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संस्कृति, संस्कार और शिक्षा (भाग-३)

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संस्कृति और शिक्षा:

मानव समाज को, स्वस्थ, मानवीय, उत्कृष्ट संस्कृति का स्वरूप प्रदान करने के लिए उसे स्वस्थ, मानवीय संस्कारों को देना होगा जो संस्कृति के मानवीय पक्ष से ही प्राप्त किए जा सकते हैं| इतिहास, संस्कृति परिवर्तन प्रक्रिया है| परिवर्तन उत्पादन के साधनों के परिवर्तन से आता है| उत्पादन के साधनों के परिवर्तन के लिए समाज को सही समझ तथा ज्ञान देना होगा और इसके लिए मानवीय शिक्षा की आवस्यकता होगी| ऐसी शिक्षा की आवस्यकता होगी जो हमें इस योग्य बना सके क़ि हम अपने स्वाभिमान युक्त आत्मनिर्भर जीवन बिताते हुए अपने लिए तथा दूसरों के लिए उन्नति के मार्ग अग्रसर कर सकें अर्थात शिक्षा ऐसी होनी चाहिए कि मानव को उसकी मानसिक जकड़न से मुक्ति दिला सके| स्वाभिमान युक्त आत्म-निर्भर जीवन की उन्नति तथा विकास की शक्ति जो ठीक इसी अर्थ में दूसरों को आघात न पहुँचाए, स्वतंत्रता कहलाती है| अतः हम कह सकते हैं कि मानव की वे चेष्टाएँ जिनके द्वारा मनुष्य अपने जीवन के समस्त क्षेत्रों में उन्नति करता हुआ सुख-शांति प्राप्त कर सके, ही संस्कृति नहीं है, बल्कि संस्कृति मानव की उन चेष्टाओं से मिलकर बनती है जिनके द्वारा मनुष्य अपने जीवन के समस्त क्षेत्रों में तो उन्नति करता हुआ सुख-शांति प्राप्त करे ही साथ ही दूसरों की भी उन्नति तथा सुख-शांति में किसी तरह की बाधा न पहुँचाए|

 

संस्कृति का व्यापक दायरा:

संस्कृति को किसी क्षेत्र विशेष तक ही सीमित कर उसकी व्यापकता को संकीर्ण बनाने का कोई भी प्रयास न करके उसके अंदर समाविष्ट हर क्षेत्र को मानवीय दृष्टि से विकसित व पोषित करना चाहिए जिससे स्वस्थ, मानवीय संस्कृति का समुचित विकास हो सके और उससे मानव जीवन की उन्नति, सुख-समृद्धि तथा शांति में वृद्धि हो सके| अपनी सांस्कृतिक विरासत के उस अमानवीय पहलू को त्यागना होगा जो मानव जीवन की उन्नति, सुख-समृद्धि, शांति एवं स्वतंत्रता में बाधक है| आज संपूर्ण विश्व की मानव जाति में जो भय, आतंक, सांप्रदायिक और धार्मिक कट्टरता, जातिवाद, राष्ट्रवाद, सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक स्वार्थ-परता, दकियानूसी अंध-विश्वासों जिनसे आपस में द्वेश, ईर्ष्या और घृणा उत्पन्न होती है, संकीर्णता आदि के रूप में जो घना, भयानक अंधकार छाया हुआ है, को नष्ट करना होगा| यह तभी संभव है जब संस्कृति के मानवीय पक्ष को विकसित कर स्वस्थ मानवीय संस्कारों को ग्रहण किया जाये| इसके लिए आवश्यकता है मानव समाज में मानवीय शिक्षा के प्रसार की| संस्कृति के विकास के लिए, मानव जाति के विकास और कल्याण के लिए ऐसी शिक्षा के प्रसार की आवश्यकता है जिसका एक मात्र माप दंड ‘मानवता’ हो| आधुनिक शिक्षा को सुसंस्कृत् तथा परिष्कृत करके ही सही अर्थों में मानव बना जा सकता है|

 

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