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मीडिया को तो इमरजेंसी बेहद पसंद है

ये दिलचस्प संयोग है कि आज से चालीस साल पहले मेरे जैसे देश के हजारों मीडिया-साहित्य के छात्रों ने जब आंखें खोली होगीं तो उन्हें सबसे पहले ये खबर सुनने को मिली होगी कि अब ऑल इंडिया रेडियो पूरी तरह ऑल इंदिरा रेडियो हो गया है और मैंने जब आंखें खोली तो सात दिन पहले ऑर्डर की गई किताब ठीक इसी दिन मिली जब हवा में इमरजेंसी का नया संस्करण घुला है..आखिर देर रात हम राजनाथ सिंह का ये बयान सुनकर ही तो सोए थे कि ये एनडीए की सरकार है, इस तरफ नए मंत्रियों से इस्तीफा नहीं लिया जाता.  ( संदर्भ- #lalitmodigate)
कल प्राइम टाइम में वो सारे चैनल जो भाजपा और रिलांयस इन्डस्ट्रीज के या तो मातहत हैं या एहसानों से लदे हैं, वसुंधरा राजे के हस्ताक्षर किए पेपर पर बवाल मचने और अच्छे दिन की सरकार के बुरी तरफ फंस जाने पर स्टोरी करने के बजाय इसी इमरजेंसी पर दनादन स्टोरी करते रहे. बात-बात में ब्रेकिंग न्यूज की लत के शिकार चैनलों को वर्तमान को दरकिनार करते हुए इतिहास के प्रति इतनी मोहब्बत कम ही देखने को मिलते हैं. नहीं तो यदि ललित मोदी-वसुंधरा राजे और इंदिरा गांधी की इमरजेंसी पर स्टोरी करते तो उन्हें तुलना करते हुए बहुत कुछ साम्य दर्शन हो जाते..ये मीडिया का वो दौर है जहां सरकार के निर्देश और धंधे इतने व्यवस्थित हो गए हैं कि इमरजेंसी के लिए किसी एक दिन की घोषणा की जरुरत नहीं रह जाती..वो अब एक प्रक्रिया का हिस्सा हो चुका है..देर रात तक जिस तरह चैनल के एंकर दहाड़ रहे थे कि इंदिरा गांधी ने इस तरह मीडिया पर कब्जा किया, कल की पीढ़ी ये सवाल नहीं करेंगे कि जब पूरा देश ये जानना चाह रहा था कि ललित मोदी-वसुंधरा राजे प्रकरण में जब एनडीए सरकार की साख पूरी तरह मिट्टी में मिल जा रही थी, उस वक्त नरेन्द्र मोदी क्यों चुप्पी साधे रहे और इस पर आप अधिकांश मीडिया ने एक लाइन की स्टोरी भी क्यों नहीं की ? और तो और एनडीए सरकार को इन दिनों राज्यसभा टीवी क्यों इतना खटक रहा है..राममाधव की बयानबाजी और उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी मामले में राज्यसभा टीवी कवरेज को जिस तरह जबरदस्ती घसीटा जा रहा है, वो सरकार की मंशा को काफी हद तक साफ कर देता है. विस्तार से पढ़ने के लिए चटकाएं- http://www.thehindu.com/news/national/under-attack-rajya-sabha-tv-says-its-not-government-mouthpiece/article7347640.ece  खैर
ऑल इंडिया रेडियो के ऑल इंदिरा रेडियो की कहानी को लेकर सेवंती निनन ने भी अपनी किताब through the magic window  में विस्तार से लिखा है लेकिन इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकार कोमी कपूर ने अपनी किताब the emergency: a personal history में इसे और विस्तार से लिखा है. ये अलग बात है कि देशभर में जिस तरह से कांग्रेस विरोधी माहौल है, उसके बीच कोमी कपूर की किताब कपूर का असर करेगी, बाकी का काम अरुण जेटली की लिखी भूमिका कर देगी. लेकिन ऐतिहासिक संदर्भों को समझने के लिए ये एक जरुरी किताब तो है ही.
 वो लिखती हैं कि इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी को इस बात की कोफ्त थी कि जयप्रकाश नारायण और आंदोलन को क्यों कवर किया जा रहा है और इंदिरा गांधी की रैलियों को क्यों नहीं दिखाया-बताया जा रहा है. संजय गांधी ने इस पर तत्कालानी सूचना एवं प्रसारण मंत्री इंदर कुमार गुजराल से बहसबाजी भी की. संजय गांधी को इस बात से नाराजगी थी कि २० जून १९७५ इंदिरा गांधी की वोट क्लब रैली की लाइव कवरेज क्यों नहीं हुई..गुजराल ने समझाने की कोशिश भी की कि बिना डायरेक्टर जनरल की अनुमति के इस तरह से राजनीतिक रैलियों की कवरेज नहीं की जा सकती लेकिन संजय गांधी ने बात नहीं मानी और ये मामला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक चला गया.
२६ जून को इंदिरा गांधी और संजय गांधी ने इंदर कुमार गुजराल से स्पष्ट कहा कि वो जेपी आंदोलन को ज्यादा तूल न दें, कम से कम दिखाएं, उमड़ी भीड़ की कवरेज न दें आदि..आदि..लेकिन उसके तुरंत बाद ही २६ जून की सुबह पीएमओ के ज्वाइंट सेक्रेटरी पी एन बहल ऑल इंडिया रेडियो की न्यूजरूम में आए और चार्ज ले लिया. उन्होंने डायरेक्टर जनरल को एआइआर की एक टीम गठित करने की बात कही जो कि इंदिरा गांधी के संदेशों को रिकार्ड करके कार्यक्रम बनाएगी और आठ बजे सुबह न्यूज बुलेटिन के बदले ये कार्यक्रम दिखाया जाएगा.

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