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हमला करोगे तो फेसबुक पर लिख दूंगा


पड़ोसी देश के सैनिक रातो-रात सीमा पार करके आये और दो जवानों के सिर काटकर ले गये। सरकार को बहुत गुस्सा आया। गुस्से में सरकार ने कड़ी चेतावनी दी— बहुत हुआ, अगर अगली बार ये घटना दोहराई गई तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी। पड़ोसी सैनिक अगली बार फिर आये और पांच जवानों की हत्या करके चले गये। सरकार ने फिर से कड़ी कार्रवाई की बात कही। इस बीच विपक्ष ने सरकार पर कड़ा हमला बोल दिया। सत्तारूढ़ पार्टी के थिंक टैंक की बैठक बुलाई गई। बैठक की अध्यक्षता करने वाले नेता ने कहा—हम इस जघन्य कार्रवाई की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं। पार्टी अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री को भी एक बहुत कड़ी चिट्ठी लिखी है, जिसमें कड़े कदम उठाने पर ज़ोर दिया गया है।

तो कड़े कदम उठाते क्यों नहीं–  एक अज्ञानी उत्साही नौजवान नेता बोल पड़ा।

उठाया तो था और इसी सिलसिले में हमने पड़ोसी देश को कड़ी चेतावनी भी दी थी–  सरकार के नुमाइंदे ने सफाई दी।

लेकिन पड़ोसी सुनता क्यों नहीं–  नौजवान नेता ने पूछा।

शायद उसे सुनाई कम देता है—सरकारी नुमाइंदे ने कहा।

ये तो बहुत अफसोस की बात है, हमारे पड़ोसी को सुनाई कम देता है और हम उसके लिए कुछ करते नहीं। हमें तो बेहतर इलाज के लिए आर्थिक मदद देनी चाहिए— पार्टी के एक प्रगतिशील बुजुर्ग नेता ने कहा और बैठक में तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी।

लेकिन हमारे इतने जवान शहीद हुए उनका क्या? आप लोग सचमुच कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं करते—एक दूसरा अज्ञानी बोल पड़ा।

हां—नौजवान की बात में दम है, अब तो एक ही रास्ता बचता है–  एक बुर्जुग नेता ने दाढ़ी खुजलाते हुए कहा।

क्या?

हम पड़ोसी को साफ-साफ कह देंगे।

क्या?

जाओ हम तुम्हारे साथ नहीं खेलते।

हां, और हम यह भी कह सकते हैं कि तुमसे बात भी नहीं करेंगे, मिलोगे तब भी नज़रे फेर लेंगे, हां।

यह तो बहुत बार कर चुके हैं, लेकिन फायदा क्या होगा?

बैठक में हर कोई मान रहा था कि साथ खेलना और बातचीत बंद कर देना बहुत कड़ी कार्रवाई होगी, लेकिन इसका फायदा क्या होगा, ये किसी की समझ में नहीं आ रहा था। लिहाजा बैठक को अगली बैठक तक के लिए स्थगित कर दिया गया। बैठक की अध्यक्षता करने वाले ने सबको डांट पिलाई और अगली बैठक में कड़े कदमों के मौलिक विकल्पों के साथ हाजिर होने का निर्देश दिया गया।

अगली बैठक में सारे नेता मौलिक विचारों के साथ आये। किसी ने कहा—लगे रहो मुन्नाभाई की एक करोड़ सीडी पड़ोसी देश को सब्सिडाइज्ड रेट पर भेज दी जाएं। इससे उन्हें गांधीगीरी की शिक्षा भी मिलेगी और दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्ते भी बढ़ेंगे। गांधीगीरी समझ में आएगी तो सीमा पार करके आनेवाला दुश्मन गोलियां नहीं बरसाएगा, चुपचाप चाय पानी पीकर चला जाएगा। सुझाव मौलिक था, लेकिन पार्टी में मौजूद दक्षिणपंथियों ने इसका विरोध किया। सबका कहना था, ये बैठक कड़े कदमों पर है, ये कौन सा कड़ा कदम हुआ? फिर कड़े कदमों के बाकी बचे विकल्प भी सामने आ गये—

सलमान खान से डंटवा दें तो कैसा रहेगा।

पड़ोसी गायक गाये तो कानो में उंगली डाल लें।

बिग बॉस के घर में घुसने पर रोक लगवा दें।

कह दें कि चीनी खत्म हो गई, इंपोर्ट करना है,  तो गुड़ इंपोर्ट करो।

बैठक की अध्यक्षता करने वाले ने एक बार फिर अपने सिर के बाल नोंचे—एक भी आइडिया मौलिक नहीं है। ये सारे रास्ते हम पहले भी आजामा चुके हैं, कोई मौलिक विचार लेकर आइये।

सीधी सैनिक कार्रवाई क्यों नहीं करते–  उत्साही अज्ञानी नौजवान फिर से बोल पड़ा।

नहीं कर सकते। हमारे पास हथियार नहीं हैं।

क्यों, हमारे पास तो परमाणु बम है।

उनके पास भी है।

हां, तो फिर कड़ी कार्रवाई और कड़ी चेतावनी से ही काम चलाना पड़ेगा। वैसे कड़ी चेतावनी का सबसे अच्छा विकल्प क्या है?

फेसबुक- सबसे पीछे बैठे एक लो-प्रोफाइल नेता डरते-डरते कहा।

बैठक की अध्यक्षता करने वाले ने उस लो प्रोफाइल नेता को गले लगा लिया–  देखो पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र का यही फायदा होता है। देर से ही सही आइडिया आ ही गया। आज की दुनिया में दुश्मन को मुंहतोड़ जवाब देना का फेसबुक से अच्छा विकल्प कोई और नहीं है। सारी लड़ाइयां फेसबुक पर ही लड़ी जाती हैं और जीती जाती हैं। बहुत अच्छा आइडिया दिया है तुमने। तुम्हें राष्ट्रीय महासचिव बनाने की सिफारिश करूंगा। जल्द से जल्द देश का फेसबुक अकाउंट खोल दिया जाना चाहिए।

अगली बार दुश्मन फिर सीमा पार करके आये और जवानो के सिर काटकर ले जाएगा, तब?

हम अपनी कड़ी कार्रवाई फेसबुक पर कर देंगे।

हरेक पार्टी कार्यकर्ता उसे लाइक कर देगा, बस हम जीत जाएंगे।

पार्टी कार्यकर्ता क्यों पूरा देश लाइक करेगा, जो नहीं करेगा, वो देशद्रोही।

इस तरह बैठक में ध्वनिमत से प्रस्ताव पारित किया गया कि अपने देश का फेसबुक अकाउंट जल्द से जल्द खुलवाने के लिए पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी जाएगी। पार्टी के वरिष्ठतम नेता ने यूरेक-यूरेका करते हुए पार्टी अध्यक्ष के घर की तरफ दौड़ लगा दी। बाकी नेताओं की भीड़ भी उनके पीछे दौड़ पड़ी।

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