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शाहबलूत का पत्ता!!! – भाग – १

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प्रेम, युद्ध से पलायित देवताओं का स्वांग भर है!

चौमासों की रात, रात की उमस और आकाश में बादल| आकाश का हर हिस्सा आज बादलों से पटा पड़ा था | बूँदें लबालब भरी हुई थीं, इतनी कि कोई एक बूँद भी हिले तो बीच का तारतम्य ही टूट जाये | “आज पानी न पड़े” उसने सोचा |

उधर छत पर कोई किसी को कहानी सुना रहा था जिसके टूटे-टूटे शब्द उसके कानों में पड़ रहे थे|

“आला खोल टटिया, बाला खोल टटिया, में खोल टटिया, चें खोल टटिया|”

उसे यूँ लगा जैसे कोई मन भीतर के किवाड़ खटखटा रहा हो| बार-बार कह रहा हो खोलो, खोल दो ये दरवाज़े जिनके पीछे जाने क्या-क्या बंद कर रखा है तुमने?

सरसराती बूँद जैसे ही उसके माथे पे पड़ी, किसी ने भड़भड़ा के मन के किवाड़ खोल डाले| उदास रातों की उदासी अब उसकी आँखों से झर रही थी| उधर चें अपनी माँ को बता रहा था कि कैसे धोखे से भेडिये ने आला, बाला,में को खा डाला और कैसे उसने छुप के अपनी जान बचाई| दिल के प्यारे यूँ भी कब किसी के साथ लम्बे समय तक रहते हैं, उसने सोचा और आंगन से खींच के खाट बरामदे में डाल दी और बड़बड़ा न शुरू कर दिया|

“मन में तो चौमासा नहीं है यहाँ तो अगहन उतर पूस लगा है और ऐसी ठण्ड में कोई मन उघाड़ता है कहीं अपना| मन यूँ भी मन है कोई मिट्टी का ढेला तो नहीं कि ओस झरे और बिरवा-पात फूट पड़े| मन सूखने के बाद कभी हरा हुआ है भला| मन का सूखना जमीन के सूखने से भी ज्यादा ख़तरनाक है| मन के सूखने से आस भी सूख जाती है|” रेवा के तो मन और आस कब के ही सूख चुके थे|

रेवा ने टिमटिमाते बल्ब कि रौशनी में गर्दन घुमा के देखा लम्बे बरामदे को अँधेरे,सीलन,नमी ने एक साथ घुल-मिल के डरावना सा बना दिया था| गर्दन घुमा के देखने पर अँधेरा ही दीखता है उसे उसके आगे कुछ नहीं, और अब दूर तक देखने के लिए बचा ही क्या है उसके पास?

अम्मा न जाने कब से आकर उसके पीछे खड़ी थीं|

“ऐसे चौरे में क्यों सुला रखा है इसे,अंदर ले जाओ, बरसाती हवा है छाती में बैठ जायेगी|”

“अंदर बहुत उमस है| तुम क्यों सोते से उठ के आ गयी|”

“हम तो इसकी गद्दी देने आये थे,दिन में ही बना ली थी| और सोचा तुम से चाय की पूछ लें अपने लिए जा रहे थे बनाने|”

“नहीं, रहने दो मन नहीं है|”

“तुम वापस क्यों नहीं चली जातीं रेवा, कब तक भाइयों के ऊपर रहोगी|जाने किस जात-कुजात की लड़की को बेटी बना के उठा लाई हो|

“ इस आठ महीने की बच्ची में तुम्हें जात-कुजात दीख रहा है तुम्हें |”

“क्या करोगी यहाँ रह कर?  कल को तुम्हारे भाईयों के अपने घर होंगे तब कौन पूछेगा तुमको? जिनगी कोई ऐसी चीज़ तो नहीं जिसे जैसे चाहो वैसे चला लो| ऐसी ज़िदों से कहीं गिरस्थ्थी चली है भला|”

“इसका कोई जवाब नहीं है अभी मेरे पास अम्मा| और क्या मालूम भाई निभा ही लें?”

“निभा भी लें तो भी तो तुम अपने लिए कुछ नहीं करोगी क्या?”

“क्या करूं?”

“ कुछ काम ही कर लो| कोई नौकरी? इस लड़की के लिए ही सही थोडा सा चेत जाओ? बी.ए. तो हो ही तुम|”

“बी.ए करने ही कहाँ दी तुमने अम्मा, पहले साल के बाद ही तुमने शादी कर दी अब इतने साल बाद आधी-अधूरी पढाई की क्या बिसात?”

“अरे इन्टर तो हो ही|”

“खाली इन्टर  से क्या होगा?”

“अरे! आंगनबाड़ी में ही भर्ती हो लो,पौने दो सौ मिल रहे हैं|”

“ठीक है भर देंगे फ़ार्म |”

“दरोगा की तीन चिठ्ठी आ चुकी हैं अब तक| कहो तो भैया से ख़बर भिजवा दें कि आके ले जाये तुम्हें|” चली ही जाओ तो ऐसी कोई नौबत ही नहीं आये|”

“नहीं कोई ज़रूरत नहीं है| तुम जाओ सो जाओ अम्मा, बाद में बात करेंगे कभी|”

दरोगा बस नाम ही के दरोगा थे| उनके पिता पुलिस में थे तो उन्हीं ने ठेलठाल के इन्हें हबीबगंज की किसी चौकी में लगवा दिया था| दरोगा सुबह मुँह अँधेरे साइकिल से शहर भोपाल के इस कोने से उस कोने जाते और सांझ डूबे लौटते| रेवा की जिंदगी यूँ ही चल रही थी|साइकिल की आवाज़ से दिन उगता और साइकिल की आवाज से ही सांझ ढल जाती| रेवा के चौदह साल यूँ ही सांझ सवेरे में कट गए| कट तो और भी जाते अगर बाऊ उसे धक्के मार के बाहर न निकाल देते| माती ने चौदह साल टकटकी लगा इस उम्मीद से काट दिए कि उनके बेटे दरोगा के घर कोई आस उम्मीद खिल बढ़ जाए और जब कुछ नही हुआ तो आख़िर में घर भर से बैर मोल ले कर उनने रेवा की गोद में  जाने कहाँ से लाकर एक बच्ची डाल दी| बाऊ शुरू से ही इस गोद ली हुई बच्ची के खिलाफ़ थे पर माती के दबंग व्यक्तित्व के सामने उनकी एक न चली|  माती ही रेवा का कितना साथ दे पाई, तीन महीना बस | माती के जाते ही बाऊ ने रंग दिखाने शुरू कर दिए|

“सुन कहीं मेंढकी के टर्राने से आसमान गिरे है?” देर तक उसका रोना सुन बाऊ बोले|

“ मेंढकी अगर न टर्राये बाऊ तो आसमान में सूखा पड़े है, और सूखी चीज़ तो कभी भी भरभरा के ढह सकती है, गिर सकती है| जिन इमारतों की नींव में बादल नहीं, झील नहीं, नमी नहीं उनकी छतें एक दिन सूख जानी हैं| रेशा-रेशा पलस्तर गिरे है जिंदगी का फिर, इसीलिए थोड़ी नमी और कोने-कुब्जे की टर्राहट का होना बहुत ज़रूरी है|”

उसका जवाब सुन बाऊ जैसे आपा खो बैठे| एक ही धक्के की चोट से रेवा बच्ची समेत घर के बाहर आ गिरी| दरोगा दूर खड़े चुपचाप सारा तमाशा देखते रहे|  रेवा ने दरोगा को देखा वो चौखट से लगा खड़ा था और उसे ऐसे देख रहा था जैसे वो कोई लकड़ी की मूरत हो जिसके आंसू  और आवाज़ उसकी आँख और कानों की पहुँच से दूर हो| कपूर की तरह धुआं- धुआं हो गया सब रेवा के लिए|

आज उसे वापस आये पांच महीने हो गए ,इस बीच दरोगा की तीन-तीन चिठ्ठियाँ आ चुकी हैं पर रेवा ने न ही उन्हें खोला और न ही औरों को खोलने दिया| अम्मा उसे जितनी ही बार जाने को कहती वो उतनी ही बार मन में दरोगा की एक तस्वीर बनाती और अम्मा से मना कर देती|

अम्मा की आँखों की नमी रेवा के मन में उतर आती ,और अब उसका सारा दारोमदार अपने भीतर की इसी नमी को बचाए रखना था| बरामदे की जिस तरफ़ खाट थी उससे लग कर ही खुली मोरी थी|बरसात का पानी उसमें बने सब अवरोधों को पछाड़ता हुआ बहा जा रहा था| रेवा ने बच्ची की करवट बदली, नीचे नयी गद्दी लगाई और चादर ऊपर तक सरका दी| छत पर अब कोइ नहीं था| न कहानी सुनने वाला और न ही कहानी सुनाने वाला सिवाय बरसते पानी के|  कौन जाने ऐसी बारिश भोपाल में भी हो रही हो उसने सोचा | दरोगा का सारा जीवन खोखले प्रेम पर था, और उसका जिजीविषा का युद्ध| जो प्रेम का स्वांग भरते हैं वो वास्तविकता में जीवन के युद्ध से पलायन कर रहे होते हैं| प्रेम इसीलिए युद्ध से भागे देवताओं का स्वांग भर है और कुछ नहीं|

आगे की कहानी…

शाहबलूत का पत्ता!!! – भाग – २

शाहबलूत का पत्ता!!! – भाग – ३

शाहबलूत का पत्ता!!! – भाग – ४

 

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