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दिल मछली कांसे की – भाग – ४

दरवाज़े के ठीक सामने वर्जिन मेरी की एक बहुत बड़ी तस्वीर टंग रही थी, जिसका ऑइल पेंट अब इतना धुंधला, इतना हल्का पड़ गया था कि अब उसपे बने चेहरे के भाव देख पाना,पढ़ पाना बहुत ही मुश्किल था| ये आगरा में रुथ का आख़िरी सन्डे था| इसके बाद कौन जाने दुबारा इस चर्च को अब देखना भी हो या नहीं| समय कितना बदल गया है उसने सोचा| इन्हीं वर्जिन मेरी की तस्वीर के साथ सेंट अंथोनी की एक छोटी तस्वीर हुआ करती थी, जो रूथ को आज नहीं दिखी| सेंट अंथोनी, पैट्रन ऑफ़ मिरेकिल्स, चमत्कारों के संत, खोयी हुई

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दिल मछली कांसे की – भाग – ३

कोहरे में डूबी सुबह का सूरज अभी निकला भी नहीं था कि फ़ोन की घंटी बज पड़ी | उसने करवट ले घडी देखी सुबह के छ: बज रहे थे| इतनी सुबह किसका फ़ोन होगा| उसने अलसाई आवाज़ में कहा| “हेलो” “हेलो हनी|” “कैसी हो मॉम? बहुत लो साउंड कर रही हो ” “ हाँ, हॉस्पिटल से फ़ोन कर रही हूँ| बंगलुरु से|” “बंगलुरु से,हॉस्पिटल से??” “हाँ डियाज़ एडमिट है| साल भर से किडनी प्रॉब्लम देने लगी थी उसकी| अब तक तो मेरे ही हॉस्पिटल में था पर अब यहाँ रेफ़र कर दिया है| इतना अल्कोहल शुरू कर दिया था कि

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दिल मछली कांसे की – भाग – २

घर के पिछली तरफ़ जहाँ रूथ और सोफ़ी का कमरा हुआ करता था उसकी खिड़की से स्कूल का मेन गेट दिखा करता था|उसने खिड़की खोली तो सामने ही स्कूल का बड़ा सा बोर्ड चमक रहा था| कितनी-कितनी बातें रूथ के मन में हलचल सी मचाने लगीं| “ मॉम देखो सोफ़ी आज फिर मेरी स्कर्ट पहन के भाग गयी| अब मैं स्कूल कैसे जाऊँगी?” “तुम उसका स्कर्ट पहन कर चली जाओ रूथ, एक ही साइज़ है हनी|” “मॉम उसका नहीं उसकी| वो अपनी गंदी स्कर्ट बेड पर फेंक कर गयी है|” “ओह! गॉड ये लड़की भी न टेंथ तक आ कर

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दिल मछली कांसे की – भाग – १

वो नवम्बर का आखिरी इतवार था, ठंड में लिपटा दिसम्बर की ओर बढ़ता हुआ| इवनिंग मास को खत्म हुए अभी पांच मिनट से कम ही वक़्त हुआ था पर भीड़ मानो एकदम ही कहीं गायब हो गयी थी| रूथ ने कंधे पे पड़ा शॉल खोल के ओढा और रोज़री पर्स के अंदर रख दी| वो चर्च का लॉन पार कर के बाहर निकल ही रही थी कि किसी ने कंधे पर हाथ रख दिया| उसने पलट कर देखा उसी की उम्र की एक औरत सामने खड़ी थी,पर वो पहचान नहीं पायी| “सोफ़ी गोम्ज़ ?? मिसेज़ गोम्ज़ की बेटी|” “यस, आई

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शाहबलूत का पत्ता!!! – भाग – ४

शाहबलूत का पत्ता!! मीलों-मील सूखी घास सड़क के दोनों तरफ़ बड़ी मुस्तैदी से फैली हुई है| इसी के बीच वो दौड़ी चली जा रही है| मृगतृष्णा सी ये घास एक ही बूँद के पड़ने से हरिया जायेगी| मन के विस्तृत बीहड़ में और है ही क्या  सिवाय इस जली-सूखी घास और इस सड़क के| ये सड़क इंतहाई तौर पे सीधी है  और इसकी बुनियाद इतनी टेढ़ी है, इसमें इतनी कज़ी है कि ज़रा दूर ही से गोल,सर्पीली,टेढ़ी-मेढ़ी लगती है| इसको बनाने वाले वास्तुकार के हाथों में इतनी-इतनी ऐंठन है कि ज़रा दूर की सीधी-सपाट राह को हथेलियों से रगड़-रगड़ टेढ़ा-मेढा

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शाहबलूत का पत्ता!!! – भाग – ३

उदासियों के चेहरे कभी बूढ़े नहीं होते ! “लश्कर-बॉम्बे” यादों में झिलमिलाता ये नाम उसे अब भी रातों में जगा जाता था | वही उम्र थी उसकी सत्रह-अठारह साल, इंटर के इम्तिहान दिए थे| कैसी गरम आंधी भरी शाम की रात थी वो उसे आजतक याद है| उसके एक हाथ में सुनार का बटुआ था जिसमें सत्रह सौ रूपये, जीजी की एक चूड़ी और छोटी मामी की दो अंगूठियाँ थीं,और दूसरे हाथ में रतीश का हाथ था| कैसा रूमान था जो उसकी देह में घर कर गया था?, उसका एक पाँव गाड़ी के पायदान पर था दूसरा हवा में, कि

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शाहबलूत का पत्ता!!! – भाग – २

चिठ्ठियाँ जिंदा लाश होती हैं! धूप का तीखापन, दोपहर की निसंगता और उजाड़ सा अपना अस्तित्व खोता ये छोटा स्टेशन| उसने दायें-बायें सर घुमा के देखा, एक चमकदार चौंध हर ओर पसरा पड़ा था|दूर-दूर तक सिवाय चिमनियों के कुछ और नज़र नहीं आता था| या तो उस चौहद्दी के बाहर हर चीज़ बहुत छोटी है या अब ये चिमनियाँ बहुत ऊंची उठ गयीं हैं| पिछली बार जब आई थी यहाँ तो सात साल पहले आई थी|उस समय ये नया पुल नहीं था इसकी जगह जर्जर, हिलता- काँपता बिलकुल इसका जुड़वां पुल था या ये उसका जुड़वां है|  जीजी की चिठ्ठी

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शाहबलूत का पत्ता!!! – भाग – १

प्रेम, युद्ध से पलायित देवताओं का स्वांग भर है! चौमासों की रात, रात की उमस और आकाश में बादल| आकाश का हर हिस्सा आज बादलों से पटा पड़ा था | बूँदें लबालब भरी हुई थीं, इतनी कि कोई एक बूँद भी हिले तो बीच का तारतम्य ही टूट जाये | “आज पानी न पड़े” उसने सोचा | उधर छत पर कोई किसी को कहानी सुना रहा था जिसके टूटे-टूटे शब्द उसके कानों में पड़ रहे थे| “आला खोल टटिया, बाला खोल टटिया, में खोल टटिया, चें खोल टटिया|” उसे यूँ लगा जैसे कोई मन भीतर के किवाड़ खटखटा रहा हो|

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ALL is FAIR in LUST and WAR: Random musings of a GoT FAN

If I had to challenge myself and try to sum up the complex world represented by Game of Thrones (GoT): People driven by their deepest desires take actions, which lead to their ultimate glory or ruin. In his own words, author George R.R Martin (GRRM) the mantra that drives his writings is the “STRUGGLE of the HUMAN HEART in CONFLICT WITH ITSELF”. What people do or fail to do to win this struggle, leads to a complex interconnected web of events often having far reaching consequences far beyond their imagination. It is also a tale of how politics works and

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Assassin’s Creed

Assassins creed series was pretty swell some years back, not that its bad now, but still it was really really good for its first few games and assassin’s creed 2 is probably best game in this celebrated series. Long before it became the annual rehashed game series on the lines of Call of Duty, when developers actually were given a decent window to develop a game, they came up with Assassins Creed 2. In 2007 when Assassins Creed was launched as a fresh new IP, immediate parallels with Prince of Persia were drawn which was true to a certain extent

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