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शाहबलूत का पत्ता!!! – भाग – २

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चिठ्ठियाँ जिंदा लाश होती हैं!

धूप का तीखापन, दोपहर की निसंगता और उजाड़ सा अपना अस्तित्व खोता ये छोटा स्टेशन| उसने दायें-बायें सर घुमा के देखा, एक चमकदार चौंध हर ओर पसरा पड़ा था|दूर-दूर तक सिवाय चिमनियों के कुछ और नज़र नहीं आता था| या तो उस चौहद्दी के बाहर हर चीज़ बहुत छोटी है या अब ये चिमनियाँ बहुत ऊंची उठ गयीं हैं| पिछली बार जब आई थी यहाँ तो सात साल पहले आई थी|उस समय ये नया पुल नहीं था इसकी जगह जर्जर, हिलता- काँपता बिलकुल इसका जुड़वां पुल था या ये उसका जुड़वां है|  जीजी की चिठ्ठी न आई होती तो वो अबके भी नहीं आती| हर साल आना यूँ ही टाल देती है वो| अब ये शहर सिकुड़ते-सिकुड़ते इतना छोटा हो गया है कि उसकी स्मृति-पटल और मन से कब का गुम हो चुका है,मिट चुका है| मिटना बनने से भी जटिल प्रक्रिया है ठीक वैसे ही जैसे धूसर होना चमकीले से भी ज्यादा कठिन | मिटने-बनने के बीच एक पड़ाव वो भी होता है जिसे उजाड़ कहा जाता है| जैसे पहले शहर उजाड़ हो जाते हैं और फिर डूब जाते हैं, ठीक वैसे ही आदमी पहले उजाड़ होता है फिर मिट जाता है| फ़र्क बस इतना होता है कि शहर मिटते हैं तो कुछ सदियों का इतिहास गर्क़ होता है और आदमी मिटता है तो सदियों के इतिहास के साथ भविष्य भी गर्क़ हो जाता है| फिर भी मिटने में एक चमकीला सितारा छुपा होता है, जिसे देखने के लिए धैर्य चाहिये | पर धीर धरने वाले बहुत होते ही कहाँ हैं?

जीजी ने एक बार उसे चिठ्ठी लिखी थी, जाने कितने साल पहले| अब तो कुछ याद ही नहीं रहा क्या लिखा था और क्या नहीं ? उसका जो सार याद रह गया है तो बस इतना ही कि………

“धैर्य अजन्मे की तरह होता है जो समय से पहले हो जाये तो कमज़ोर और समय बीतने पर तो उसके गले पे नाल लिपटी होती है| उसे मरना तो दोनों ही हाल है| कोई बिरला ही इस अजन्मे को समय पर ला पाटा है|”

जाने कब रिक्शा रुका और जुगनू की तन्द्रा टूटी| गली बस इतनी बदली थी कि ईंट का खड़ंजा हटा कर सीमेंट की सड़क बना दी गयी थी उसकी जगह| बाहर का बरामदा धूल की पतली परत से ठीक वैसे ही ढका था जैसे बरसों पहले गर्मियों में रहता था| कुछ भी तो नहीं बदला था, वही मई की झोंके खाती दोपहर थी, वही पाठक जी का लहक-लहक बिखरता गुलमोहर| वो बहुत देर दरवाज़े पे खड़ी रही,इसे खटखटाये या नहीं| क्यों होता है ऐसा आप अपने ही दरवाज़े पर दस्तक देने से घबरायें| घर बाहर और घर भीतर के माहौल में क्यों ज़मीन-आसमान का अंतर आ जाता है, कि आप चाह कर भी मन पर चढ़ी सांकल खोल ही न पाओ, उसने सोचा|

कौन थी वो इस घर की? कोई भी तो नहीं | जाने किस सनक में, माती कहाँ से उठा लाई थीं उसे और जीजी को पालने जिम्मा दे डाला उन्होंने| कोई नहीं जानता ,जीजी ख़ुद ही नहीं जान पाई आजतक तो वैसे ऐसे जान पाती | कहने को तो वो उसकी ही माँ थीं पर बाकी लोगों की देखा-देखी वो भी उन्हें जीजी कहती थी|  उसके लिए जीजी सब छोड़-छाड़ यहाँ मायके आ गयीं और फिर लौट कर कभी वापस नहीं गयीं भोपाल| उन्हीं के लिये उसका मन बार-बार रूखा हो जाता है| रेशम से नेह में वो क्यूँ जान के बार-बार सूत का धागा पिरो रही है |

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जीजी का चेहरा बदल कर बिलकुल नानी जैसा लगने लगा था| वैसा ही माथा,लम्बी ठोड़ी और ढ़लती हिम्मत| इसी हिम्मत के सहारे उन्होंने जुगनू के लिए तेंतीस साल काट लिये थे| न वापस ही गयीं और न ही कभी दरोगा को फटकने दिया|

“ तुम्हें इतनी चिठ्ठियाँ लिखीं तुमने एक का भी जवाब नहीं दिया जुगनू|”

“क्या करूँ जीजी मन ही नहीं होता| चिठ्ठी लिखने के मामले में बहुत काहिल हूँ तुम जानती तो हो|”

“अरे! चिठ्ठी है कोई तेरह का पहाड़ा तो नहीं कि याद ही न हो| या ये भी भूल गयीं कि माँ ने कितने दुख पी- पी कर पाला है तुम्हें|”

“दुख सबसे साफ़ पानी है जीजी|” उसने हंस कर कहा|

“इतना साफ़ कि पी-पी कर तुम्हारी माँ का कलेजा ही छिल गया| और तुम सात साल में अब झाँकने आई हो|”

“क्या करूँ मेरे आस-पास इतने घनेरे जंगल, अरण्य हैं जीजी कि मौका ही नहीं मिलता कुछ लिखने-करने का !!”

रेवा ने उसका हाथ थाम लिया| उसका हाथ ही ठंडा था या ये रात की नमी थी ये वो समझ ही नहीं पाई |

“हैं कैसा अरण ?”

“जीजी अरण्य वही होता है, जो जी के भीतर होता है| जहाँ से आप सदा जीवन के आखिरी पत्थर के पलटने तक बाहर निकलने के लिए भागते रहते हैं| बाकी सब ओस से उगने वाली घास के तिनके हैं |”

“तुम शादी को हाँ कहो तो इस घर में भी बन्ना-बन्नी गाये जायें|” रेवा के स्वर में अब रिरियाहट थी |”

“ जीजी मुझे भोपाल में एक अच्छी जॉब मिल रही है| सोच रही हूँ चली जाऊं |”

रेवा ने उसे देखा और फिर करवट फेर कर सो गयी| उसने भी तकिये पर सर टिकाया और आँखें बंद कर लीं| पर वो जानती थी इस करवट का साफ़-साफ़ मतलब न है| इतनी कड़ी कि जो मुँह से कही भी न जाये|

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पटरियों के बीच कभी-कभी कोई सब्ज़ा, कोई फूल दिख जाता तो जुगनू का मन हरा हो जाता था और फिर वही सूनेपन की लय|

“शादी नहीं करेगी तो क्या करेगी जुगनू ? उमर यूँ ही झर जायेगी|” ये नानी के आख़िरी बोल थे उससे उसके बाद उन्हें देख ही कहा पाई वो|

वो चुप रही एक शब्द भी नहीं कहा नानी से पर वो जानती थी कि…………………

“झड़ना बसंत की चिरनियति है उसे कोई रोक नहीं सकता| लोग अंजुरी भर फूल तोड़ते हैं और किसी भी प्रतिमा के पैरों में चढ़ा देते हैं| जूड़े में फूल लगाते हैं और सूखने पे फ़ेंक देते हैं,  बहुत हुआ तो सिंगारदानी पे रख छोड़ते हैं| जीवन भर शादी-शादी की रट लगते हैं और गले में पहने हार दूसरे ही दिन खूंटियों पे सूखने के लिए टांग छोड़ते हैं या किसी नदी के बहते किनारे पे खड़े हो लहरों के साथ बहा देते हैं| उसपे दुमायत ये कि बौराहट में बसंत को पतझड़ से ऊंचा मान लिया है| जबकि पतझड़ तो देह झटकता है, पुराने पात उतार नए पहन लेता है| ये ठीक वैसे ही है जैसे कोई नहाते हुए पत्थर से घिस घिस के डेड स्किन उतरता हो| तो बसंत- बसंत चिल्लाने की बजाय पतझड़ की तरह बनिये| उठिए देह झटकिये पुराना सारा दुःख अवसाद उतार फेंकिये और नयी चमक, जीवन के हरे रंग को पहन लीजिये|”

जुगनू ने अपने पर्स में से चिठ्ठियों का एक पुलिंदा निकाला और चिंदी-चिंदी कर रेंगती हुई ट्रेन से फेंक दिया| अब ये उसका प्रिय शगल था कि दफ़्तर से छुट्टी लो और भटकने निकल जाओ| वो देख रही थी पुर्ज़ा-पुर्ज़ा चिठ्ठी ऊपर उड़ती और धम्म से नीचे गिर जाती|

चिठ्ठियाँ जिंदा लाश होती हैं ये जब तक आपके पास रहती हैं आपको परेशान करती हैं इसीलिए इन्हें पढ़ते ही फाड़ देना चाहिए और इनसे निजात पा लेनी चाहिये| उसने सोचा|

कहानी अब तक…

शाहबलूत का पत्ता!!! – भाग – १

आगे की कहानी…

शाहबलूत का पत्ता!!! – भाग – ३

शाहबलूत का पत्ता!!! – भाग – ४

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