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सहर की साथी

जब वो आती है
साथ होती है सहर की दिव्यता
 
लगता है जाते हुए चांद से
मांग ली हो चांदनी
 
तारों से ले लिया हो शीतल तेज
और उस जैसा टिमटिमाना
 
सुबह की पवन से सीखा हो
इठलाना और झूमना
 
भ्रमरों से सीख लिया हो गूंजना
और चिड़ियों से चहचहाना
 
जैसे सीख कर आई हो
हिरणों से चपलता
 
आंखों में बसा लिया हो समंदर
ताकि डूब जाए उसमें प्रियवर
 

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