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यदि तू विस्तार चाहता है

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खुशबू बन उड़ जा यदि तू विस्तार चाहता है I

मानव को कर प्यार यदि तू प्यार चाहता है I

मोती बन मत बैठ कोष्ठ में,

सीपी के जैविक प्रकोष्ठ में,

सागर में मिल जा,

यदि तू विस्तार चाहता है

मानव को कर …… I

क्या कहता है अंतर्मन में,

शंखनाद बन विचार गगन में,

चेतन को बिखरा,

यदि तू विस्तार चाहता है

मानव को कर …… I

मनुज योनी का धर्म समझ ले,

जीवन का यह मर्म समझ ले,

शांतिदूत बन जा,

यदि तू विस्तार चाहता है

मानव को कर …… I

क्यूँ सिमटा सकुचा बैठा है ?

जीवन ये जल सा बहता है,

बाहों को फैला,

यदि तू विस्तार चाहता है

मानव को कर …… I

विश्व विजय का स्वप्न लिए तू,

भटक रहा निर्जन जीवन में,

आत्मजीत हो जा,

यदि तू विस्तार चाहता है

मानव को कर …… I

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