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मंत्रालय और मूत्रालय और जहाँ सोच वहीँ शौच

समान ध्वनि वाले दो शब्द आमतौर पर समानार्थी नहीं होते। लेकिन अगर आप थोड़ी कोशिश करें तो आप उन्हे एक जैसे अर्थ वाला बना सकते हैं। मोदी सरकार के वरिष्ठ मंत्री नितिन गडकरी ने यही किया। नतीजा ये हुआ है कि देश की जनता मंत्रालय और मूत्रालय को लगभग एक मानने लगी है। दोनो कुछ मामले में एक जैसे हैं, भी। मंत्रालय हो या मूत्रालय तलबगार को जल्दी से जल्दी अंदर दाखिल होने की बेचैनी होती है। केंद्र सरकार में जितने मंत्रालय हैं, नई दिल्ली के लुटियन जोन इलाके में लगभग उतने ही सार्वजनिक मूत्रालय हैं। हो सकता है, उससे दो-चार कम ही हों। स्वच्छता मिशन की शुरुआत के साथ बड़े पैमाने पर सार्वजनिक शौचायल सह मूत्रालयों के निर्माण की तैयारी शुरू हुई। लेकिन सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने इस सदी का सबसे मौलिक मूत्र चिंतन कुछ इस तरह पेश किया कि बात ही घूम गई। लोग कहने लगे कि गडकरी साहब को मंत्रालय से ज्यादा मूत्रालय की चिंता है और होनी भी चाहिए।

देशभर में यहां-वहां व्यर्थ बहती लवण धारा का मोल उनसे पहले सिर्फ मोरारजी भाई देसाई ने ही पहचाना था। पुराने जनता परिवार की मूत्र चिंतन धारा को गडकरी साहब ने आगे ही नहीं बढ़ाया बल्कि उसे एक नई वैज्ञानिक दृष्टि भी प्रदान की। प्राचीन मान्यता रही है—समय आये तरुवर फले केतक सीचो नीर। यानी पौधे अपनी रफ्तार से भी बढ़ेंगे चाहे कितना भी सींच लो। लेकिन गडकरी जी ने इस सदियों पुरानी इस मान्यता को अपनी वैज्ञानिक व्याख्या से ध्वस्त कर दिया। पौधा अगर पानी से सींचा जाये तो अपने समय से बढ़ेगा, लेकिन पानी की जगह मूत्र से सींचा जाये तो डेढ़ गुना ज्यादा रफ्तार से बढ़ेगा। गडकरी जी ने ये ज्ञान नागपुर में उन किसानों को दिया जो सूखे की समस्या का हाल बताने के लिए उनके पास आये थे। गडकरी जी ने कहा कि ये उनका आजमाया हुआ नुस्खा है। नई दिल्ली के उनके बंगले में जो हरी-हरी क्यारियां लहलहा रही हैं, वो सब मूत्र सिंचित है। पानी से सीची गई होती तो इतनी तेजी से नहीं बढ़ती। लेकिन मूत्र में यूरिया और नाइट्रोजन होता है, इसलिए पौधो को ज्यादा उत्तम पोषण मिलता है। गडकरी जी बकायदा मूत्र जमा करवाते हैं और फिर उससे सिंचाई करवाते हैं। पुराना दोहा याद आता है—कबीरा संगति साधु की, जो गंधी को बास। जो गंधी कुछ देत नाही तो भी बास सुवास। गडकरी जी नागपुर में रहें या विदेश में, दिल्ली में उनके अहाते की मूत्र सिंचित बेला, चंपा, जूही और चमेली की कलियां राहगीरों को सुवासित करती रहेंगी।

गडकरी जी का वैज्ञानिक अनुसंधान आनेवाले दिनों में कृषि ही नहीं बल्कि देश की राजनीति और भाषा-संस्कृति तक पर गहरा प्रभाव डालेगा। इन प्रभावों की विस्तृत चर्चा यहां संभव नहीं है। फिर भी एक-एक करके कुछ प्रभावों पर नज़र डालते हैं। अनुसंधान का शाब्दिक प्रभाव ये है कि अब किसी भी दल का कोई राजनेता राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में दावा नहीं कर पाएगा कि इस पार्टी को मैने सींचा है। ऐसा कहने पर उसे याद दिलाया जाएगा कि सींचना शब्द के मायने अब बदल चुके हैं। अगर आप यही कहना चाहते हैं तो स्पष्ट करके कहिये कि हां मैने पार्टी की सींचा है, लेकिन गडकरी जी के तरीके से नहीं। शाब्दिक प्रभाव से इतर गडकरी जी के अनुसंधान का राजनीतिक प्रभाव ये है कि बीजेपी का एक धड़ा विपक्ष पर हमले की तैयारी में जुट गया है।

इस खोज का हवाला देकर उन कांग्रेसियों को गिरेबान में झांकने के सलाह दी जाने लगी है, जो बीजेपी पर अक्सर पुरातनपंथी पार्टी होने का आरोप लगाते हैं। कुछ विशेषज्ञ देशभर में प्रतिदिन होनेवाले मूत्र विसर्जन के आंकड़े इकट्ठा करने में जुट गये हैं। इन आंकड़ों का देश की सिंचाई आवश्यकताओं से मिलान करने पर साफ हो जाएगा कि भारत के जीडीपी में गडकरी जी के अनुसंधान का किस हद तक योगदान हो सकता है। कुछ शुभचिंतक प्रधानमंत्री से इस बात की मांग करने लगे हैं कि गडकरी जी को लघु और सूक्ष्म सिंचाई का अतिरिक्त प्रभार दे दिया जाये। प्रधानमंत्री जी शायद मान भी जाते, लेकिन बदकिस्मती से लघु और सूक्ष्म सिंचाई राज्य सरकारों के अंतर्गत हैं। गडकरी जी की सिंचाई टेक्नोलॉजी की विश्वसनीयता पर किसी को संदेह नहीं है। लेकिन इसके दुरुपयोग की आशंकाएं भी हैं। मुंबई में खुले में मूत्र विसर्जन पर जुर्माना है। फर्ज कीजिये कोई पकड़ा जाता है, तो जुर्माना भरने के बदले वो दलील देगा—मैं तो सिंचाई कर रहा था। अगर मैं नहीं होता तो सड़क पर लगाये गये ये पेड़ कब के सूख गये होते। सड़क पर खड़े पेड़ के पास पाच साल से लगातार कान पर जनेऊ चढ़ाने वाले भी पर्यावरण संरक्षण के लिए पुरस्कार मांगेगे।

आखिर कितने लोगों को पुरस्कार देगी सरकार! ज्यादा बड़ी मुसीबत तब होगी जब अकबर रोड, हुमायूं रोड और अशोक रोड जैसे इलाकों से गुजरने वाली जनता सीधे मंत्रियों के बंगले के बाहर लगे पेड़ों को सीचने लगेगी। रोके जाने पर दलील दी जाएगी— आसपास कोई मूत्रालय तो है नहीं, सोचा मंत्रीजी की बगिया ही सींच दें। दिल्ली की हरियाली क्रेडिट ना मिलने पर अरविंद केजरीवाल केंद्र सरकार को कोसेंगे—`हमने पानी के दाम घटाये और आपूर्ति बढ़ाई,जनता ज्यादा पानी पीने लगी और अच्छी सिंचाई होने लगी। लेकिन हमें क्रेडिट कोई नहीं देता जी।‘ गडकरी जी के अनुसंधान का सबसे बड़ा ख़तरा इसके विस्तार में है। मूत्र सिंचित पौधे डेढ़ गुना ज्यादा तेजी से बढ़ते हैं। अगर अगली थ्योरी ये आ गई कि अपना खाद देने से पौधे तीन गुना ज्यादा तेजी से बढ़ते हैं, तो फिर क्या होगा? फिर तो राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन से ज्यादा बड़ा राष्ट्रीय खाद-पानी मिशन हो जाएगा। जहां सोच वहां शौचालय नारा बदल जाएगा। नया नारा होगा—जहां सोच वहीं शौच

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