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शाहबलूत का पत्ता!!! – भाग – ४

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शाहबलूत का पत्ता!!

मीलों-मील सूखी घास सड़क के दोनों तरफ़ बड़ी मुस्तैदी से फैली हुई है| इसी के बीच वो दौड़ी चली जा रही है| मृगतृष्णा सी ये घास एक ही बूँद के पड़ने से हरिया जायेगी| मन के विस्तृत बीहड़ में और है ही क्या  सिवाय इस जली-सूखी घास और इस सड़क के| ये सड़क इंतहाई तौर पे सीधी है  और इसकी बुनियाद इतनी टेढ़ी है, इसमें इतनी कज़ी है कि ज़रा दूर ही से गोल,सर्पीली,टेढ़ी-मेढ़ी लगती है| इसको बनाने वाले वास्तुकार के हाथों में इतनी-इतनी ऐंठन है कि ज़रा दूर की सीधी-सपाट राह को हथेलियों से रगड़-रगड़ टेढ़ा-मेढा कर देता है, क्योंकि लाखों-लाख आँखें तो खराब नहीं हो सकती कि जिन्हें सीधी-सपाट सड़क भी छल्लेदार लगे,गोल-मोल लगे ………………… जानते हो इस सड़क का नाम जिंदगी है|

जाने कब से रेवा की आँखें छलछला रही थीं| अम्मा चली गयीं पर जुगनू उन्हें आखिर तक मिलने नहीं आई |

“ कोई होता है जो अपने ही ठौर से ऊब जाये, जिसने तुम्हें पाला, तुम्हारे लाने खून-पसीना एक किया अब तुम उसी माँ को भूल जाओ| तुमने उसे बिगाड़ दिया रेवा, इतना लाड़ किस काम का कि औलाद हाथ से निकल जाए| बिन नाल लगी आज़ादी घोड़े और उसके मालिक दोनों को चोट पहुंचती है| ये लड़की तुझे कुढ़ा-कुढ़ा के मार देगी और तुम हाथ पे हाथ रखे रहना|” वो कहती रहतीं रेवा सुनती रहती| बात तो सच ही थी अम्मा की, पहले भी वो ऐसी ही थी, आज भी ऐसी ही है| पहले वो महीनों-महीनों ख़बर नहीं लेती थी और अब सालों-साल|

……………………………..

जाने कैसा तिल है उसके पैरों में जो आजतक उसकी यात्रा रुकी ही नहीं, थमी ही नहीं रही| गाडी सरपट दौड़े जा रही है पर वो जाने कहाँ है? उसे होश ही नहीं कब कौन सा पत्थर पलटा,कौन सा दिन बदला, कौन सा महीना लगा?? जाना भी एक अनवरत क्रिया है, सूर्य एक जगह से जाता है तभी कहीं पहुँच पाता है,चंद्रमा जाता है तभी काले रेशम का थान खुल के बिखर पाता है| पर हर किसी को जाना भी नहीं चाहिये, जाने के लिए विशेष सर्ग जन्म लेते हैं| जैसे जाने के लिए महेंद्र ने जन्म लिया था, संघमित्रा ने लिया था और उसने लिया है, उसने सोचा|

“जुगनू

पिछले महीने तुम्हें बार बार फ़ोन करवाया पर तुमसे बात नहीं हो पाई तुम जाने कहाँ थीं सो अब हारकर ये चिठ्ठी भेज रहे है कि शायद मिल ही जाये तुम्हें| अम्मा ख़त्म हो गयीं पिछले महीने| जाने से पहले तुम्हें देखने की चाह लिए हुए ही चली गयीं | मुझे ही तुमको देखे तीसरा साल चल रहा है| कोशिश करना जल्दी आ सको मिलने, वैसे तो उम्मीद कम है हमें इसकी|

तुम्हारी जीजी”

उसके हाथ में जीजी की चिठ्ठी थी, इसी से उसे नानी के जाने की ख़बर भी मिली| उदासी देर तक उसका थामे बैठी रही| वो जाने कौनसी बार चिठ्ठी पढ़ रही थी| कितनी तल्खी थी इस चिठ्ठी में | भरभरा के जैसे कोई पुल टूट गया हो और इसे जोड़ने की सारी ज़िम्मेदारी अब उसकी थी सिर्फ़ उसकी|

मौसम की नमी इस बार इतनी फैल गयी थी कि फैलते-फैलते उसने खिड़की-दरवाज़ों को अपना स्थायी घर बना लिया था और जिसके चलते घर के सभी खिड़की-दरवाज़े अकड़े पड़े हैं और बंद ही नहीं होते| ऐसी ही एक नहाई हुई सीली-गीली रात में जब छोटे मामा दरवाज़े की सांकल चढ़ाने जा रहे थे ठीक तभी जुगनू का रिक्शा आ कर रुका| उसने एक मिनट उन्हें देखा जैसे भूल ही गयी थी कि उसके और भी रिश्तेदार हैं| उन्होंने उसे देख कर दरवाज़ा खोल दिया|

“ जीजी कहाँ हैं?”

“ऊपर हैं|”

“ऐसी बरसात में ऊपर?”

“ऊपर एक कमरा बनवा दिया है हमने|”

कमरा क्या था वो? कभी एक छोटा सा गुसलखाना हुआ करता था जिसे नया फ़र्श और कलई करवा के जीजी के रहने के लिए बनवा दिया गया था| जीजी को देख उसका मन भर आया,पूरे तीन साल बाद देख रही है वो उन्हें | सेहत तो जैसे रही ही नहीं| ऐसा पैसा किस काम का जो अपनों के काम न आ सके|

“अबके तुम मेरे साथ चलो जीजी” उसने कहा|

“कहाँ?”

“मेरे घर|”

“तुम्हारे घर, कल को तुम्हारी शादी होगी तो इस बुढ़ापे में गत बिगाड़ोगी मेरी|”

“अरे! अब इस उमर में शादी होगी मेरी, आधी तो बीत गयी जीजी|”

“ हमारी तो चाह रह ही गयी|”

“चाह का रंग झील की तरह होता है, इसमें सब सतरंग शाम को ही दीखते हैं | हर चाह आपके  लिए मन में छुपे प्रिज़्म का काम करती है और आपके सुकून को कई कई रंगों में चटका देती है, बिखेर देती है| इसीलिए जीजी चाह से बचना चाहिए, यातना से बचना चाहिए|”

बरसात कब की रुक चुकी थी पर आकाश में बादल अभी भी चंद्रमा के साथ लुका-छुपी खेल रहे थे, कभी उसे ढँक देते तो कभी उघाड़ देते|

“मैंने कागज़ बनवा लिए हैं जीजी|”

“कैसे कागज़?”

“तुम्हारे साथ चलने वाले,अबके साथ ले कर जाऊँगी तुम्हें|”

“क्या सोचा तुमने ?

“किस बारे में?”

“शादी के?”

“अब उस विषय में बात न किया करो जीजी| ये टॉपिक ही ख़त्म है मेरी तरफ़ से|”

देर तक मौसम में चुप्पी की तरल हवा बहती रही| उनींदी सी आवाज़ में रेवा ने उससे पूछा|

“तुम अब भी उन गोलियों को खा रही हो?”

“कौन सी?”

वही जो पिछली बार आयीं थी तब खा रही थीं,याद आया|”

“ नहीं अब नहीं खा रही उन्हें,वो तो डिप्रेशन की थीं कोई साल भर हुआ बंद किये अब तो मन बहुत बेहतर है मेरा, पर कभी-कभी के लिए है अब वो दवा |”

“अब भी सम्भल जाओ क्यों जीवन भर का अकेलापन मोल लेने का शौक़ पाल रही हो?छत्तीस-छत्तीस में भी लड़कियां ब्यहा करती हैं, माँ बनती हैं| कौन उम्र निकल गयी तुम्हारी शादी की?कैसी अजब ज़िदें पाल रखी हैं तुमने जुगनू |”

“अच्छा! क्या अजब ज़िदें हैं मेरी?

“शादी नहीं करने की, अकेले रहने की, लोग तुम्हीं को न बोलेंगे क्या-क्या?

“सब बेटियां अपनी माँ से ही सीखती हैं चीज़ें|”

“हमने क्या गलत सिखाया तुम्हें ?”

“क्यों तुम भी न जाने किसका बच्चा उठा लाई और फिर जीवन भर पाला|तुम्हारा तो बसा-बसाया घर था जीजी| माँ होने की ललक ने जीवन भर को अकेला कर दिया तुम्हें, दो-दो सौ रूपये की नौकरी की तुमने| वो मामा अच्छे थे हमारे निभा ले गये सब| क्यों छोड़ नहीं दिया मुझे? क्यों नहीं लौट गयीं तुम वापस?”

“वो स्वाभिमान था मेरा जुगनू , और अपनी संतान कहीं छोड़ी जाती है|”

“स्वाभिमान, गुरुर कोई ऐसी चीज़ है जिसे हथेली पे पाला जाये|इसे तो मन की खोह में छुपा कर रखना चाहिए|हथेली पर तो नेह,प्रेम पालना चाहिये|”

“प्यार ही तो था तुम्हारे लिए जिसके कारण सब छोड़ मैंने बस तुम्हें पाला जुगनू|

रेवा के हाथ धीरे-धीरे उसका माथा दबा रहे थे |

“ तू एक काम कर जुगनू?

“क्या?”

“तू एक बच्चा गोद ले ले, आस-औलाद रहेगी तो अकेलापन इतना नहीं काटेगा|”

वो बिलकुल भी नहीं चौंकी, जैसे जानती हो आज नहीं तो कल यही प्रस्ताव उसकी राह पे आना था| क्या जीजी उसे अपना सा बनान चाहती हैं? नहीं उनका ये सुझाव तो बार-बार उसका बंद दरवाज़ा खटखटाने के बाद आखिरी दस्तक सा आया है| अब इस दस्तक को समझ उसे दरवाज़ा खोलना है या नहीं ये उसका अपना निर्णय|

उसको चुप देख रेवा ने बात आगे बढाई|

“ईसाईयों से लेले मैंने सुना है वो लोग गोद देने का काम करते हैं|”

“नहीं,मिशनरियों पर अब शायद सरकार ने गोद देने से रोक लगा रखी है|”

“तो फिर संतोष की बहु से पूछ , वो डॉक्टर है उसके यहाँ से लिया जा सकता है|”

“अच्छा देखेंगे|” उसने कहा|

बादल छंट गए थे| चारों तरफ़ चंद्रमा की हल्की नीली रौशनी फैली हुई थी| हवा में बरसात की नमी बरकरार थी|  जुगनू ने पलट के देखा जीजी कब की बात करते-करते सो गयीं थीं |पर नींद की पगडंडी जुगनू की राह से बहुत दूर थी| आकाश पे उजाला था,पर उसके भीतर अँधेरे की एक पूरी रस्सी लिपटी हुई थी| सबसे सीधा और सपाट अँधेरा सबसे ज्यादा डरावना,ख़तरनाक होता है,आड़े-टेढ़े,कुंडली मारे अँधेरे में कम से कम सोया तो जा सकता है| उसने सोचा और पलकें झपका लीं|

……………………………

मेरे भीतर एक अहाता है जिसके अंदर परकोटे ही परकोटे हैं, सर्पीले वृत्त हैं जिनमें फंस कर न ही मुझे अब तक इसका पहला और न ही आखिरी सिरा मिला है| मैंने उम्र के कितने ही साल इसके सिरे को ढूंढने में गुज़ार दिए पर पाँव आज भी एक ही जगह जमे हुए हैं|दिल तक कभी कुछ पहुँच ही नहीं पाया| शहरग से छोटी ज़रा सी छोटी जो रग है न हको-हुकूक के  लिहाज से उसे ही दिल तक जाना था| पर देखिये पहुँचता कोई और ही है| कई बार एक-एक सीढ़ी का अंतर पूरे का पूरा दायरा ही बदल देता है |ये भी ज़रूरी नहीं जो हस्बेमामूल हो वो बहुत आसन हो और हो भी जाये| और इसे आसन बनाने के लिए हम हर दूसरे-तीसरे के आगे हाथ फैला देते हैं कि देखिये इन हथेलियों में कुछ है या नहीं| मेरा मन आजतक ये समझ ही नहीं पाया कि प्रेम क्या है और उसकी अहर्ता क्या? पर मुझे लगता है कि प्रेम की सबसे बड़ी अहर्ता ये होनी चाहिए की प्रेम स्वयं अनिवार्य नहीं होना चाहिये| जैसे नारंगी,ताम्बई,पीले,हल्के हरे,गहरे हरे पत्तों के साथ एक ही शाख पे रह लेते हैं,ऐसे ही रहिये…………… कंधे बस आंसुओं की नमी सोखने के लिए बने हैं,न की आंसुओं से गल कर गिरने के लिए | रेशम से जज़्बात,आँखों के उजाले, हंसी के तार और भी न जाने क्या-क्या? इन सब बातों में कई बार बड़ी बोरियत छुपी होती है| हर बंदगी का हक़ अदा करना यूँ भी आसन कहाँ है? सांस लेने दीजिये,सांस लीजिये| जलने वाली हर चीज़ एक रोज़ जल ही जाती है | धूप हो ,उजाला हो, या शरीर| प्यार तो खैर बड़ी अनदेखी चीज़ है| जलने लायक हुई तो जल ही जायेगी| फिर कई बार मुझे लगता है ये कैसे जल पायेगा? क्योंकि प्यार में एक सतत गीलापन है,डेम्पनेस है| ये सीलन नमी की नहीं है| ये एक अलग तरह के अंधेरे की है| ठीक जैसे किसी मंदिर के अँधेरे गर्भ-गृह में होती है | आप अँधेरे के उस भीगे-निचुड़े तत्व को महसूस कर पाते हैं पर छू नहीं सकते| इसलिए अब मुझे लगता है कि प्यार मन भीतर खिलने वाला एक इंडोर प्लांट है| ये सब किसी डायरी के पन्ने नहीं हैं| डायरी मुझे लिखनी ही नहीं आती| ये चिठ्ठी भी नहीं है कि चिठ्ठी के मिजाज़ अलग हुआ करते हैं | ये कागज़ के टुकड़े पे लिखा गया कुछ ऊल-जलूल सा है, जिंदगी के रंग जैसा| हाँलाकि इसे देखने वाली सभी आँखें को रंगों की पहचान ही नहीं होती हैं| तो अपनी मर्ज़ी के लिहाज से, सुविधा के हिसाब से हर आदमी ज़िंदगी का अलग रंग मान लेता है| जैसे मैंने कभी ओक नहीं देखा पर सुना है कि इसके पत्ते गहरे लाल रंग के होते हैं,सुर्ख अंगारों की तरह| तो मैंने ज़िंदगी का रंग शाहबलूत के पत्ते की तरह गहरा लाल मान रखा है| जबकि पता है की ज़िंदगी में स्याह-सफ़ेद का चक्का ज्यादा है लाल रंग कम| हम ज़िंदगी भर एक असासा,एक पूँजी बनाने की कोशिश करते हैं| इस असासे को माँ-बाप दोनों मिल कर बनाते हैं| पर कई दफ़ा ये ज़िम्मेदारी किसी एक पर आ जाती है, तब मुझे ऐसा लगता है कि जो पूँजी माँ के हाथ तैयार होती है उसके मिजाज़ में एक नर्मी रहती है| इसके बनने से ज्यादा सावधानी इसे खर्चने-बरतने में रखनी पड़ती है| ये ठीक वैसे है कि एक चाँद पहाड़ की ओट तले निकले और एक झील की सतह पे| मुश्किलें,परेशानियाँ झील वाले चाँद को ज्यादा मिलती हैं| ये बार-बार परछाईयों में बनता है, बिगड़ता है पहाड़ के मजबूत चाँद से उलट| पर कहीं किस्से-कहानियों, गीत-ग़ज़लों में झील के चाँद के अलावा कुछ और सुना है? नहीं न !! जिंदगी का असासा शाहबलूत की सुर्खी से ले झील की चाँदी के बीच डोलता रहता है |

…………………………..

जैसे कई लोग काष्ठदारु को अशोक का पेड़ मान कर जीवन भर उस पर लाल-सफ़ेद फूल खिलने की आशा पाले फिरते हैं| ठीक वैसे ही उसने सड़क पार दूर किसी अजब से पेड़ को अपने मन की राहत के लिए शाहबलूत का नाम दे दिया था| दिनों-दिन बड़ी उम्मीद से खिड़की खोली जाती कि कोई तो पत्ता लाल दीखेगा| मौसम बदल रहे थे| दूर किसी ध्रुव के अजाने-वीरेने इलाके में किसी झील के ऊपर बर्फ़ लहक-लहक के झूल रही थी और तह-दर-तह जमा हो रही थी| कहीं किसी दूसरे देस में असल शाहबलूत के पत्तों का रंग बदल रहा था, लाल हो रहा था| उधर पहाड़ की बड़ी-बड़ी बाहों के नीचे खड़ा पेड़ आख़िर जाने क्यों एक ही पत्ते को संभाले खड़ा था? उसने सोचा जाने कब ये पत्ता रंग बदलेगा| हवा का एक झोंका जाने कब आया और अपनी चादर लहरा के शाम के सर पर ओढा दी| खिड़की के कोने पे बैठा कबूतर फड़फड़ा के उड़ गया| कैसे जाने शाख से बंधे पत्ते का टांका खट से टूटा और पत्ता आज़ाद| सड़क पे सर्रर्र से एक गाड़ी गुज़र गयी और ज़मीन पर आता पत्ता गाड़ी के साथ उड़ता-उड़ता दूर खो गया|

“ लो ये भी तमाम हुआ|” उसने कहा और देर से पकड़ा हुआ खिड़की का पर्दा छोड़ दिया| वो पलटी तो उसने देखा कि पलंग पर जीजी से लिपटी एक छोटी बच्ची गहरी नींद में सो रही है| जुगनू ने महसूस किया कि मन की शाख का सूखा लाल पत्ता एकाएक हरा होने लगा है | वो मुस्कुराई और पर्दा खींच कमरे में अँधेरा कर दिया ताकि सोने वालों की नींद न टूटे !!!!!!

कहानी अब तक…

शाहबलूत का पत्ता!!! – भाग – १

शाहबलूत का पत्ता!!! – भाग – २

शाहबलूत का पत्ता!!! – भाग – ३

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