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मनुष्य की यात्रा

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आज मनुष्य संपूर्ण पृथ्वी पर ही नहीं बल्कि अन्य ग्रहों एवम् उपग्रहों की भी यात्रा करने में सक्षम है यहाँ तक कि वह सूर्य तक भी पहुँचने की कोशिश कर रहा है| आज मनुष्य की यात्राओं के, उनकी क्षमता और ज़रूरत के अनुसार अलग-अलग उद्देश्य हैं परंतु क्या हमने कभी सोचा है कि उसकी इस यात्रा का प्रारंभ कब और क्यों शुरू हुआ|

मनुष्य की यात्रा उसके जीवन के साथ ही शुरू होती है| प्रारंभ में मनुष्य की इस यात्रा का बस एक ही उद्देश्य होता था, उसके अस्तित्व की समस्या अर्थात् उसके जीवित रहने की समस्या जिसके लिए वह जीवन भर संघर्ष करता है| प्रारंभ में मनुष्य भोजनऔर पानी की तलाश में अर्थात फल,फूल इकट्ठा करने और जानवरों का शिकार करने के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा करता था |धीरे-धीरे जब कुछ लोगों के भोजन ,पानी की समस्या का समाधान होने लगता है और वे अपना स्थाई निवास बना लेते हैं तब स्त्रियाँ खेती संभालती हैं और पुरुष पशुओं को लेकर उनके भोजन की तलाश में यात्रा पर निकल पड़ते हैं| इसके बाद जब कुछ शक्तिशाली लोगों की भोजन,पानी और निवास की समस्या का स्थाई समाधान हो जाता है तो वे अपने लिए सुख-साधन चाहने लगते हैं और उनकी तलाश में अधिक धन और सामग्री एकत्रित करने के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा करते हैं|

इस प्रकार धीरे-धीरे फिर व्यापारिक यात्राएँ शुरू होती हैं और उसके फलस्वरूप सेठ, साहूकार व ज़मींदार बनते हैं| जो व्यक्ति और अधिक शक्तिशाली होते हैं वे धन की लूट के लिए अथवा अपनी संपत्ति तथा आधिकारिक क्षेत्र बढ़ाने के लिए यात्राएँ करते हैं| जिनसे राजा-महाराजाओं का उदय होता है जो अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए विजय यात्राएँ करते रहते हैं| |साथ ही पुरोहित वर्ग भी उत्पन्न होता है जो अलग-अलग स्थानों पर धार्मिक स्थल बनाते हैं जिसके कारण सभी प्रकार के लोग अपनी-अपनी धार्मिक आस्थाओं के अनुसार तीर्थ यात्राएँ करते हैं|

जब लोग अधिक संपन्न और आत्मनिर्भर होने लगते हैं तो उनके पास अतिरिक्त धन व समय होता है इसलिये वे अपने लिए अधिक सुख-साधनों की खोज में तथा मनोरंजन के लिए यात्राएँ करते हैं| जबकि आबादी का अधिकांश भाग विशेषकर आदिवासी लोग अपनी जीविका ही खोजते रहते हैं| ख़ानाबदोश तो अपनी जीविका के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्राएँ करते ही रहते हैं| आबादी का दूसरा भाग अपनी रोज़ी-रोटी तथा अधिक धन कमाने के लिए एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश की यात्रा करते हैं |कुछ लोग तो दूसरे देशों की भी यात्रा करते हैं|

जब मनुष्य सुखी होने लगता है तो वे अपने मनोरंजन के साधन भी खोजता है और देश-विदेश में रमणीय, पर्यटक स्थलों की यात्राएँ करता है| कुछ लोग अपने मन की खुशी व आनंद के लिए भी यात्राएँ करते हैं और जंगलों, समुद्रों यहाँ तक कि दूसरे ग्रहों पर जाकर आविष्कार करते हैं| नेता लोग राजनैतिक कारणों से तथा कभी-कभी मनोरंजन के लिए भी दूसरे प्रदेशों एवं देशों की यात्राएँ करते हैं| जो पूंजीपति वर्ग है वह अपने औद्योगिक साम्राज्य के विस्तार हेतु देश-विदेश की यात्रा करता है| इन सबके अतिरिक्त एक और मुख्य कारण है जिसकी वजह से मनुष्य यात्राएँ करते हैं वह है अपने रिश्तेदारों व प्रेमियों से मिलना एवं उनके सुख-दुख में शामिल होना|

आजकल समर्थ लोग पर्यटन (भ्रमण) में अधिक दिलचस्पी लेने लगे हैं जिसका मुख्य कारण मौज-मस्ती व मनोरंजन और देश-विदेशों की सुंदर वस्तुओं तथा स्थलों का दर्शन करना है| अतः पर्यटन एक उद्योग बन गया है| इन सब कारणों के अतिरिक्त मनुष्य की यात्रा करने के कुछ अन्य कारण भी हो सकते हैं परंतु इन सब में जो प्रमुख एवं मूल कारण हैं वे हैं, मनुष्य के जीवन अस्तित्व के लिए संघर्ष, बेहतर जीवन जीने की जिज्ञासा और अपने प्रियजनों से मिलने व उनके सुख-दुख में शामिल होने की इच्छा| ज्ञान प्राप्ति के लिए की गयी यात्राएँ, बेहतर जीवन जीने की जिज्ञासा के अंतर्गत ही आती हैं| इन यात्राओं में लगभग हर व्यक्ति शामिल है| परंतु चिंता की बात यह है कि इन को लोग कम महत्व देते हैं| जिनको अधिक महत्व दिया जाता है वे हैं धार्मिक,राजनैतिक, आर्थिक एवं मनोरंजन आदि कारणों से की गयी यात्राएँ| इन यात्राओं में काफ़ी कम लोग शामिल हैं|

इस प्रकार हम देख सकते हैं कि विभिन्न कारणों से मनुष्य की यह अनवरत यात्राएँ जारी रहती हैं| मनुष्य के जीवन की यात्राओं के प्रमुख व मूल कारण उसके अस्तित्व में आने के समय से लेकर आज तक बने हुए हैं अर्थात् आज भी हम मनुष्य के जीवन की हर युग की यात्राओं के मूल कारणों का अवलोकन कर सकते हैं| हमें नहीं पता कि इन कारणों में प्रमुख ‘मनुष्य के जीवन अस्तित्व के लिए संघर्ष’ का अंत कब होगा| लेकिन मैं इतना कहना चाहता हूँ कि इस पर हम सबको विचार करने की आवश्यकता है|

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