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संस्कृति, संस्कार और शिक्षा (भाग-१)

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संस्कृति:-

सामान्यतः लोग ‘संस्कृति’ का सम्बन्ध कलाओं अथवा ललित कलाओं तक ही सीमित रखते हैं क्योंकि जब कहीं कलात्मक अथवा ललित कलाओं या वाद्य संगीत आदि के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं तो यह कहा जाता है की सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया है| इसी प्रकार यदि कहीं पर साहित्यिक या काव्य पाठ आदि का आयोजन होता है तो उसे साहित्यिक कार्यक्रम का नाम दिया जाता है| धर्म से सम्बन्धित कार्यक्रम को धार्मिक, विज्ञान से संबंधित कार्यक्रम को वैज्ञानिक तथा समाज और राजनैतिक कार्यक्रम को सामाजिक और राजनैतिक कार्यक्रम के नामों से संबोधित किया जाता है| कहने का तात्पर्य यह है कि ‘संस्कृति’ शब्द को जिसका अति व्यापक अर्थ है, एक अत्यंत लघु दायरे में सीमित करने की कोशिश करते हैं, जो सही नहीं है|

संस्कृति की परिभाषा:-

मैथ्यू आर्नल्ड के अनुसार ‘मानव जीवन की परिपूर्णता, सौंदर्य और प्रकाश’ ही संस्कृति का स्वरूप है| टी० एस० इलिएट ने ‘सामान्य जीवन विधि को ही संस्कृति बताया है|’ स्वामी करपात्री जी महाराज के अनुसार संस्कृति का अर्थ ‘भूषण भूत सम्यक कृति है|’ जिन चेष्टाओं के द्वारा मनुष्य अपने जीवन के समस्त क्षेत्रों में उन्नति करता हुआ सुख-शांति प्राप्त करे| वे चेष्टाएँ उसके लिए ‘भूषण भूत सम्यक चेष्टाएँ’ कही जा सकती हैं| मनुष्य की अधिभौतिक, अधिदैविक और आध्यात्मिक उपलब्धियाँ और तदनुकूल चेष्टाएँ ही उसकी संस्कृति है| मनुष्य के लौकिक-पारिलौकिक अभ्युदय के अनुकूल आचार-विचार उसकी संस्कृति का निर्माण करते हैं| इनके अतिरिक्त ‘एडवर्ड टाइली ‘ने १८७९ ई० में संस्कृति की परिभाषा दी थी जो सबसे अच्छी समझी जाती है| उनके अनुसार संस्कृति “ज्ञान, विज्ञान, कला, क़ानून, नैतिकता, रीति-रिवाज और दूसरी मानवीय क्षमताओं और आदतों को अपने में शामिल करती है, जिन्हें मनुष्य समाज का सदस्य होने के नाते ग्रहण करता है|”

संस्कृति का अर्थ

इस प्रकार हम देखते हैं कि संस्कृति का अर्थ किसी क्षेत्र विशेष तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसका व्यापक अर्थ है जो मानव जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित करता है अथवा उसके हर क्षेत्र से प्रभावित अवश्य होता है| मानव समाज का सीधा सम्बन्ध जीवन से है और जीवन समग्र है, उसकी संभावनाएँ समग्र हैं| वे लोग वास्तव में अभागे ही होंगे जो इस समग्रता की समृद्धि और गौरव को अनुभव नहीं करते| संस्कृति का स्वरूप ऐतिहासिक है| इतिहास समग्र है, अनवरत है तथा सार्वभौमिक है, क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर है| इसी प्रकार संस्कृति का स्वरूप भी समग्र, अनवरत, सार्वभौमिक, क्षैतिज व ऊर्ध्वाधर है| संस्कृति समान प्रयत्नों से उत्पन्न समान विरासत है, संयुक्त और समन्वित प्रयासों का प्रतिफलन है| संस्कृति समस्त के लिए समस्त का योगदान है| संस्कृति मिश्रित, समन्वित संयोग है|

ऐतिहासिक व सांस्कृतिक अभियान विश्व व्यापी हैं| अभिप्राय   तथा विचार किसी विशेष व्यक्ति, जाति, धर्म, राष्ट्र, देश, दिशा अथवा काल तक ही सीमित नहीं हैं,वह असीमित होते हैं| अतः इतिहास तथा संस्कृति दोनों ही असीम हैं|

गतिशील संस्कृति

संस्कृति के ऐतिहासिक होने के कारण उसके प्रति ऐतिहासिक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है| यदि इतिहास, समाज, सभ्यता, संस्कृति इत्यादि के लिए हम ऐतिहासिक दृष्टिकोण नहीं अपनाते हैं तो अपनी महान सांस्कृतिक धरोहर की गतिशील व उपयोगी उपलब्धियों को विकसित कर उन्हें और आगे बढ़ाने के प्रयत्न के स्थान पर अपने अतीत के हर अंग और पहलू को कठमुल्ले की तरह पकड़कर उसी के गीत गाते रहने का दकियानूसी मार्ग प्रशस्त कर उसे ही संस्कृति का पर्याय बना डालेंगे जैसा कुछ लोग प्रयत्न भी करते हैं|

क्रमशः

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