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मेरे अंदर का रावण

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दशहरा गुजर चुका है, दीपावाली आ रही है। मैसेज बॉक्स और मेल बॉक्स में अब भी विजयदशमी के बहुत से संदेश पड़े हुए हैं, जिनमे शुभकामनाओं के साथ एक हिदायत भी दी गई है—अपने अंदर के रावण को मारें। मैसेज पढ़कर शोले फिल्म का डायलॉग याद आ जाता है—ठाकुर साहब आप क्या गब्बर सिंह को बकरी का बच्चा समझते हैं, जिसे कोई भी पकड़ ले। रावण ना हुआ भारतीय क्रिकेट टीम का पेस बॉलर हो गया, जिसे कोई भी ऐरा-गैरा आकर मार जाये। ये देश दूसरो के मामलो में ज़रूरत से ज्यादा जागरूक है। मेरे किरायेदार के लड़के का सामने वाली लड़की से कुछ चल रहा है, इसकी चिंता ना तो मुझे है, ना मेरे किरायेदार को, अलबत्ता पड़ोसी को ज़रूर है। मेरे अंदर कोई मुस्टंडा रावण छुपा बैठा है, इसका पता मुझे नहीं है। मेरी बीवी मुझे कुंभकर्ण ज़रूर मानती है, लेकिन मेरे अंदर रावण की मौजूदगी से वो भी अनजान है। लेकिन दुनिया चिंतित है। मेरे अंदर का रावण एक सामाजिक समस्या है, अगर प्रोफाइल कुछ बड़ा होता तो मेरा रावण एक राष्ट्रीय समस्या भी बन जाता।

दूसरो के अंदर का रावण सद्धाम हुसैन होता है, जिसे पकड़कर फांसी पर लटकाया जा सकता है। लेकिन अपने अंदर का रावण पाकिस्तान में बैठा दाऊद इब्राहिम होता है, उसकी मौजूदगी से हमेशा इनकार होता है। लोग एक-दूसरे के अंदर का रावण मारना चाहते हैं, अपने अंदर का नहीं। विजयदशमी के दिन अंदर का रावण मारने के संदेशों का आदान-प्रदान कुछ उसी अंदाज़ में होता है, जिस तरह शीतयुद्ध के दौर में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच परमाणु हथियारों की कटौती पर होता था। एक मुल्क कहता था, विश्वशांति के लिए परमाणु हथियारों में कटौती बहुत जरूरी है। दूसरा मुल्क कहता था– बहुत सुंदर विचार हैं, हथियार आपके पास हमसे बहुत ज्यादा हैं, कर दीजिये कटौती। इसके बाद पहले आप, पहले आप शुरू हो जाता था। हथियार कम होने के बदले बढ़ते चले जाते थे और अंदर का रावण बाहर आकर अट्टाहास करता हुआ पूरी दुनिया के सामने मूंछों पर ताव देने लगता था। दुनिया बदल रही है, लेकिन अंदर का रावण मारने के तरीके ज्यादा नहीं बदल रहे हैं। ये माना जाता है कि पुतला बनाकर जला देने और जलते हुए पुतले को देखकर आसुरी अट्टाहास करने से अपने अंदर का रावण मर जाता है। पटना के गांधी मैदान में भी कुछ ऐसा ही हो रहा था। मारने चले थे, अपने अंदर का रावण और मार डाले दूसरो के कमाऊ पूत और मासूम बच्चे। 

विजयदशमी के शुभ अवसर पर अंदर का रावण मारने का आह्वान अनेक लोगों के साथ तिहाड़ रिटर्न विधायक जी भी करते हैं। कितने शुद्ध और सात्विक विचार हैं। आह्वान करते वक्त ये तक नहीं सोचते कि अगर उन्होने अपने समर्थकों के अंदर के रावण मरवा दिये तो उन्हे खुद कितना नुकसान उठाना पड़ेगा। सारे रावण मर गये तो फिर विधायक जी कहने पर सड़क जाम कौन करेगा, विरोधियों पर अंडे टमाटर कौन बरसाएगा और दुश्मनो के कान के नीचे कौन बजाएगा? ये सब जानते बूझते हुए विधायक जी अंदर का रावण मारने का संकल्प दोहराते हैं। शायद उन्हे पता है कि जिस तरह विदेश में जमा कालाधन कभी वापस नहीं आ सकता उसी तरह अंदर का रावण कभी नहीं मर सकता। फिर कहने में क्या हर्ज है। अंदर के रावण को लेकर नई सरकार भी बहुत चिंतित है।

जगह-जगह झाड़ू फिरवा रहे मोदीजी भी मानते हैं कि तन की सफाई के साथ मन की सफाई भी ज़रूरी है। मुझे डर है कि सरकार भविष्य में कोई ऐसा कानून ना बनवा दे कि अंदर का रावण मारे बिना आप चुनाव नहीं लड़ सकते। अगर ऐसा हो गया तो फिर उम्मीदवारी के पर्चे के साथ अंदर के रावण का मृत्यु प्रमाण पत्र भी दाखिल करना होगा। अंदर के रावण को कब मारा गया, किन गवाहों की मौजूदगी में मारा गया, क्या मरने से पहले रावण ने कोई इकबालिया बयान दिया, ये सबकुछ हलफनामा दाखिल करके बताना पड़ेगा। रावण मर चुका है, इस बात का प्रमाण पत्र कौन देगा, रजिस्टरी ऑफिस में बैठा दुर्योधन? दुर्योधन के टेबल तक पहुंचने से पहले दुशासन की मुट्ठी गरम करनी पड़ेगी, शकुनी के पैंतरे झेलने पड़ेंगे। कुल मिलाकर ये प्रक्रिया बहुत जटिल होगी। मोदीजी टेढ़े-मेढ़े कानूनों के पक्ष में नहीं हैं। इसलिए अंदर के रावण वध पर स्टे ऑर्डर पहले की तरह जारी रहेगा।

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