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हाले दिल मेरा

कोई मेरे दिल से पूछे ज़रा हाले दिल मेरा I आखों से ले बयाने जिगर थामे दिल मेरा I सपनों की डोरियों से बुना आशियाँ मेरा I फूलों की खुशबुओं से सजा गुलसितां मेरा I तारों की रौशनी से धुला पासबां मेरा I मेरे करीब ही है हंसी आसमाँ मेरा I मिला राहबर कोई तो बना हमनवां मेरा I जो समझे मोहब्बत को वोही हमज़बां मेरा I

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कहाँ जाइएगा आप

खुद से बिछड़ के दूर कहाँ जाइएगा आप, जलती है सुबहो शाम कहाँ जाइएगा आप I   शहरों से मोहोब्बत के निशां मिट रहें हैं रोज़, मंजिल ख़बर नहीं है कहाँ जाइएगा आप I   कांटे बिछे राह में सूरज चढ़ा हुआ, बिन साया नंगे पाँव कहाँ जाइएगा आप I   दुनिया ये नफरतों के शिकंजे में फंसी है, अपनी गली से दूर कहाँ जाइएगा आप I   इक आग सी लगी है मेरे दिल

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केहर के शोले

कैसे बढ़ते हैं हवाओं में केहर के शोले I किसने पाले हैं छिपाए हैं केहर के शोले I   गर्म बाहें वो पनाहें वो दोस्ती का चलन, बुझ गए सारे अलम रह गए फकत शोले I   हमने माना की शुभा है तुम्हे उनपे लेकिन, नफरतें कब से, जमा कब से दिलों में शोले I   उनसे कह दो जो भुला बैठे हैं इमां अपना, उनके दीवान जला देंगे उन्ही के शोले I

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जिस देश में खिलती है सुबहा

जिस देश में खिलती है सुबहा, जिस देश में रंगीं शाम ढले, जिस देश के बागों में कलियाँ , हंसतीं शबनम की बूँद तले, उस देश के हम वाशिंदे हैं I जिस देश की नदियाँ कहती हैं, इंसान की हिम्मत का किस्सा I जिस देश के मैदानों ने सुनी, इंसान की ताकत की गीता I हम रिंद हैं उस मैखाने के, जिसकी मदिरा ये जग पीता, देकर के अमन का पैमाना, इसके साकी ने जग

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यदि तू विस्तार चाहता है

खुशबू बन उड़ जा यदि तू विस्तार चाहता है I मानव को कर प्यार यदि तू प्यार चाहता है I मोती बन मत बैठ कोष्ठ में, सीपी के जैविक प्रकोष्ठ में, सागर में मिल जा, यदि तू विस्तार चाहता है मानव को कर …… I क्या कहता है अंतर्मन में, शंखनाद बन विचार गगन में, चेतन को बिखरा, यदि तू विस्तार चाहता है मानव को कर …… I मनुज योनी का धर्म समझ ले, जीवन

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अपने आंसू को टीअारपी के बताशे मत बनने दीजिए मुन्नवर राणा साहब

मुन्नवर राणा साहब ! न्यूज चैनल के टीआरपी के बताशे बनानेवाले लोग आपकी शायरी, मुशायरा के लिए कम सास-बहू सीरियल के मेलोड्रामा पैदा करने की ताकत रखने के लिए ज्यादा याद रखेंगे..आपको शायद यकीं न हो लेकिन आपने पिछले चार-पांच दिनों में न्यूज चैनलों पर जो कुछ भी जिस अंदाज में कहा वो न्यूज चैनलों की डीएनए से हूबहू मेल खाते हैं. चैनल के जिन चेहरे ने साहित्य को बासी और उबाऊ चीज मानकर आज

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देवी-देउता के ऐसे खिल्ली नहीं उड़ाते हैं मेरा बच्चा

मां: हैप्पी दशहरा विनीत. माता रानी,शेरोवाली बुतरू के खूब अकिल-बुद्दि दे. विनीत: हैप्पी दशहरा मां.. मां: की हाल है हमर बच्चा, मना लिया दुर्गापूजा ? विनीत: मनाना क्या, खाए दबाकर दोपहर में ठेठाके सोए, अभी जाकर जलेबी खरीदेंगे. तुम्हारे और घर के बाकी बच्चा लोगों के भीतर भी थोड़ा-थोड़ा रावण जिंदा रहे मां, बाकी तो पब्लिक जलाकर राख कर ही रही है. मां: सालभर के परब में कुछ औ नहीं तो रावण के जिंदा रहे के कामना

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चलो इस बार

चलो इस बार कुछ ऐसा भी कर लें I सेहर के वास्ते सूरज को चुन लें I   बोहोत सोये हैं हम गफलत की नींदें, खुली आँखों से भी कुछ खाब बुन लें I   हमारे हाथ में ताकत है सारी, चलो तदबीर को तकदीर कर लें I   हमीं हैं मुल्को मिल्लत की उम्मीदें, एक कोशिश करें सूरत बदल लें I

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मेरे अंदर का रावण

फेसबुक मैसेज बॉक्स और मेल बॉक्स में विजयदशमी के बहुत से संदेश पड़े हुए हैं, जिनमे शुभकामनाओं के साथ एक हिदायत भी दी गई है—अपने अंदर के रावण को मारें। मैसेज पढ़कर शोले फिल्म का डायलॉग याद आ जाता है—ठाकुर साहब आप क्या गब्बर सिंह को बकरी का बच्चा समझते हैं, जिसे कोई भी पकड़ ले। रावण ना हुआ भारतीय क्रिकेट टीम का पेस बॉलर हो गया, जिसे कोई भी ऐरा-गैरा आकर मार जाये। ये

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एक बार तो आ जाओ

तेरे दरस के प्यासे नैना, एक झलक दिखला जाओ. मन से तुम्हें पुकारें साईं, एक बार तो आ जाओ. तुम्हें भक्त प्यारे हैं अपने, रखते सबका सदा ख़याल. फिर मुझ पर क्यों कृपा नहीं की ? बस मेरा है यही सवाल. कमी रह गयी कहाँ भक्ति में, इतना तो बतला जाओ. मन से तुम्हें पुकारें साईं, एक बार तो आ जाओ. दीप जलाए जल से तुमने, सबने देखा तेरा कमाल. महामारी को दूर भगाया, आई

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