोई मुस्टंडा रावण छुपा बैठा है, इसका पता मुझे नहीं है। मेरी बीवी

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एक बार तो आ जाओ

तेरे दरस के प्यासे नैना, एक झलक दिखला जाओ. मन से तुम्हें पुकारें साईं, एक बार तो आ जाओ. तुम्हें भक्त प्यारे हैं अपने, रखते सबका सदा ख़याल. फिर मुझ पर क्यों कृपा नहीं की ? बस मेरा है यही सवाल. कमी रह गयी कहाँ भक्ति में, इतना तो बतला जाओ. मन से तुम्हें पुकारें साईं, एक बार तो आ जाओ. दीप जलाए जल से तुमने, सबने देखा तेरा कमाल. महामारी को दूर भगाया, आई थी जो बन कर काल. फंसी भंवर में जीवन नैया, आ कर पार लगा जाओ. मन से तुम्हें पुकारें साईं, एक बार तो आ जाओ.

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अबकी बार जनम पाया तो

अबकी बार जनम पाया तो, प्रभु से तुम्हे मांग आऊंगा. नैनों में तस्वीर तुम्हारी, पांओं में ज़जीर पड़ी है. हर ख़त का उत्तर कैसे दूँ ? पहरे पर तक़दीर खड़ी है. कल को राज -ताज बदलेगा. ये सामान -साज बदलेगा. तुम सुनना, संसार सुनेगा. गीत-अगीत सभी गाऊंगा. अबकी बार जनम पाया तो, प्रभु से तुम्हे मांग आऊंगा. तुम मेरी हर सच्चाई को, कवि का पागलपन कहती हो. पर मेरे गीतों से अपना आँचल भरने को कहती हो. ये कैसी है रीति तुम्हारी ? ये कैसी है प्रीति तुम्हारी ? ये अजीब आवरण हटेगा. भेद-अभेद जान जाऊंगा. अबकी बार जनम पाया

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देश की तस्वीर

देश अनेकों जाकर तुमने, भारत की शान बढ़ाई मोदी-मोदी बोल रहे हैं, हर देश में एन०आर०आई लंका में जाकर के मोदी, तुमने पुरानी कथा सुनाई किया राम गुणगान वहाँ पर, रावण की याद दिलाई चन्द क्षणों में किया फ़ैसला, ऐसे तुम हो संज्ञानी नेपाल में तुरंत रसद पहुँचाई, मालदीव में पानी बुरे वक्त में साथ दिया और मदद करी मनमानी सेना को भी भेजा तुमने, ऐसे हो वीर बलदानी पर मेरे देश की प्यारी जनता, हाय तुम्हारी यही कहानी तरसे बूँद-बूँद को विदर्भ वासी, नहीं मिला उन्हें था पानी भूख से व्याकुल जनता मर गई, नहीं पहुँचा कोई दानी ऐसे थे

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धुंध, धुआं और हिंदी का हुंआ-हुंआ

चारो तरफ धूल, धुंध और धुआं है। आंखें फाड़कर देखो, तब भी कुछ समझ में नहीं आता कि हो क्या रहा है। हिंदी के जंगल में आजकल सिर्फ हुआं-हुआं है। कितना भी सुनने की कोशिश करो कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा है। भाषा, संस्कृति और कला के पहेदारों में आधे गांधी जी के बंदर बन गये हैं। करीब एक चौथाई पाला बदलकर सरकार की गोद में बैठ गये हैं या बैठने की कोशिश कर रहे हैं और जो बाकी बचे हैं, वे हुंआ-हुंआ कर रहे हैं। कोलाहल बढ़ रहा है, लेकिन हिंदी के सपूत क्या कह रहे हैं, किससे

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