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माननीय मैट्रिक फेल

चाहे डिग्री देने वाली यूनिवर्सिटी हो येल या फिर माननीय हो मधेपुरा उच्च माध्यमिक विद्यालय से मैट्रिक फेल, फर्क कुछ भी नहीं पड़ता है। माननीय तो हमेशा माननीय ही रहेंगे। पढ़ाई-लिखाई, डिग्री-सार्टिफिकेट वगैरह से उपर। इस देश में ना जाने कितने अंगूठा टेक एमएलए और एमपी हुए। अपना दस्तख़त तक ना कर पाने वाले कई लोग मंत्री तक बने और पूरे ठाठ से राज चलाया। काला अक्षर भैस बराबर और लोकतंत्र में भी सब धन बाइस पसेरी बराबर। नेताओं की निरक्षरता को हमने अपने लोकतंत्र की ताकत के रूप में कुछ इस तरह पेश किया कि पूरी दुनिया दंग रह गई। दुनिया ने ये मान लिया कि भारत का अनपढ़ क्लर्क भले ना बन पाये, लेकिन मंत्री ज़रूर बन सकता है।

निरक्षर जनप्रतिनिधि सीना तानकर संसद और विधानसभा में आते रहे, अपना काम करते रहे, किसी ने कभी उंगली नहीं उठाई। लेकिन वो जमाना कुछ और था। पहले मैट्रिक पास करना बड़ी बात थी। नये ज़माने में तो डिग्रियां इस कदर बेमानी हो चुकी हैं कि अच्छा भला एमए पास आदमी भी कुंठा का शिकार हो जाये। नये ज़माने में पढ़े लिखे या यूं कहें तो डिग्रीधारी नेताओं की भरमार है। ऐसे में जितने भी मैट्रिक फेल माननीय हैं, उनकी मुश्किल बढ़ गई है। इज्ज़त कैसे बचायें, चारो तरफ तो हावर्ड और येल वाले हैं? गहरे सोच विचार के बाद दिल्ली वाले माननीय इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि फेल हुआ तो क्या हुआ, मेरे पास वो प्राच्य भारतीय विद्य़ा है, जो अच्छे-अच्छो के पास नहीं है। देसी भाषा में इसी विद्या को जुगाड़ कहते हैं।

जुगाड़ ने कुछ ऐसा कमाल दिखाया कि माननीय के बायो-डाटा में बीएससी और एलएलबी वगैरह सुशोभित हो गये। इतना ही नहीं भ्रष्टाचार का समूल नाश करने वाली पार्टी ने माननीय को अपनी सरकार में मंत्री भी बना दिया। पड़ोसियों के बीच खुसुर-फुसुर शुरू हो गई—हमें तो मालूम ही नहीं था कि भाई साहब इतने पढ़े लिखे हैं, हम तो इन्हें कुछ `एवैं’ टाइप समझते थे। माननीय ने भी सोचा कि सारे अरमान अब पूरे हो चुके हैं। तरह-तरह की डिग्रियां हैं, पांच साल वाली सरकार में पक्की नौकरी है। लाइफ ऐश से कटेगी, भला इससे ज्यादा और क्या चाहिए एक आम आदमी को। लेकिन माननीय ये भूल गये थे कि ये देश सिर्फ जुगाड़ वालों का ही नहीं है। देश उन लोगो का भी है, जो अपने दुख से दुखी नहीं बल्कि दूसरो के सुख से दुखी हैं। कई लोगो से माननीय का सुख देखा नहीं गया।

देश के सबसे ईमानदार मुख्यमंत्री की क्लीन चिट के बावजूद माननीय को पुलिस ने घर से उठा लिया और ले गई अपने साथ भारत दर्शन पर। दिल्ली से फैजाबाद, फैजाबाद से भागलपुर और भागलपुर से मुंगेर, सच्चे `ज्ञान’ के लिए वह जहां-जहां भटके थे, पुलिस उन्हे लेकर वहां-वहां गई। ज्ञानानार्जन के लिए भटकना प्राचीन भारतीय परंपरा है। भगवान महावीर से लेकर महात्मा बुद्ध तक ना जाने कितने महापुरुष इसी तरह बरसो भटके थे। इतिहास बताता है कि ज्ञान के लिए इतना भटकने वालो को सच्चा ज्ञान प्राप्त हो जाता है और वो मोहमाया छोड़कर वैराग्य की तरफ उन्मुख हो जाते हैं। लेकिन भटकने के बावजूद माननीय बुद्ध नहीं बन पाये, अलबत्ता बुद्धू ज़रूर बन गये, क्योंकि पुलिस की जांच ने ये भेद खोल दिया कि वह ज्ञान के लिए नहीं बल्कि डिग्रियों के लिए भटके थे। जाली डिग्रियों के मामले में भारत शुरू से आत्मनिर्भर देश रहा है। जुगाड़ टेक्नोलॉजी से देश में हर साल ना जाने की कितनी फर्जी डिग्रियां बनाई जाती हैं। ये डिग्रियां दिखती तो असली हैं, लेकिन अगर जांच फर्जी ना हो तो इन फर्जी डिग्रियों का सच सामने आ ही जाता है। सगे भाई की मदद, मामा की मेहनत और दलाल की मिलिभगत से बनाई गई डिग्रियां का सच सामने आना शुरू हुआ तो ईमानदार मुख्यमंत्री तक के हाथ-पांव फूल गये।

मुख्यमंत्री जी अब तक तो इस मामले को केंद्र की साजिश और संघीय ढांचे पर हमला वगैरह बता रहे थे। लेकिन जब डिग्रियों का राज सामने आना शुरू हुआ तो उनके पास इस बात का जवाब नहीं रहा कि उनके कानून मंत्री ने इतना बड़ा गैर-कानूनी काम क्यों किया था। ईमानदार पार्टी ने चुपचाप मंत्रीजी का इस्तीफा तो ले लिया लेकिन साथ-साथ शोर मचाना शुरू कर दिया कि केंद्र सरकार के कुछ मंत्रियों की डिग्रियां भी जाली हैं, उनकी जांच होनी चाहिए। मीडिया ने भी इस मामले को जोर-शोर से उछालना शुरू कर दिया। नये दौर की इस राजनीति में कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ, किसका दावा असली है और किसका फर्जी ये कोई नहीं जानता। ऐसे में तमाम पार्टियों की भलाई इसी में है कि वो ऑल पार्टी मीटिंग बुलाकर आम-सहमति से ये तय कर लें कि एक-दूसरे के नेताओं की जाली डिग्रियों का मुद्धा नहीं उछालेंगे। फिलहाल दावे दोनो तरफ से हो रहे हैं, आगे कितने और पढे लिखे चार सौ बीस साबित होंगे, ये किसी को मालूम नहीं। उधर देश के बाकी मैट्रिक फेल माननीय मन ही मन संकल्प दोहरा रहे हैं— जाली डिग्री के चक्कर में पड़े तो कुर्सी भी जाएगी। हम माननीय मैट्रिक फेल भले।

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