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#BetterDemocracy: अपनी-अपनी सफाई

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देश में आजकल सफाई का बड़ा हल्ला है। मोदीजी ने एक हांक लगाई और पूरा देश जुट गया सबकुछ साफ करने में। कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर जगह नेताओ ने झाड़ू उठा लिया। कार्यकर्ताओं ने भी टोकरी और बेलचा थाम लिया। चमचो के उठाने के लिए कुछ बचा ही नहीं। झाड़ुओं की डिमांड और सप्लाई अचानक इतना बढ़ गई कि डर सताने लगा कि यहां-वहां बिखर रहे तिनको से ही गंदगी ना फैल जाये।

शर्मा जी की जो दीवार पान की पीक से रंगी होती थी, अब सफाई अभियान के नारों से सुसज्जित है। होली-दीवाली और ईद के शुभकामना संदेश देने वाले छुटभैये यहां-वहां पोस्टर चिपकाकर स्वच्छता का संदेश देने लगे। सफाई इतनी जोर से चल पड़ी कि फोटो सेशन से पहले बिखेरने के लिए कूड़ा ढूंढकर लाना तक मुहाल हो गया है। सफाई के गगनभेदी नारों का असर हर इंसान पर हो रहा है। घूरमेल चाटवाले की दुकान के बाहर दोने-पत्तलों का अंबार लगा रहता था। लेकिन अब ज़बरदस्त सफाई है। घूरेमल जी सुबह-सुबह सारा कूड़ उठवाकर बीच सड़क डलवा देते हैं। हम-सुधरेंगे जग सुधरेगा, आसपास कूड़ेदान नहीं है, तो क्या करें, घूरेमल जी। पब्लिक टायलेट बनाने का काम युद्धस्तर पर शुरू हो चुका है, लेकिन सरकारी काम में कुछ वक्त तो लगता है ही। वैसे भी 2019 आने में अभी काफी समय है।

लिहाजा अपनी शंका निवारण में जनता अब भी पहले की तरह पूर्ण पारदर्शिता बरत रही है। पार्को में कुत्ते घुमाने वाला देश का इलीट सरकारी स्वच्छता अभियान से बेहद खुश है। जैकी और टॉमी पार्क में अपना-अपना काम करते हैं और साथ-साथ जॉगिंग पर निकले उनके मालिक दुबेजी और चौबेजी सफाई कर्मचारियों को कोसते हैं। सरकार तो अच्छी है, लेकिन कर्मचारी बुरे हैं। सरकार का काम प्लानिंग करना है। जिन्हे लागू करना है, वे कामचोर हैं, हाउ सैड!

स्वच्छता अभियान को लेकर देश में एक तरह की आम-सहमति है। पक्ष-प्रतिपक्ष से परे तमाम पार्टियां ये मान रही हैं कि मोदीजी की ये पहल बहुत नेक है। सफाई तो हर कोई चाहता है, बस तरीकों का थोड़ा सा फर्क है। कांग्रेस ने मोदी के सफाई अभियान का समर्थन किया है। लेकिन साथ ही ये भी कहा कि इसकी ज़रूरत बाकी लोगो को है, कांग्रेस को नहीं। कांग्रेस पार्टी पूरे भारत में पहले ही साफ हो चुकी है, इससे ज्यादा और क्या साफ होगी? पार्टी का कहना है कि सफाई हमारी परंपरा का हिस्सा है। इंदिरा जी ने विरोधियो को चुन-चुनकर साफ किया। राजीव जी और सोनिया जी ने भी वही किया। राहुल जी के साफ करने के लिए कुछ छोड़ा ही नहीं गया, इसलिए उन्होने विरोधियों के बदले समर्थकों को ही साफ करना शुरू कर दिया। बची-खुची पार्टी पूरी तरह साफ कर डाली राहुल जी ने।

इसे कहते हैं, कम बोला, काम बोला! नीतीश और लालू ने एक-दूसरे से गले मिलकर कहा कि हमारे मन का मैल अब दूर हो चुका है। बिहार में जितनी भी गंदगी हो, क्या फर्क पड़ता है। असली चीज़ है, मन की सफाई। मन चंगा तो कठौती में गंगा। कठौती में गंगा नहीं बल्कि बीच सड़क आंसुओं की गंगा बहाई राज और उद्धव ठाकरे ने। दोनो गले मिले तो शिवसेना और निर्माण सेना दोनो पार्टियों को हज़ारो कार्यकर्ता रो पड़े। लेकिन अब रोकर भी क्या फायदा! उद्धव साहेब के दिल के अरमां आंसुओं में पहले ही बह चुके हैं। रही बात राज साहेब की आजकल उनके हंसने या रोने से किसी कोई फर्क नहीं पड़ता। बहरहाल दोनो भाई गले-मिलकर अपना मन साफ कर चुके हैं, इसलिए मोदी के स्वच्छता अभियान की उन्हे भी कोई ज़रूरत नहीं है।

सफाई अभियान की अपने-अपने तरीके से व्याख्या जारी है। मोदी ने सफाई करने को कहा था। लेकिन कुछ नेता ये मानते हैं कि सफाई करना और सफाई देना दोनो एक ही बात है। सफाई दे दी तो सफाई करने की क्या ज़रूरत है? सीडी कांड के नायक रहे कांग्रेस के स्टार प्रवक्ता पर करप्शन के इल्जाम लगे तो उन्होने अपने घर से सारे रिकॉर्ड साफ कर दिये। ना रहेगा रिकॉर्ड ना साबित होंगे गंदे इल्जाम। प्रवक्ता महोदय ही नहीं बल्कि इस देश में कई लोग ऐसे हैं, जो ये मानते हैं कि सबूत मिटाकर भी स्वच्छता मिशन में शामिल हुआ जा सकता है। स्वच्छता की अलग-अलग परिभाषाएं सिर्फ विपक्ष नहीं बल्कि सरकारी पार्टी से भी आ रही हैं। येदुरप्पा जी हमेशा से खुद को दूध का धुला मानते हैं।

अगर प्रधानमंत्री जी चाहेंगे तो नहा-धोकर बीच सड़क दो-चार बार झाड़ू लगा देंगे। इससे ज्यादा भला और कुछ करने की उन्हे ज़रूरत ही क्या है। प्रधानमंत्री जी कोटि-कोटि धन्यवाद देते हुए लाखो लोग सफाई अभियान के अपने आखिरी पड़ाव यानी गंगा की तरफ कूच कर रहे हैं। गंगा मईया यानी सफाई का सुप्रीम कोर्ट। एक बार अर्जी कबूल हो गई तो सारे अपराधों से छूट गये। अब तो गंगाजी पाप धोने के लिए और ज्यादा निर्मल और अविरल होंगी। चाहे जितने पाप करो, धोने के लिए गंगा मइया उपलब्ध हैं। बेचारी गंगा मइया, सोच रही होंगी, पापियो की धरती पर उतरने का जो पाप मैने किया है, वो धोने के लिए भला कहां जाउं?

 

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