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संतन के घर लफड़ा भारी

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निर्मल बाबा की किरपा तो जैसे विदेशी बैंको में पड़ा काला धन हो गई है। भक्त जन इंतज़ार कर रहे हैं, अब आएगी, अब आएगी, लेकिन किरपा है कि आने का नाम ही नहीं ले रही। परम पूजनीय आशाराम जी अपने समस्त आशीर्वचनों के साथ काल कोठरी में कैद हैं। आशाराम जी के सुपुत्र नारायण साई भी हरि इच्छा से जेल की चक्की पीस रहे हैं। भक्तों को जीते जी भवसागर पार करवा रहे रामपाल जी को पुलिस पकड़कर ले गई है और सुना है कि निर्दयी सरकार उनपर कई धाराओं के तहत मुकदमा चलाने की तैयारी कर रही है। तो क्या ये भारत भूमि संतों से खाली हो जाएगी? बाबाजी लोग धर्म की रक्षा करना चाहते हैं, लेकिन निष्ठुर कानून को लगता है कि धर्म की रक्षा तभी हो पाएगी जब ये लोग अंदर होंगे, इनके बाहर आते ही धर्म की हानि शुरू हो जाएगी। कानून की बात कानून वाले जानें, लेकिन मेरी चिंता थोड़ी अलग है। कुछ संतों के जेल में होने और कुछ के अन्य पचड़ो में फंसने से से बाबागीरी के बिजनेस में डिमांड और सप्लाई का बहुत बड़ा गैप हो गया है। बाबागीरी के बाज़ार के सेटिंमेंट बहुत बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। आमतौर पर हर महीने में एक नये बाबा लांच हो जाया करते थे, लेकिन अब हाल ये हो गया कि महीनो से किसी नये ब्रांड वाले बाबा की बाज़ार में एंट्री तक नहीं हुई है। देश में आध्यात्मिक माल की सप्लाई रुक सी गई है और जनता को भारी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। इस देश की जनता को रोटी मिले ना मिले आध्यात्मिक खुराक ज़रूर चाहिए। नल में पानी में एक दिन छोड़कर आये कोई बात नहीं, लेकिन टीवी पर प्रवचन सुबह-शाम आना चाहिए। कहने का मतलब ये कि डिमांड बहुत है और सप्लाई कम। ऐसे में सरकार क्या करे?

डिमांड और सप्लाई का ये गैप किसी और धंधे में हुआ तो तो सरकार ज़रूर कड़े कदम उठाती। ऐसा अगर किसी हड़ताल की वजह से होता तो सरकार एस्मा लगा देती और किसी दूसरे विभाग के कर्मचारियों से ड्यूटी करवा लेती। लेकिन प्रवचन की आपूर्ति प्रभावित होने की वजह इनमे से कोई नहीं है, इसलिए ऐसा कोई उपाय यहां नहीं चल सकता, फिर आखिर क्या रास्ता निकाला जाये कि जनता को प्रवचन की खुराक मिलती रहे? उधेड़बुन जारी थी कि सरकारी कोटे के कुछ संतो ने संकट दूर करने के लिए खुद आगे आने का फैसला किया। शुरुआत केंद्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति ने की। दिल्ली में साध्वी जी ने ऐसा प्रवचन दिया कि पूरा देश तालियों की गड़गड़ाट से गूंज उठा। राम नाम की लूट की तरह न्यूज़ चैनलों के बीच टीआरपी की लूट शुरू हो गई और धार्मिक चैनल हाथ मलते रह गये। प्रवचन साध्वी का और दुकानदारी चले न्यूज़ चैनलों की, घोर कलियुग! मामला ज़रा पेचीदा था। साध्वी जी ने लिया तो राम का नाम था, लेकिन प्रवचन में आगे कुछ ऐसा था कि धार्मिक चैनल पर नहीं दिखाया जा सकता था। ताली थमी तो हाय-हाय शुरू हो गई और प्रधानमंत्री जी तक को ये कहना पड़ा कि भावनाएं चाहे कितनी भी पवित्र हो, लेकिन ऐसी भाषा में प्रवचन नहीं दिया जाना चाहिए, किसी राजनीतिक कार्यक्रम में भी नहीं। ऐसा पहली बार हुआ कि अपने प्रवचन के बदले किसी साध्वी को क्षमा याचना करनी पड़ी। देश के कई पुणायात्माओं को इससे गहरी चोट पहुंची। ठीक है, साध्वी जी सरकार की नौकरी करती हैं, लेकिन क्या संतो की वाणी पर भी अब सत्ता का पहरा होगा? पक्ष और विपक्ष में दलीलें जारी थीं कि अचानक सरकारी संत कोटे से एक और नया प्रवचन आया गया, साक्षी महाराज के श्रीमुख से। पूरे देश को साक्षी मानकर महाराज जी ने बहुत अर्थपूर्ण प्रवचन दे डाला रामभक्त गांधी और राष्ट्रभक्त नाथूराम जी के बारे में। न्यूज़ चैनलों की लॉटरी फिर से लग गई और विपक्ष ने फिर से रोना-पीटना शुरू कर दिया। मोदीजी के माथे पर एक बार फिर बल पड़ा, कहां विकास का एजेंडा, कहां स्वच्छता अभियान और कहां सरकारी संतों के सद्वचनों से हो रही किरकिरी। साध्वी जी की तरह महाराज को भी डांट पिलाई गई और बताया गया कि अगर उन्हे युगपुरुष नाथूराम जी का मनन करना ही है, तो अपने मन में करें, पूरी दुनिया के सामने नहीं। सरकार के पास बहुत से गंभीर काम हैं और पार्टी अपने नेताओं को विवाद पैदान करने की अनुमति नहीं दे सकती, चाहे वे नेता संत ही क्यों ना हो। सचमुच संतजनों के लिए यह समय संकट का है। लेकिन इससे बड़ी ये है कि प्रवचन के बाज़ार में डिमांड और सप्लाई का गैप फिलहाल दूर होता दिखाई नहीं दे रहा है।

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