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‘लव-जिहाद’ पर एक सोच

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आये दिन ‘लव जिहाद’ के ऊपर काफी चर्चा हो रही है। आखिरकार यह ‘लव जिहाद’ है क्या? हाल ही देश के उच्चतम न्यालय ने ‘लव जिहाद’ के एक केस की तहकीकात करने के लिए ‘राष्ट्रीय जांच एजेंसी’ (NIA) को नियुक्त किया है। क्या यह समस्या इतनी संगीन है की इसके पीछे NIA को नियुक्त किया जाना चाहिए? जहां कुरान मे जिहाद का मतलब ‘धरम युद्ध’ है, वहीँ कुछ सूफी सिलसिले के गुरु मानते हैं की इंसान जब अपने अन्दर के अवगुणों पर जीत हासिल करता है, तो उसे ‘जिहाद’ कहते हैं। लेकिन ‘लव जिहाद’ का मतलब थोड़ा अलग है।

औपचारिक और अनौपचारिक सूत्रों के अनुसार जब एक मुस्लिम आदमी एक हिन्दू औरत को ज़बरदस्ती धर्म बदलने पर मजबूर करता है ताकि वह उससे शादी कर सके, तो उसे ‘लव जिहाद’ कहते हैं। हिंदूवादी संगठन जैसे की ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ (RSS) और ‘बजरंग दल’ ने लव जिहाद का डटकर मुकाबला किया है और इससे भारतीय संस्कृति और धर्मनिरपेक्षता के नियमों के विरुद्ध बताया है। हालांकि मैं संघी सोच का पूर्ण रूप से समर्थन नहीं करता, ज़बरदस्ती धर्म प्रवर्तन करना या करवाना चाहे वो किसी भी धर्म का क्यों ना हो, गलत है। यदि कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से धर्म प्रवर्तन करना चाहे, तो वह आपत्तिजनक विषय नहीं है लेकिन इससे वास्तविक रूप मे साबित करना पेंचीदा है।

हाल ही मे केरला के कोटायम की रहने वाली के. एम. अखिला ने हिन्दू धर्म छोड़कर मुस्लिम धर्म अपनाया। उसने अपना हिन्दू नाम त्यागकर मुस्लिम नाम- हदिया- अपनाया। भारतीय संविधान की धारा 19.4 और 25-28 के अंतर्गत धार्मिक स्वतंत्रता का हक़ हर एक भारतीय नागरिक को दिया गया है। इसके साथ नागरिकों को इस बात पर भी ध्यान रखना होगा की वह अन्य धर्मों को नीचा ना दिखाएँ, कट्टरवादी और अतिवादी गतिविधियों को बढ़ावा ना दे और भाईचारे की भावना को बरकरार रखें। लेकिन हदिया के आचरण मे ऊपर दिए गए जिम्मेदारियों का उल्लंघन प्रतीत नही हो रहा है।

हदिया ने स्वयं स्वीकार किया है की उसने पूरे होश ओ हावास मे अपना धर्म बदला। जब उसे हिन्दू धर्म मे अपने धार्मिक प्रश्नों के उत्तर ना मिलकर कुरान से उत्तर मिले, तो उसने इस्लाम धर्म को अपनाया। एक तरफ जहां हदिया के पिता अशोकन ने अपनी बेटी की सुरक्षा को ध्यान मे रखते हुए केरला हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया, उसी तरफ हदिया के शौहर शेफिन जहान ने सुप्रीम कोर्ट के कदम चूमे। एक तरफ जहां अशोकन डर रहे हैं की उनकी बेटी कहीं ‘आईएसआईएस’ की सदस्या ना बन जाए, दूसरी तरफ शेफिन अपनी कानूनन रूप से विवाहित पत्नी से मिलने की अपेक्षा कर रहे हैं।

जब सुप्रीम कोर्ट ने NIA को नियुक्त किया, तो इसके ऊपर भी विभिन्न प्रतिक्रिया हुयी। एक सूत्र ने कोर्ट और सुरक्षा कर्मी के ‘उभरते आतंकवादी घटनायों’ को रोकने की इच्छा को सही बताया है। लेकिन वहीँ शेफिन के वकील ने कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि, “क्या जज साहब भाजपा के मुस्लिम नेताओं, जिन्होंने हिन्दू औरतों से शादी की है, उन पर भी NIA द्वारा जांच करवाएंगे? क्या जज-साहब NIA का अनुचित प्रयोग नहीं कर रहे हैं?” सुप्रीम कोर्ट ने इस तथ्य को खंडित करते हुए कहा कि, “जब तक सुप्रीम कोर्ट सभी दिशायों से इस केस की कड़ी तहकीकात नहीं करती, वह सही फैसला नहीं दे सकती।”

चाहे अंतिम फैसला जो भी हो, मैं आशा करता हूँ कि आखिर मे कट्टरपंथी सोच की हार और सच्चे प्यार करने वालों की जीत हो।

 

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