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अपने आंसू को टीअारपी के बताशे मत बनने दीजिए मुन्नवर राणा साहब

मुन्नवर राणा साहब ! न्यूज चैनल के टीआरपी के बताशे बनानेवाले लोग आपकी शायरी, मुशायरा के लिए कम सास-बहू सीरियल के मेलोड्रामा पैदा करने की ताकत रखने के लिए ज्यादा याद रखेंगे..आपको शायद यकीं न हो लेकिन आपने पिछले चार-पांच दिनों में न्यूज चैनलों पर जो कुछ भी जिस अंदाज में कहा वो न्यूज चैनलों की डीएनए से हूबहू मेल खाते हैं. चैनल के जिन चेहरे ने साहित्य को बासी और उबाऊ चीज मानकर आज

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देवी-देउता के ऐसे खिल्ली नहीं उड़ाते हैं मेरा बच्चा

मां: हैप्पी दशहरा विनीत. माता रानी,शेरोवाली बुतरू के खूब अकिल-बुद्दि दे. विनीत: हैप्पी दशहरा मां.. मां: की हाल है हमर बच्चा, मना लिया दुर्गापूजा ? विनीत: मनाना क्या, खाए दबाकर दोपहर में ठेठाके सोए, अभी जाकर जलेबी खरीदेंगे. तुम्हारे और घर के बाकी बच्चा लोगों के भीतर भी थोड़ा-थोड़ा रावण जिंदा रहे मां, बाकी तो पब्लिक जलाकर राख कर ही रही है. मां: सालभर के परब में कुछ औ नहीं तो रावण के जिंदा रहे के कामना

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तो नरेन्द्र मोदी के प्रशंसकों ने इस तरह मनाया उनका जन्मदिन

ये नजारा है अहमदाबाद के बापूनगर में श्री नरेन्द्र मोदी का जन्मदिन मनाए जानेवाले स्थल का जहां आयोजकों से गुस्साए उनके प्रशंसकों ने ये सब किया. यहां कुर्सियां तोड़ी गईं, जमकर पत्थरबाजी हुई और कुछ महिलाएं घायल भी हुई. कार्यक्रम का आयोजन मददगार परिवार नाम की एनजीओ ने किया था. ये एनजीओ बीजेपी युवा मोर्चा के वाइस प्रेसीडेंट प्रकाश गूजर चलाते हैं. मामला यूं हुआ कि इस एनजीओ ने तय किया था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र

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आम जनता के लिए विश्व हिन्दी सम्मेलन प्रतिभागिता शुल्क मात्र पांच हजार रु:

चूंकि यह आयोजन भोपाल में हो रहा है, अतः नित्य की छोटी बड़ी सूचनाएं और समाचारों को मैं फालो करता रहा हूँ. तो मोटा-मोटी बात यह है – अब तक (और आगे भी, चाहे सरकारें कोई भी, कैसी भी रहें) यह और इस तरह के आयोजन अशोक चक्रधरों और अशोक बाजपेयीयों जैसे चन्द लोगों के हाथों में ही रहेंगे, और उनके ही फालोअर बुलाए जाएंगे. आम जनता के लिए 5000 रुपए का पंजीकरण अनिवार्य था,

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डूसू चुनाव मतलब,विधान-सभा की हार की कुंठा, जीत का बेहयापन

डूसू चुनाव( दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ ) के विज्ञापन राजनीतिक पार्टियां एफएम चैनलों पर भी देने लगे हैं. पूरी दिल्ली तो पोस्टर्स, किऑस्क, बिलबोर्ड से तो पहले ही पाट दिया है. फिलहाल इससे पैदा होनेवाले कचरे और खर्च की जानेवाली रकम पर बात न भी करें तो भी ये सवाल तो है ही कि आपको नहीं लगता राजनीतिक दलों ने इस चुनाव को विधान सभा चुनाव की ट्वंटी-ट्वंटी बना दिया है. जो विधान सभा में

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ये हमारे लिए आस्था नहीं, तर्क-वितर्क-बहस-विवाद की चौखट है

इस दरवाजे से हम सिर्फ गुजरते भर नहीं है, अपने भीतर मीडिया, संस्कृति और सामयिक संदर्भों को लेकर जो थोडी-बहुत समझ बनी है, इसी दरवाजे से होकर भीतर आयी है. सैंकड़ों बार इस दरवाजे से गुजरना हुआ है लेकिन किसी मस्जिद या मजार की चौखट की तरह नहीं, एक ऐसी जगह की तरह जहां से हम हर बार थोड़ा और तार्किक, ज्ञान के प्रति और ललक, नए विषयों के प्रति और जिज्ञासु होकर लौटते हैं.

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आप गांधी का चश्मा लेकर उनके चश्मे से देख नहीं सकते जनाब

ये देश की ऐतिहासिक जगह, धरोहर गांधी भवन का पुरुष प्रसाधन कक्ष( mens toilet) है. घुसते ही पेशाब-पोट्टी की प्रेशर भूलकर आप उल्टी कर देने की प्रेशर में आ जाएंगे. आप दो मिनट तक इस वॉशरुम में रह गए तो आपकी तबीयत खराब हो जाएगी. आप जो ये दीवारों पर, बेसिन और टायल्स पर गहरे लाल निशान देख रहे हैं, न जाने कितने महापुरुषों की छूटी ही धार की निशानी बनकर जंग के रंग में

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हम धागे नहीं, मोबाईल नेटवर्क के बंधन से बंधे है!

सच पूछिए तो उसकी मिजाज की फोटोकॉपी लेकर ही हम शहर-दर-शहर भटकते रहते हैं. सरस सलिल, इंडिया टुडे, मनोहर कहानियां के जिन पन्नों को दुनिया स्टेपल कर देती, हम उन्हें उखाड़कर साथ पढ़ते. मेरी उम्र अठारह साल है, मेरे ब्ऑयफ्रेंड ने मुझे किस कर दिया है, क्या मैं प्रेंग्नेंट हो जाउंगी जैसी स्वास्थ्य एवं सेक्स समस्याओं पर साथ ठहाके लगानेवाले बेलज्जे भाई-बहन. जिसे खुद कन्या पाठशाला की मास्टरनियों ने बायलॉजी के वो चैप्टर पढ़ाने के

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आज डीयू के शिक्षकों के लिए वेलेंटाइन डे है!

छोले-कुलचेवाले अंकल के यहां ग्राहक कम, कहानियां ज्यादा भर-भरकर आ रही हैं. कोई आते ही सीधे कहती है- वो वहां पहले पाव-भाजीवाला बैठता था ? अंकलजी का लड़का बताता है- यहां कहां पाव-भाजी. पांच साल में तो कोई दिक्खा नहीं. वो कहती हैं- मैं अस्सी की बात कर रही हूं, तुम जबी पैदा भी न हुआ होगा. कार पार्किंग से साथ चलकर आए शिक्षक पति-पत्नी आर्ट्स फैक की तरफ बढ़ते हैं कि रास्ते में मनोज

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आप अपने देवी-देवताओं, आराध्य को आखिर क्यों नहीं देखना चाहते?

दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान के सभागार में जब पहुंचा तो घुप्प अंधेरे में भी अंदाजा लग गया कि बैठने की कहीं कोई सीट नहीं बची है. पीछे दीवार से टिकने की कोशिश की तो वहां लोग पहले से ही एक पर एक लदकर-झुककर खड़े थे. दिल्ली की इस भारी उमस भरी गर्मी में भी यहां लोग पंखें के बूते करीब ढाई घंटे तक जमे रहे. नकुल(Nakul Singh Sawhney) की बनाई डॉक्यूमेंट्री फिल्म “मुजफ्फरनगर अभी

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