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व्यापम बेताल कथा

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विक्रम-बेताल से कहीं ज्यादा लोमहर्षक है, व्यापम बेताल कथा। वह कहानी राजा विक्रमादित्य के ज़माने की थी, यह कहानी राजा शिवराज सिंह के जमाने की है। उस कहानी में बेताल को राजा जबरन अपने वश में करता और अपने कंधे पर लादकर आगे बढ़ता था। इस कहानी में राजा पिंड छुड़ाने को जी-तोड़ कोशिश कर रहा है। लेकिन बेताल है कि पीछा छोड़ने को तैयार ही नहीं है। मंत्र अनुष्ठान, पूजा हवन सब बेकार साबित हो रहे हैं। बेताल कंधे पर सवार है। बेताल भगा रहा है, राजा भाग रहा है। किसी तरह जतन करके राजा बेताल को दूर किसी डाल पर टांग आता है। लेकिन कंबख्त बेताल डाल-डाल झूलता फिर से राज दरबार धमकता है। ये सिलसिला ना जाने कब से चल रहा है। पुरानी कथा में बेताल राजा विक्रम को कहानी सुनाता, फिर प्रश्न पूछता और उत्तर ना देने पर सिर के टुकड़े-टुकड़े कर देने की धमकी देता था। लेकिन सिर के टुकड़े कभी नहीं होते थे, क्योंकि बुद्धिमान राजा हर बार तर्कसंगत उत्तर देकर बच जाता था। 

लेकिन व्यापम बेताल कथा इस मामले में थोड़ी अलग है। व्यापम की कहानियों में राजा की कोई रुचि नहीं है। वह कोई कहानी नहीं सुनता, इसलिए उत्तर देना का भी कोई प्रश्न नहीं उठता। वैसे भी व्यापम के किसी प्रश्न का उत्तर किसी के पास नहीं है। जहां तक बेताल का सवाल है– वो कहानी नहीं सुनाता बल्कि पूरी दुनिया को धमकाता है कि कोई कहानी की फरमाइश ना करे। बेताल कहता है कि सुनने के लिए दुनिया में बहुत अच्छी-अच्छी कहानियां हैं, व्यापम में क्या धरा है? बहुत भयानक कहानी है—जिसने देखी उसने जान गंवाई, जो सुनेगा वो भी जान गंवायेगा। सबूत के तौर पर बेताल अपने गले का मुंडमाल दिखाता है। माला में तरह-तरह के सिर हैं, गवाहों के, आरटीआई कार्यकर्ताओं के, आरोपियों के और कुछ पत्रकारों के भी। घोटाले की ताल पर बेताल का भयानक नृत्य जारी है। गले की माला में लटकती मुंडियां लगातार बढ़ती जा रही है। व्यवस्था के तीनों बंदरों ने आंख, मुंह और कान बंद कर रखे हैं। जब कुछ कर ही नहीं सकते तो बुरा, देखने, सुनने और बोलने का क्या फायदा! व्यापम के बेताल से भला कौन पार पाएगा?

कुछ लोग कह रहे हैं, ये बेताल नहीं बल्कि बोतल का जिन्न है। जब तक बोतल में बंद था, पूरे मध्य-प्रदेश में शांति थी। मुक्त अर्थव्यस्था अपने चरम पर थी। मेडिकल और इंजीनियरिंग की सीटों की बिक्री ओपन मार्केट में एकदम धकाधक चल रही थी। चपरासी से लेकर टीचर और इंस्पेक्टर तक की नौकरियां सरेआम नीलाम हो रही थीं। जिसकी जैसी हैसियत हो वैसी नौकरी खरीद ले। रोजगार समाचार में आंखें गड़ाने और प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी में खून जलाने की ज़रूरत ही नहीं, प्रश्न पत्र दो दिन पहले घर भेज दिया जाएगा और उत्तर पुस्तिका भी घर से मंगवा ली जाएगी। नौकरी की होम डिलिवरी की ऐसी नायाब व्यवस्था दुनिया ने शायद पहले कभी नहीं देखी थी। मध्य-प्रदेश में सब मंगल ही मंगल था। गरीबी तेजी से दूर हो रही थी। विकास के नये प्रतिमान गढ़े जा रहे थे और प्रदेश खुशहाली की तरफ अग्रसर था। लेकिन तभी अनर्थ हो गया। किसी ने अचानक बोतल का ढक्कन हटा दिया और बरसो से बंद जिन्न बाहर आ गया। 

शैतान को किसी भी नाम से पुकारो, वो शैतान ही रहता है। व्यापम, जिन्न हो या बेताल, लेकिन है मध्य-प्रदेश का सर्वव्यापी संकट। हर कोई उस घड़ी हो कोस रहा है, जब इस बोतल का ढक्कन खुला। ना ढक्कन खुलता, ना बवाल होता और ना ही इतनी जिंदगियां बर्बाद होतीं। क्या करें वो बेचारे मां-बाप, जिन्होने अपने खेत बेचे और उसमें जिंदगी भर की जमा-पूंजी जोड़कर अपने बेटे के लिए मेडिकल की एक सीट खरीदी। कई लोग खरीद रहे थे, तो उन्होने भी खरीद ली। जिस देश में नेता मंत्रीपद खरीद सकते हैं, क्या वहां मां-बाप अपने लाडले के लिए मेडिकिल और इंजीनयरिंग की एक सीट नहीं खरीद सकते? सीट बेचने वालों ने तो कहा था कि किसी को कानो-कान ख़बर नहीं होगी। लेकिन अब बेटे के साथ मां-बाप को भी पुलिस ढूंढ रही है। परेशान नये-नवेले इंस्पेक्टर साहब भी कुछ कम नहीं हैं। लाखों के इनवेस्टमेंट से खरीदी गई नौकरी खतरे में है। अभी तो इनवेस्टमेंट की आधी रकम भी वसूल नहीं हुई है, नौकरी चली जाएगी तो क्या होगा? 

इस देश का सिस्टम इतना खराब है कि रिश्वत में किये गये इनवेस्टमेंट का इंश्योरेंस भी नहीं होता। पैसा तो डूबेगा ही, जेल होगी वो अलग। ये सोचकर इंस्पेक्टर साहब का दिल डूबा जा रहा है। जेल के डर से उनके कुछ साथी सचमुच दरिया में डूब चुके हैं। कुछ लोगो कहना है कि डूबे नहीं बल्कि डुबो दिये गये हैं। डेंगू और मलेरिया मिलकर मध्य-प्रदेश में जितनी जान नहीं लेते हैं, उससे ज्यादा जिंदगियां व्यापम निगल चुका है। व्यापम के ख़िलाफ आवाज़ उठाने वाले किसी आरटीआई कार्यकर्ता, किसी गवाह या किसी संदिग्ध का मरना अब ख़बर नहीं बल्कि जिंदा रहना ख़बर है। लोग जिस तरह गिरफ्तार हो रहे हैं, उसे देखते हुए ये डर सताने लगा है कि कहीं जेलो में जगह कम ना पड़ जाये। दूसरी तरफ ऐसे लोगो भी कम नहीं जो एफआईआर के बावजूद मूंछ पर ताव दिये घूम रहे हैं। दरअसल ये लोग पूरे देश को बता रहे हैं कि मानवाधिकारों के मामले में भी मध्य-प्रदेश अव्वल है। लोगो के मरने पर विपक्ष सीबीआई जांच का शोर मचा रहा है और सरकार गीता का ज्ञान दे रही है—जो आया है, उसे जाना ही होगा। इन सबके बीच व्यापम का बेताल अपने सुर, ताल और लय में नाच रहा है। जो सामने आएगा, वो मुंडमाल की शोभा बढ़ाएगा।

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