Anagh is a skilled creative writer, loves to read & write Hindi literature, short stories & Poetry. A chef by profession & a poet by heart teaches how to cook as well. Anagh is sharpening his writing skills from last one decade.

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इन दरख्तों से ख़ूँ टपकता है!!! – 6

खटाखट-खटाखट कैमरे के फ़्लैश ने उन सब पर रौशनी बिखेरनी शुरू कर दी। एकाएक भीड़ में ऎसी हस्तियों को देख कर हाटवालियों ने अपने-अपने सामान समेटने शुरू कर दिए। किसी ने सिल -बट्टा पीछे सरकाया, किसी ने चीनी मिट्टी के प्याले खिसकाए। किसी ने कुछ तो किसी ने कुछ और उनके लिए रास्ता बना दिया। “ये सब क्या है सौम्या ?”,उसने पूछा। कुछ नहीं अबुलला का उर्स है आजकल। “और ये अखबार वाले?” “दैनिक जागरण

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इन दरख्तों से ख़ूँ टपकता है!!! – 5

शाम ने अपने नन्हे-नन्हे पंख फैला कर ज़मीन पर उतरना शुरू कर दिया था। सड़क के दोनों ओर बकाइन और कनेर के पेड़ शाम के टिमटिमाते उजाले में चुपचाप खड़े थे। यही पिछले बरस तक पौधों की श्रेणी में आते थे। शाम अब पंख समेटे कैक्टस के गमले के पास बैठी थी। गमले में बहुत सारे छोट-छोटे हल्के गुलाबी रंग के फूल खिले थे। रात के आने में अभी बहुत समय था। शाम ने वहीं

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इन दरख्तों से ख़ूँ टपकता है!!! – 4

तो सवाल ये है कि मैं पॉलिटिक्स में क्यों हूँ चाचा जी? आजकल बहुत सवाल पूछने लगी हो तुम। यहाँ बैठो, शुक्ला जी ने एक कुर्सी खींच दी उसके आगे। इनसे मिलो ये है प्रभात अग्रवाल, हमारी पार्टी के बिहार और बंगाल के नये प्रभारी। मैं चाहता हूँ कि तुम इनके साथ बिहार में पार्टी प्रचार पर ध्यान केंद्रित करो। अभी तुम्हारी मेहनत पार्टी की स्थिति मजबूत कर सकती है और लौट कर यू.पी पर

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इन दरख्तों से ख़ूँ टपकता है!!! – 3

एक गुणा एक बराबर ग्यारह, एक गुणा एक बराबर ग्यारह वो बार-बार दोहराये जा रहा था। ऐ क्या पढ़ रहा है यह?? पद्मा ने दिव्य को झिड़का, किसने सिखाया ये?? नाना जी ने, उसने एक नज़र शुक्ला जी को देख कर कहा। क्या चाचा जी आप भी पद्मा ने कहा। अरे हम इसे राजनीति का गणित सिखा रहे हैं।  कैसे गठजोड़ से विधायकों को खरीदा जाता है ? कैसे निर्दलियों को अपने पक्ष में किया जाता

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इन दरख्तों से ख़ूँ टपकता है!!! – 2

सारा दिन बागीचे की साफ़-सफाई कराने में गुज़र गया। इतनी बड़ी कोठी थी पर बसावट कम और पेड़-पौधे ज्यादा। हर तरफ लम्बी-लम्बी घास खड़ी थी जिसे उसने रोलर चलवा कर कटवाया, पेड़ों की टहनियाँ छटवायीं और फिर जा कर दिव्या का कमरा साफ़ किया। कमरे में एक तरफ रॉट आयरन का मॉडर्न डिज़ाइन में पलंग पड़ा था। एक कोने में रोज़वुड की मेज़ रखी थी, जिस पर उसका अधखुला लैपटॉप, चाय का प्याला और आधा

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इन दरख्तों से ख़ूँ टपकता है!!! – 1

ऎ मुहब्बत वालियों, उठो देखो किले की बुर्जियों में सौदाई फरिश्तों के आँसुओं का सैलाब उमडा पड़ा है।  बीबी,बेगम मुमताज़ का इंतकाल हो गया। मुहब्बत वालियों देखो सफेद संग को तराश कर शाहजहां ने ताज बनवाया है। उसकी सफेद मीनारों से सरक कर कोहरा नीचे उतर रहा है। जमुना कि ऊदी रेत पर ओस पड़ रही है या पाला है कुछ समझ नहीं आता। वो देखो किले की बुर्जी की तरफ कोई बढ़ा जा रहा

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चाँद की पेशानी पर इक दाग़ है……

1 वक़्त की नब्ज़  तुम्हारे आगरे में बर्फ़ पड़ती है ???? नहीं, मेरे आगरे में ऐसा कुछ भी नहीं होता है। अच्छा क्या तुम्हारे दिल्ली में समंदर है ??? नहीं, मेरी दिल्ली में वहशत है, हवस है, मुहब्बत है। फ़ोन की घंटी ने उसे कच्ची नींद से उठा दिया। हेलो, कौन ? सलाम बाजिया। सलाम, इतनी रात गए फ़ोन, सब खैरियत है ?? हूँ ….. सब खैरियत है। अब्बू चाहते है तुम किसी को भेज रक़ाबगंज

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Arts Fiction Hindi Life Love Romance

लिखते हुए कुछ ख़्वाब से – 3

  अपने बचपन में किसी भूगोल की किताब में पढ़ा था कि दुनिया का सबसे बड़ा ज्वालामुखी विस्फोट इंडोनेशिया में हुआ था। इतना बड़ा की उसमें से निकले धुएं के कारण अगले पूरे वर्ष धरती के एक बहुत बड़े हिस्से का तापमान सामान्य से कई गुना नीचे दर्ज़ किया गया था। मैं जब तक उसके पास रहा ये जान ही नहीं पाया की कितना कुछ धधकता है उसके भीतर। अब सोचता हूँ कि अगर उसके

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Fiction Hindi Love Romance

लिखते हुए कुछ ख़्वाब से – 2

  मुझे हमेशा यूँ ही लगता था की उसका मन बेतवा के ढाल सा होगा।हमेशा साफ़, भरा और छलछलाता हुआ। चाहे कितना ही सूखा क्यों न आ जाये, पर मन के स्नेह का स्रोत हमेशा लबालब भरा हुआ रहेगा। पर लबालब भरे स्रोत से भी कई बार प्यासा ही लौटना पड़ता है। उन दिनों दो बड़े बदलाव हो रहे थे मुझमें पहला तो होठों के ऊपर मूछों की लकीर उभर रही थी, और दूसरा मन

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Fiction Hindi Life Love Love In The Times Of Recession

लिखते हुए कुछ ख़्वाब से – 1

  ” जब मोरे राजा पिया गये हैं बगीचा भौंरा भनर-भनर होये मेरी गुइंयाँ ” लक-दक करके दामन से झाड़ो तो अनगिनत यादें झड जाती हैं। पर ये भी तो सच ही है कि इतनी आसानी से कभी कोई याद भी नहीं आता। दिली तौर पर याद करना और ज़हनी तौर पर याद करना दोनों अलग-अलग हैं, फिर भी कुछ यादें ज़हन और दिल के बीच कहीं अटकी रहती हैं। उसकी याद भी कुछ ऐसी

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