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संस्कृति, संस्कार और शिक्षा (भाग-2)

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संस्कारों की जननी संस्कृति:-

संस्कृति ही संस्कारों की जननी होती है| मानव समाज के विकास और उसके उत्थान के लिए अच्छे, स्वस्थ, मानवीय संस्कारों की आवश्यकता होती है और वे अच्छे, स्वस्थ, मानवीय संस्कार हमें स्वस्थ मानवीय संस्कृति से ही मिल सकते हैं| इतिहास तथा सांस्कृतिक परम्पराओं के प्रति ऐसा ऐतिहासिक तथा विवेकशील दृष्टिकोण अपनाने के लिएसही समझ तथा तथयपूर्ण ज्ञान की आवश्यकता होती है| मानवीय दृष्टिकोण की आवश्यकता है| देश की सांस्कृतिक महानता के अनुभव का यह अर्थ कदापि नहीं होता है कि हम अपने नज़रिये को दम्भपूर्ण राष्ट्रवाद या कूपमन्डूकता का दृष्टिकोण बना दें| उदाहरण के लिए भारतीय संस्कृति के नाम पर दलित किंतु होनहार बालकों की प्रतिभा को महाभारत कालीन एकलव्य के अंगूठे की तरह कटवा डालने की मान्यता को प्रस्तावित करने का आज कोई भी प्रयास भारतीय संस्कृति के साथ घोर अन्याय होगा, उसका घोर अपमान होगा|

इसी प्रकार महाभारत के पांडवों की पुष्टि करता हुआ आज के समाज में पाँच-पाँच पुरुषों के लिए एक ही पत्नी द्रौपदी की कल्पना का पक्षधर बनकर उसका समर्थन शायद ही कोई व्यक्ति करेगा| और उसे किसी सामान्य वस्तु की भाँति जुएँ के दाँव पर लगा देना मानवता का कितना घोर अपमान होगा| महान आदर्श समझे जाने वाले राम के द्वारा सीताजी की लंका से लौटने पर अग्नि परीक्षा लिया जाना तथा उन्हें एक साधारण आदमी के वार्तालाप के आधार पर देश निकाला दे देना कभी भी उत्कृष्ट संस्कृति का प्रतीक नहीं कहा जा सकता| ऐसे कार्यों को भी जो भारतीय संस्कृति के नाम पर उत्कृष्ट कार्य बताएँगे उन्हें संस्कृति का द्रोही ही समझा जाना चाहिए|

मानवीय वनाम अमानवीय:-

मनुष्य की सांस्कृतिक विरासत में जीवन के वे सभी तत्व मौजूद हैं जो मानवीय भी हैं और अमानवीय भी| आवश्यकता इस बात की है कि हम दोनों में से किसका चुनाव करते हैं? मानवता का अथवा अमानवता का| जब मनुष्य अपने किन्हीं सीमित स्वार्थों के कारण समष्टिवादी विचारधारा को त्याग कर, मानवता वादी विचारधारा को छोड़कर व्यक्तिवादी बनकर स्वार्थपरता को चुनता है तो वह अमानवीय कार्यों को करने की तरफ अग्रसर होता है| तब वह नेकी को त्याग कर वदी को, स्वार्थ- हीनता को छोड़ स्वार्थपरता को, मानवता को तिलांजलि दे बर्बरता को, सौंदर्य को नष्ट कर कुरूपता को, नैतिकता त्याग कर अनैतिकता को चुनता है| और तब मनुष्य चुनता है धार्मिक कर्मकांडों को, दकियानूसी अंध-विश्वासों को, रहस्यवादी कल्पनाओं अथवा अयुक्तियुक्त निरपेक्षों को| वह चुनता है जातीय विश्वास को अथवा क्षेत्रीय सीमाओं को| वह चुनता है राजनैतिक अथवा आर्थिक प्रभुसत्ता को| वह चुनता है भाषाई परिवेश को अथवा राष्ट्रीय मान्यताओं को| मनुष्य के यही चुनाव हैं जो उसे मनुष्यता से नीचे गिराते हैं|

मनुष्य मानवीय संस्कार उत्कृष्ट संस्कृति से ही प्राप्त कर सकते हैं|

क्रमशः

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