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हम-तुम कैमरे में बंद हों और `ट्रैक टू’ हो जाये..

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परम पूजनीय वैदिकजी सीमा पार जाकर हाफिज सईद की गलबहियां डाल आये। लगे हाथों एक पाकिस्तानी टीवी चैनल पर कश्मीर भी गिफ्ट कर दिया। देशभर में हाय-तौबा मच गई। लेकिन वैदिक जी निर्विकार रहे। अंदाज़ कुछ ऐसा था, जैसे कह रहे हों— इतना शोर क्यों मचा रहे हो भाई, ज़रा पड़ोस में टहलने ही तो गया था। अब वहां दो चार लोग मिल गये तो क्या मैं दुआ-सलाम भी ना करूं? इसके बाद वैदिक भक्तों ने मोर्चा संभाला। भक्तगण कहने लगे—वैदिक जी से बड़ा देशभक्त ना कोई हुआ और ना होगा। पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने में वैदिक जी ने अपनी जिंदगी लगा दी। ताउम्र गोष्ठियों में जाते रहे, दावते उड़ाते रहे, गप्पे सुनाते रहे, दुश्मनों के गले लगते रहे। आखिर कितने लोग देश की खातिर ये सब कर पाते हैं? ये ट्रैक टू डिप्लोमैसी है, ट्रैक टू। जहां सरकारें फेल हो जाती हैं, वहां ट्रैक टू डिप्लोमैसी ही काम आती है। पाकिस्तान से निपटने में देश की तमाम सरकारें फेल रही हैं। पास सिर्फ वैदिक जी हुए हैं। हाफिज सईद के साथ फोटो ही तो खिंचवाया है, बम बनाने की टेक्निक डिस्कस नहीं की है। कश्मीर को आज़ाद करने पर वैचारिक सहमित ही जताई है, सचमुच कश्मीर पाकिस्तान को दे थोड़े ना दिया है।

तो हाफिज सईद के साथ एक कमरे में और कैमरे में कैद होकर वैदिक जी ट्रैक टू डिप्लोमैसी को आगे बढ़ा रहे थे। ख्याल बहुत ही नेक था। लेकिन फोकट में फजीहत हो गई। ट्रैक टू का इतिहास पुराना है। भारत और पाकिस्तान की सरकारें आमतौर पर एक-दूसरे से रूठी रहती हैं। ऐसे माहौल में अमन के पुजारियों का एक तबका सक्रिय होता है, जो या तो युद्ध रुकवा रहा होता है या फिर दोनो मुल्कों के बीच तनाव घटाने के लिए म्यूज़िक कंसर्ट करवा रहा होता है। तनाव घटाने से लेकर परमाणु युद्ध रुकवाने तक क्रेडिट इन बेचारे ट्रैक टू वालों को खुद लेना पड़ता है, क्योंकि सरकारें इन्हे कभी इनका जायज क्रेडिट देती ही नहीं हैं।

हिंदुस्तान और पाकिस्तान की दो नामचीन हस्तियों के बीच जहां भी कुछ गुपचुप-गुपचुप हो रहा हो, आप ये मान लें कि ट्रैक टू डिप्लोमैसी चल रही है। बड़े सितम सहने पड़ते हैं, बेचारे ट्रैक टू वालों को। अब थरूर साहब को ही लें। बहुत बड़े इंटलेक्चुल हैं, इसलिए मिशन ट्रैक टू के लिए पूरी तरह फिट हैं। ट्रैक टू ही नहीं बल्कि मल्टीपल ट्रैक वाले आदमी हैं, थरूर साहब। कदम अपने ट्रैक पर हो तब भी निगाहें दूसरे ट्रैक पर रहती हैं। बेचारे थरूर साहब को क्या पता था कि ये सब करते-करते उनकी अपनी जिंदगी ही ट्रैक से उतर जाएगी। माना जा रहा है कि थरूर साहब की पर्सनल लाइफ में जो बड़ा हादसा हुआ, उसकी जिम्मेदार एक हसीन ज़हीन पाकिस्तानी मोहतरमा है। लेकिन थरूर साहब के करीबी लोगो का कहना था कि दुनिया जिसे इलू-इलू बता रही है, वो महज पीपल टू पीपल कांटेक्ट था। हिंदुस्तान और पाकिस्तान की सरकारें एक-दूसरे से प्यार करे, इसके लिए ज़रूरी ये है कि पहले आवाम एक-दूसरे से प्यार करे। एक ऐसी ही छोटी सी कोशिश थी, जिसका तिल का ताड़ बन गया और बदले में इतना बड़ा हादसा हो गया और आज हालत ये हो गई है कि थरूर साहब के सिर पर सीबीआई जांच का डर सवार है।

पाकिस्तानियों के पीपल टू पीपल कांटेक्ट के चक्कर में बहुतों ने बेइज्जती सही है। अमृतसर वाले कप्तान साहब जब अपने राज्य के मुख्यमंत्री थे, तब उनके ट्रैक टू ने इस कदर ज़ोर मारा कि सरहद पार की नामचीन हसीना धड़ल्ले से चंडीगढ़ तशरीफ लाने लगीं। पाकिस्तान की एक बदनाम पावर ब्रोकर फैमिली से नाता रखने वाली खातून कप्तान साहब के साथ उनके आरामगाहों में भी देखी गईं। इल्जाम लगा कि कप्तान साहब पर जादू चलाने वाली ये मोहतरमा आईएसआई की एजेंट हैं। लेकिन तमाम हमलों के बावजूद कप्तान साहब ने ना तो मेहमाननवाजी छोड़ी और ना ही दोस्ती। उस वक्त के विधानसभा चुनाव में पाकिस्तानी मोहतरमा से कप्तान साहब की दोस्ती मुद्धा बनी और कप्तान साहब की चुनावी गाड़ी डीरेल गई। मोहतरमा के साथ उनकी दोस्ती का क्या हुआ, ये आज भी एक राज़ है। ट्रैक टू डिप्लोमैसी करने वालों में कुछ लोग ऐसे हैं, ऐसे हैं, जो 14 अगस्त की रात को वाघा बॉर्डर पर जाकर चुपचाप मोबत्ती जला आते हैं।

उन्हे ना तो क्रेडिट मिलता है और ना और उनकी बदनामी होती है। लेकिन असली ट्रैक टू वालों की तो जैसे पूरी दुनिया दुश्मन होती है। नटवर सिंह साहब ट्रैक टू में हमेशा सक्रिय रहे। उनके विदेश मंत्री बनने के बाद ये राज़ खुला पाकिस्तान से रिश्ता सुधारते-सुधारते वो इराक तक जा पहुंचे थे और सद्धाम हुसैन के साथ टांका कुछ ऐसा भिड़ा था कि नटवर जी ने तेल बेचकर तिजोरी भरने का लाइसेंस तक जुगाड़ लिया था। नतीजा ये हुआ कि कुर्सी चली गई। कुछ ऐसी ही कहानी पाकिस्तानी मानवाधिकारवादी अंसार बर्नी की भी रही। बर्नी साहब को सरहद के दोनो तरफ इंसानियत के फरिश्ते के तौर पर देखा जाता रहा था। लेकिन पाकिस्तान की जेल में भारतीय कैदी सरबजीत की हत्या के बाद उसकी बहन ने राज़ खोला कि बर्नी साहब ने मोटी रकम लेकर सरबीज को जेल से रिहा करवाने की पेशकश थी। यानी बदनामी ट्रैक टू वालों के लिए जैसे कांप्लिमेंटरी है। इसीलिए वैदिक जी आप तनिक भी विचलित ना हों। फेसबुक पर हाफिज सईद के साथ फोटो चमकाते रहिये, ह्रदय परिवर्तन कराते रहिये और पूरे देश को अपनी उपलब्धियों के मनोरंजक किस्से सुनाते रहिये।

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