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हाँ, हम लिव-इन में हैं

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कशिश और सार्थक अपनी शादी की शॉपिंग करते हुए बहुत खुश हैं. खुश क्यों न हों. लगभग दो वर्षों तक लिव-इन रिलेशन में रहने के बाद अब दोनों विवाह सूत्र में जो बंधने जा रहे हैं.

दो वर्ष पूर्व जब अपने परिवार के खिलाफ जा कर उन्होंने लिव-इन में रहने का फैसला किया था तब दोनों ही डरे हुए थे कि उनके इस फैसले का भविष्य क्या होगा. लेकिन साथ रहते हुए उन्होंने महसूस किया कि एक-दूसरे को जानने-समझने का जो तरीका उन्होंने अपनाया है, वह बहुत कारगर साबित हुआ. खूबियां जानने से ज़्यादा ज़रूरी था कि उन्हें एक-दूसरे की कमियां पता चलें ताकि यथासंभव उन्हें दूर किया जा सके. साथ ही इस बात को समझते हुए कि कोई भी इंसान परफेक्ट नहीं होता, एक-दूसरे के साथ सामंजस्य बिठाने का प्रयास करें.

जहाँ कशिश सार्थक के साथ अपनेआप को इस महानगर में बहुत सुरक्षित महसूस करती है, वहीँ सार्थक को भी शहर की भीड़ में एक ऐसा पार्टनर मिला जिससे दिल खोल कर वो अपनी खुशियों-परेशानियों को शेयर कर सकता है.

इन्ही की तरह न जाने कितने युवक -युवतियां महानगरों में लिव -इन या कोहेबिटेशन में रह रहे हैं . ऐसे कपल्स की संख्या दिन -ब – दिन बढ़ती जा रही है.

विगत दो दशकों में आधुनिक तकनीक पर आधारित रोज़गार के नए अवसरों में तेजी से वृद्धि हुई है. मुख्यतः देश के महानगरों में सृजित इन अवसरों को पाने के लिए अनगिनत युवा महानगरों की ओर रुख कर रहे हैं.

पहले शिक्षा फिर रोज़गार के लिए महत्वाकांक्षी युवाओं के लिए यह आवश्यक भी हो गया है. परन्तु परिवार से दूर अकेले अपनी पहचान बनाना और बचपन से देखे सपनों को साकार करना आसान नहीं. ऐसे में यदि एक ऐसा पार्टनर मिल जाये जिसकी स्थितियां और उद्देश्य हमारे जैसे ही हों तो राहे आसान हो जाती हैं.

अविवाहित युवक-युवती का साथ रहना ही लिव-इन रिलेशन कहलाता है. दु:खद है कि हमारे समाज में आज भी ऐसे संबंधों को मान्यता नहीं मिल पायी है, उसका मानना है की ऐसे संबंधों का कोई वैधानिक आधार न होने से ये कभी भी टूट सकते हैं जो एक सुरक्षित समाज के विकास के लिए खतरा है. अतः साथ रहने के लिए स्त्री – पुरुष को विवाह के बंधन में बंधना ही उचित है.ऐसे सम्बन्ध उसकी दृष्टि में हाईटेक व्यभिचार से अलग नहीं.

अच्छी बात यह है कि मननीय सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे संबंधों को कानूनी संरक्षण मुहैय्या कराया है. पुलिस व प्रशासन, दोनों को ही लिव-इन में रह रहे कपल्स को बेवजह परेशान न करने और उन्हें आवश्यक सहयोग देने के निर्देश दिए हैं.

लिव-इन में एक निर्धारित अवधि तक रह रही महिला को जहाँ कानूनन पत्नी के अधिकार दिए गए हैं वहीँ इन संबंधों से पैदा हुई संतानों को भी उनके अधिकार दिए जाने के प्रावधान किये गए हैं.

यदि कुछ बातों का ध्यान रखा जाये तो इन संबंधों के संभावित दुषपरिणामों   से बचा जा सकता है जैसे कि पार्टनर का चुनाव शारीरिक आकर्षण या भावनाओं में बह कर न किया जाये अपितु उसके स्वाभाव, पारिवारिक पृष्ठभूमि व आर्थिक स्वावलम्बन की स्तिथि को देख कर होना चाहिए, याद रहे लिव-इन रिलेशन कभी भी विवाह का विकल्प नहीं हो सकता, यह उसके पहले का फेस है.

आपसी समझ, सहमति, व सहयोग से कोई भी लिव-इन कपल सुखी व सफल जीवन का आनंद उठा सकता है और सिर ऊँचा कर कह सकता है -“हाँ, हम लिव-इन में हैं”.

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