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शाहबलूत का पत्ता!!! – भाग – ३

उदासियों के चेहरे कभी बूढ़े नहीं होते !

“लश्कर-बॉम्बे” यादों में झिलमिलाता ये नाम उसे अब भी रातों में जगा जाता था | वही उम्र थी उसकी सत्रह-अठारह साल, इंटर के इम्तिहान दिए थे| कैसी गरम आंधी भरी शाम की रात थी वो उसे आजतक याद है| उसके एक हाथ में सुनार का बटुआ था जिसमें सत्रह सौ रूपये, जीजी की एक चूड़ी और छोटी मामी की दो अंगूठियाँ थीं,और दूसरे हाथ में रतीश का हाथ था| कैसा रूमान था जो उसकी देह में घर कर गया था?, उसका एक पाँव गाड़ी के पायदान पर था दूसरा हवा में, कि जीजी की चौड़ी कलाई ने लपक के उसकी बाँह पकड़ ली| एक ही झटके में कितने ही रुपहले,चमकदार,चिकने सपने चकनाचूर हो गये| मन की फसल को पाला मार गया| सत्रह-अठारह के सपने कहीं तोड़ने के लिए होते हैं| वो पहली और आखिरी बार था जब जीजी ने उसे मारा था|

वो आज जब ये याद करती है तो हंस-हंस पड़ती है की कैसे घर से भाग जाना उस समय उसके लिए प्रेम का सबसे बड़ा रोमांच था| हाँ पर ये ही पहली बार था जब उसके मन में जीजी के लिए बैर पड़ा था,समझ के साथ उसने मन की गाँठ तो खोल दी पर आज भी कभी कभी वो उसे  छूने भर से महसूस कर लेती है| उसने घड़ी देखी साढ़े-चार बज गए थे| सामने के पहाड़ धूप में तप-तप कर भूरे-सलेटी, लाल-कत्थई से हो गए थे| उन तक जाने वाली सड़क ऐसे लग रही थी जैसे उस पे लपलपाते शोले बिछे हों| वो देर तक सामने के तपते हुए पहाड़ देखती रही| मध्य-पूर्व के इस छोटे से देस के ये पहाड़ क्या बरसात की कामना करते होंगे? क्या सोचते होंगे ये जो इनकी देह की दरारों में से न आह न धुआँ कुछ भी तो नहीं निकलता? ये आकाश को देख कर क्या बोलते होंगे? वो जब से यहाँ आई है उसने पानी की एक छींट भी बरसती नहीं देखी| इस तपते-जलते मरुस्थल सा ही मन है उसका, भभका सा उठता है और ख़ुद ही बैठ जाता है| जाने कौन  समय है और कैसा पानी जो इन पहाड़ों के भीतर तो है पर छलकता नहीं| जबकि पानी के व्याकरण में ही मुड़ना लिखा है| इसकी धातु इतनी तरल, इतनी सहज है कि आँख से ले कर कुँए,और कुँए से ले कर गले तक भरी रहती है| पर सहज होना इतना आसन भी नहीं| सब से सहज सब से दुर्लभ है आज के समय| आप पानी को ही देखिये मार ज़माने भर की हाय-तौबा मची है इसके लिए| पर पानी क्या ऐसा ही है जैसा मुझ को दिखाई देता है?कौन जाने आपका पानी मेरे वाले से कम गीला,कुछ ज्यादा गाढ़ा या कुछ ज्यादा सीला हो| समय ही अपनी धारणा,अवचेतन में इतना टूटा-टूटा है कि उसका एक टुकड़ा मुझे चमकीला लग सकता है ठीक वही आपको कांच| समय एक ही समय दो स्तर पे यात्रा कर रहा होता है| ठीक एक पल मेरे दिल में डूब के उसी पल किसी और के दिल में उभर सकता है| इसीलिए समय की दीर्घा से सबसे पहले हाथ पकड़ कर समय को ही बाहर खींचा जाता है उसके बाद उसकी बनी परछाईयाँ बाहर फेंकी जाती हैं| ये चेतना का कौन सा आयाम होता है अभी इसका पता नहीं| यूँ भी चेतना इतनी ही चेष्ठा करती है कि किसी को गर्भजल में सुप्त नहीं होने देती| जल के बाहर तो मात्र अचेतन ही बिखरा हुआ है| इस माने चेतना का जीवन बहुत ही छोटा होता है,जैसे कोई बूँद भर| पर जब बैठे-बैठे जी भर आये और गला ख़ुश्क, ऐन उस वक़्त जिस पानी की तलाश में आप भागते हैं ये वही गले में अटका पानी है या कोई दूसरा या वही नन्हीं बूँद| एक सी दीखने वाली चीज़ या एक ही चीज़ सबको सामान लगे ये अभी तक रहस्य ही है| मेरे सब रंग कौन जाने आप के लिए भी उतने ही चटकीले हैं भी या नहीं| मेरे लिए जो नीला-बैंगनी है वो आपकी जानिब धूसर या भूरा तो नहीं| ये पहाड़ आकाश को देख कर कोई कामना कर पाते होंगे ? “जैसे धान बोया जाता है बरसातों में ठीक वैसे ही तुम बरसातों में मेरी पीठ पे समय बोना”  क्या कुछ ऐसा कह पाते होंगे, या कभी कोई भटकता बादल झुक-झुक कर इनके कानों में ऐसा कहता होगा “हर अतल के गहरे में एक तल छुपा होता है, ज़रा ऐड़ी पर उठ कर तो देखो”| ये सब दिमाग की कोई मनगढ़ंत बात हो या सच ही, उसने सोचा|

ठहरे हुए मन की तह पाना यूँ भी कहाँ आसान है| जुगनू के मन में भी समय की एक कील धंस गयी हो मानो| भीतर जो भी पूरा है, सम्पूर्ण है ये कील उसे ही टुकड़ों-टुकड़ों में बाँटे दे रही है| इसके एक किनारे वो है और दूसरे जीजी| सब अधूरा है उसके लिए, कुछ भी पूरा नहीं| पूरा तो कोई जी ही नहीं पाता| सौ टका कुछ भी नहीं होता| निन्यानवे में भी एक मिला के सौ बनता है| बिना मिलावटों के जिंदगी है ही नहीं| हर खरी चीज़ की नींव में कोई और भी मिला होता है, जैसे उसकी नींव में जीजी का कितना ही श्रम, दुःख, और प्यार मिला हुआ है जिसे उसने बार-बार जाने-अनजाने रौंदा ही है| जीजी का चेहरा बार-बार उसे याद आता और ओझल हो जाता| ये चेहरा वही है जब उनकी उम्र के पत्ते कुछ हरे थे| लाख चाह के भी जुगनू की आँखें जीजी के आज के चेहरे को ढूंढ ही नहीं पा रही थीं| सालों से उन्हें देखा ही नहीं, उसके अकेले रहने की चाह ने उसे कितने ही तरह के यातना गृहों में धकेल दिया है|

उसने देखा घड़ी साढ़े चार पे कब से रुकी पड़ी थी| समय अपने चक्के पर आधा रुका हुआ था ठीक उस की तरह| उसने सामने रखा मोबाइल उठाया और जीजी का नम्बर मिला दिया|

“ तुम उदास हो क्या? जीजी ने उसकी आवाज़ सुनते ही पूछा|”

“नहीं तो|”

“कब आ रही हो तुम जुगनू?”

“देखो जल्दी ही|”

“तुम्हारा जल्दी तो पिछले तीन साल सुन रहे हैं, अबके आओ तो कुछ बात हो|”

“क्या?”

“जुगनू , तिरेसठ हो गई उमर मेरी, तुम ख़ुद ही तेंतीस की हो| तुम्हारे हाथ पीले करूँ तो फ़ारिग होऊं| कब तक माँ को दुनिया की बातें सुनने को छोड़ ख़ुद में मगन रहोगी|”

“मुझे शादी ही नहीं करनी जीजी|”

“तो क्या जीवन अंधेरों में काट दोगी?”

“जीजी……………मैंने सोचा है बहुत पर हिम्मत नहीं होती| मुझे लगता नहीं की मैं इतने बड़े बंधन में बंध पाने को तैयार हूँ|

“मन तो हर काम से डरता है शुरू में बाद में फिर ख़ुद ही रम जाता है| आँख उठा के देखो हर घर में कुछ न कुछ फिर भी घर चल ही रहे हैं|”

“आँख उठा के तो सबसे पहले तुमको ही देखा था| तुम्हारा अपना घर ही कहाँ चला? तुम्हें जीवन भर खटते देखा,अकेले देखा, और शायद ऐसा ही डर तुमसे उतर मेरे भीतर आ गया है|”

“लाली जरुरी तो नहीं कि तुम भी माँ की लीक पकड़ चल निकलो|”

“जीजी ज़रूरी तो जीवन में कुछ भी नहीं |”

“ ठीक है फिर आगे तुम्हारी इच्छा|” कह कर उन्होंने फ़ोन रख दिया|

इस एक पल के बाद रेवा के लिये सब रुका हुआ है, ठहरा हुआ है| हाथ-पैर चलते हैं पर मन थम गया है| दुनिया को दीखता ही मानो सब सुचारू है पर उन्होंने भीतर सीलन का एक धब्बा पकड़ लिया है| जो दिनों-दिन बढ़ कर फैलता जा रहा है| ऐसी कोई शाख़ ही नहीं जो बारिश के बाद काँपे और एक बूंद भी न छटके| पर उनके आस-पास तो सब सूखा है, फिर ये बारिश- सीलन कैसे पनप रही है? बहुत गौर करने पर उनने जाना कि ये उदासी है जो उनके भीतर बैठ गयी है और अब फैलती जा रही है|

क्या फ़र्क है ख़ुशी और उदासी में उनने ख़ुद से पूछा और फिर ख़ुद को कोई उत्तर नहीं दे पाई|

“उदासियाँ खुशी के बरक्स ज्यादा बोलती हैं| यूँ भी देखो न हँसी सिर्फ़ उतनी ही फैलती है जितना कि होंठ खिंच पाते हैं और आँखें छलछला जाती हैं , जबकि उदासी में आँसू भी ज्यादा निकलते हैं और आँख भी देर तक गीली रहती है|”

जुगनू उनके जीवन की ख़ुशी थी और उसका अकेलापन उनकी उदासी का स्थायी साथी|

कहानी अब तक…

शाहबलूत का पत्ता!!! – भाग – १

शाहबलूत का पत्ता!!! – भाग – २

आगे की कहानी…

शाहबलूत का पत्ता!!! – भाग – ४

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