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मोदी जी और मोटो जी


टू जी नहीं दो जी। आजकल देश में सिर्फ दो तरह के `जी’ की चर्चा है जी। पहले मोदी जी और दूसरा मोटो जी। मोदी जी ज़बरदस्त तरीके से मोबाइल यानी गतिशील हैं। सुबह 9 बजे दफ्तर पहुंच जाते हैं। दिनभर में कई मीटिंग कर लेते हैं। जनता के मेल तक पढ़कर उनका जवाब भी देते हैं। मोदीजी इतने मोबाइल हैं कि हफ्ते भर में टोक्यो से न्यूयार्क और कश्मीर से कन्याकुमारी तक फलांग आते हैं।

मोटो जी भी मोबाइल है, लेकिन मोदीजी की तरह नहीं, बल्कि अपनी तरह से, क्योंकि मोटो जी सचमुच का मोबाइल है, अरे भाई मोबाइल फोन है। मोटो जी सरीखे स्मार्ट फोन के सहारे ही मोदी जी देश में मोबाइल गवर्नेंस लाने का सपना देख रहे हैं। सचमुच मोदी जी और मोटो जी में बहुत कुछ कॉमन है।

जब तक मोटो जी नहीं आया था, मोटोरोला कंपनी डूब रही थी। लेकिन मोटो जी के आते ही मोटोरोला की सोई तकदीर जाग गई। लोकप्रियता रातो-रात सातवें आसमान पर पहुंच गई। लोग कहने लगे एप्पल खानदान ना हुआ तो क्या हो गया, बड़े काम का है। सस्ता, सुंदर और टिकाऊ है। वादे पर खरा उतरने वाला है, मोटो जी। मोदी जी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। बीजेपी की नैय्या मंझधार में थी।

पार्टी के अंदर बैठे दुश्मन कह रहे थे, मोदी गुजरात की पॉलिटिक्स के मोटा भाई (गुजराती में बडा भाई) होंगे, पूरे भारत के नहीं बन सकते। लेकिन गुजरात के मोटा भाई ने दिल्ली में कुछ ऐसा कमाल दिखाया कि उनके साथ-साथ छोटा भाई यानी अमित शाह भी सुपरहिट हो गये। जिस तरह एक अकेले मोटो जी ने मोटोरोला को उबार लिया, ठीक उसी तरह जैसे एक अकेले मोदी जी ने बीजेपी को डूबने से बचा लिया। चुनाव के बाद सोनिया जी ने मनमोहन जी की तरह मौनव्रत धर लिया और राहुल जी ने परमानेंट अज्ञातवास पकड़ लिया। कांग्रेस की धुलाई लगातार जारी है और थके हारे कार्यकर्ता प्रियंका जी के दरवाजे पर सिर पटक रही है, लेकिन वो भी बेचारी क्या करें, जेल के डर से थर-थर कांप रहे पति को संभाल या फिर मूर्छित कांग्रेस को।

इसलिए फिलहाल खुलकर मैदान में आने से बच रही हैं, प्रियंका जी। यानी देश की पॉलिटिक्स में मोदी जी के अलावा अब कोई और `जी’ बचा ही नहीं। बड़ी दुविधा में हैं, मोदी जी, अपनी पार्टी तो अपनी पार्टी विरोधियों में भी कोई कंपीटीटर बचा ही नहीं। लीडर भी मोदी और अपोजीशन भी मोदी। खुद काम करते हैं, खुद से अपने काम का हिसाब मांगते हैं। सवाल भी खुद से पूछते हैं और सफाई भी खुद ही को देनी पड़ती है। कान तरस गये एक तगड़ा आरोप सुने। पार्लियामेंट में राहुल जी को एक बार गुस्सा ज़रूर आया था।

आस्तीन मोड़कर आगे भी बढ़े थे, लेकिन उसके बाद शायद कोई और ज़रूरी काम याद आ गया। जाने कहां चले गये, उसके बाद से कभी दिखे ही नहीं। बेचारे मोदी मन मसोसकर रह गये। लोकतंत्र है या मज़ाक है, एक दमदार विरोधी तक मयस्सर नहीं। ऐसे कैसे चलेगा? जब सामने विरोधी ही नहीं होगा, तो फिर पूरी दुनिया डिक्टेटर मानने लगेगी। महाराष्ट्र के चुनाव में गर्मी बढ़ी और उद्धव ठाकरे पैर पटकते हुए अलग हुए तो मोदी को लगा चलो ऑपोजिशन से ना ही एलायंस से ही सही, कोई विरोधी तो नज़र आये।

चुनाव के दौरान शिवसेना की गाली और बीजेपी की गांधीगीरी चलती रही। लेकिन जैसे ही नतीजे आये दहाड़ता शेर अचानक शायरी करने लगा। एक तगड़ा विरोधी पाने की मोदी की आस उद्धव ने तोड़ दी। इंडियन पॉलिटिक्स के बाज़ार में ब्रांड मोदी के अलावा अब कुछ और नहीं है। लेकिन मोबाइल के बाज़ार में ऐसा नहीं है। मोटो जी के कई तगड़े कंपीटिटर है। मोदी जी और मोटो जी के बीच का इकलौता फर्क यही है।

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