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विषधर मनुष्य

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विषधर बहुत ख़तरनाक होता है

क्योंकि उसमें विष क़ा भंडार होता है

इसलिए हम सदा

उससे बहुत दूर रहा करते हैं

पर ये बात और है की अपने इलाज के लिए

उसके विष का उपयोग करते हैं ।

 

विषधर तो कभी-कभी

और वो भी जब कोई उसे छेड़ता है

तब ही उसे काटता है

और उसी की जान लेता है

हमारे समाज में तो अनेक विषधर हैं

जिन्हें हम महान कहते हैं

वो सब प्रतिदिन अपने ही अनगिनत

निर्दोष भाइयों की जान लेते हैं

फिर भी न जाने क्यों हम सब

वजाय उनके सर को कुचलने के

उन्हें आदरणीय और महान कहते हैं ।

 

दोष उनका कम और हमारा अधिक है

हमने ही उनको ज़हरीला बनाया है

उनके गलत कदम उठते देख

कभी रोका नहीं

विष को उगलते देख

कभी टोका नहीं

उन्होनें बड़ा आदमी या नेता बनकर

हमारे सामने समस्याओं का

पहाड़ खड़ा कर दिया

और जब चाहा जैसा चाहा

हमारा प्रयोग कर अपना

उल्लू सीधा कर लिया ।

 

हम अपने ही हाथों अपने ही

पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं

जिसका फायदा हमारे दुश्मन,

हमारा मशीहा बनकर उठा रहे हैं

यदि यही हाल रहा तो एक दिन

हम अपनी पहचान गवां बैठेंगे

और हम केवल पहचान ही नहीं

अपना मान-सम्मान गवां बैठेंगे

और तब याद आयेंगे हमको

अम्बेडकर, आजाद, बिस्मिल, भगत

जब सब कुछ अपना

हम लुटा बैठेंगे ।

 

अरे ओ ! मक्कार दुष्ट शैतानों

अब तो समय की चाल पहचानो

और अपने मन का जहर मिटाकर

समाज में भाई-चारा, समानता

शान्ति और प्रेम का संचार करो

क्षेत्रवाद, भाषावाद, जातिवाद

और धर्म वाद को त्यागकर

समाज में मानवता की भावना भरो ।

 

आतंकवाद और लूटपाट का

भ्रष्टाचार और बलात्कार का

अत्याचार तुम खतम करो

सभी रहे प्रेम से यहाँ पर

इसलिए सबको सबका ‘किन्थ’ करो

तभी हम सब कहलाएंगे महान

और तभी होगा समाज का कल्याण ।

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