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मैं, आप और ए.आई.

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‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ या ‘आर्टीफिशिअल इनटेल्लिजेंस’ (ए.आई.) आजकल चर्चा का विषय है। ‘सीरी’, ‘कौरटाना’, ‘बिक्स्बी’ नामक कई प्रभावशाली ए.आई.  हमारे मोबाइल, कंप्यूटर और टेबलेट के ज़रिये हमारे पसंद-नापसंद का विश्लेषण करते हैं और उसके अनुसार हमे सबसे उपयुक्त सुझाव देते हैं। हालांकि, ए.आई. के आ जाने से हमारा जीवन काफी सरल और तेज़ हो गया है, इसके दुष्प्रभाव से भी हमे वाकिफ होना चाहिए।

ए.आई. के ऊपर ज़्यादातर ज्ञान मुझे फ़िल्मी दुनिया से मिला है। ‘टर्मिनेटर’, ‘आई-रोबोट’, ‘एन्थिरण’, ‘प्रोमीथीयस’ जैसे कई फिल्मों ने मुझे ए.आई. के शानदार, रेहेस्मायी और विनाशकारी काबिलियतों के बारे मे बताया। इन सभी को देखने के बाद सिर्फ एक सवाल दिमाग मे आता है, “क्या इंसानियत का अगला वारिस ए.आई. होगा?” हालांकि वर्त्तमान काल मे ऐसा प्रतीत नहीं हो रहा है, भविष्य मे यह संभावना करना अनुचित नहीं होगा। जब हम एक ए.आई, जो की वास्तविकता मे एक तेज़ और अनुकूल मशीन है, के माध्यम से जीवन-व्यापन करते हैं, तो क्या हम अपनी निजी स्वतंत्रता कुर्बान नहीं कर देते? क्या हम अपने जीवन की बागडोर किसी निर्जीव वास्तु के हाथों मे नहीं सौंप रहे? क्या ऐसा करना हर वक़्त सही होगा? यह कुछ ऐसे सवाल हैं जिसको हल करने मे आज के शोधकर्ता और वैज्ञानिक लगे हुए हैं।

हालांकि तकनीकी क्रान्ति और आधुनिकता के मैं खिलाफ नहीं हूँ, ए.आई. के बढ़ते प्रभाव से यह भी बताया जा रहा है की कुछ सालों मे मशीन इंसान के कई काम करेंगे। यानी आप यह मान ले की झाड़ू-पोंछा लगाने से लेकर परमाणु बम बनाने तक रोबोट और ए.आई. काफी हद तक सक्रिय हो जायेंगे।

विश्व बैंक के राष्ट्रपति जिम किम ने ए.आई. पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए यह भी बताया कि स्वचालित मशीनों के आगमन से भारत मे 70% लोग अपनी नौकरी से हाथ धो सकते है। मानव संसाधन संगठन ‘पीपलस्ट्रांग’ के अनुसार 2021 तक यह आंकड़ा  23-30% के बीच हो सकता है। हालांकि स्वचालित मशीनों के आ जाने से उनकी मरम्मत और रखरखाव से जुड़ी नौकरियों मे बढौतरी होगी, सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों को इस बात पर ध्यान देना  होगा कि स्वचालन और मानावचालन के बीच संतुलन बना रहे।

निजी स्तर पर, ई-वॉलेट, paytm, फ़ोन-पे जैसे तकनीकों के आ जाने के बाद, मुझे शायद ही बैंक जाने की आवश्यकता पढ़ती है। इससे मेरा आलसपन काफी बढ़ गया है जो कि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। लेकिन इस बात को भी नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता कि तकनीकी क्रान्ति और किफायती इन्टरनेट की वजह से कई सारे काम बड़े आराम और तनाव मुक्त तरीके से किया जा रहे हैं। लेकिन दिमाग मे एक ही सवाल घूमता रहता है की यदि मशीन भी इंसान की तरह सोचने और निर्णय लेने लगा तो उसका क्या अंजाम होगा? यदि उसमे भी ईर्षा, गुस्सा, प्रेम, घृणा जैसी भावनाएं उभरने लगी तो, क्या वह इंसान के इतिहास को देखते हुए, उसे ख़त्म करना चाहेगा या उसका उद्धार करना चाहेगा? इसी को मद्दे नज़र रखते हुए तकनीकी दुनिया के कई महारथी जैसे की ईलों मस्क और बिल गेट्स ने ‘ज़िम्मेदार और मानवोचित ए.आई.’ का नारा लगाते हुए ‘ओपन ए.आई. ‘ नामक संगठन का निर्माण किया है।

ए.आई.  मानवता के लिए एक नई उमंग ज़रूर है लेकिन गलत या फिर अनुभवहीन हाथों मे यह किसी बम से कम नहीं। इसी के साथ ए.आई. मानवता के प्रगति की अगली सीढ़ी साबित हो सकती है लेकिन साथ ही निगरानी के बगैर यह मानवता को ख़त्म भी कर सकती है।

 

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