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मेरी रिहाई हो चुकी है

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इस कारागार से मैं
उस उगते सूरज की रौशनी देख रही हूँ |
निश्चय ही ये किरणे तुम्हे छूकर आई होंगी |
जैसे ही ये किरणे पहुंची इस कालकोठरी तक

सलाखों को पार कर,
ये पहुंची मुझ तक,
मेरे कण-कण ने तुम्हे अहसास किया |
रोम-रोम ने आनंद सा अनुभव किया |
मेरे कानों में एक ध्वनी सुनाई पड़ी  –
रश्मि वर्षा कह रही थी मानो
तुमने मधुर गीत कोई मेरे लिया गा दिया है |

अपने अनुराग के पाश में जैसे मुझको बंदी बना लिया है |
तुम सामने नहीं पर मेरे पास ही हो |
इन किरणों की तरह मुझ में रच-बस गए हो |
अब किसी मुक्ति की नहीं है मुझे कामना –
क्युंकि,
तुम में समाकर तो आत्मा की मुक्ति हो चुकी है…
मेरी रिहाई हो चुकी है |

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