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बेग़म एक हुकुम की उर्फ़ ब्लैक क्वीन – भाग ३

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झालरों की जगमगाहट दूर ही से बता देती थी कि ये शादी के उत्सव की चकाचोंध है। पूरी गली के सर पर पंडाल तना था। अप्रैल की चढ़ती गर्मी में शादी थी। उदास सी शाम हल्के-हल्के हाँफ रही थी और ऐसा लगता था जैसे आंधी आने के आसार हों।
किसी ने आवाज़ लगाई, अरे भई राजू जल्दी-जल्दी जाओ कल के लिए जनवासे का इंतजाम देखो। भई जितेन्दर कहाँ है अब? पता है किसी को।
अरे गोल कमरे में पत्ते खेल रहे हैं सब वही है।
अच्छा।
एक लड़की ने दरवाज़ा धकेला और कमरे में घुस गयी। उर्मिला सामने पलंग पर बैठी थी।
अरे सुधा! व्हाट ए सरप्राइज़, उर्मिला ने पलंग से कूदते हुए कहा। शादी कल है और तू आज आ रही है।
रिजर्वेशन ही बड़ी मुश्किल से मिला, वो भी अकेली का। सुधा ने कहा।
और जीजाजी?
कैसे आते, एक ही टिकट मिला कन्फर्म।
हाय!
जब-तक उसने हाथ-मुँह धोये तब-तक उर्मिला चाय ले आयी।
तुझे आज पूरे चार साल बाद देख रही हूँ, सुधा ने कहा।
हाँ, उन दिनों बड़े रेस्ट्रिक्शन हो गए थे मुझ पर।
दोनों सहेलियां बहुत देर तक बातें करती रहीं, नीचे से तैरते हुए आवाजें ऊपर चली आ रहीं थीं।
वो मारा, ये लो बेटा अब तो गयी हुकुम की बेग़म तुम पर, 12 पॉइंट्स का दंड लगेगा, फ़ाईन लगेगा तुम पर।
क्या खेला जा रहा है भई?
ब्लैक क्वीन, इसमें हुकुम की बेग़म जिस पर जाती है उसकी हार हो जाती है।
चाय का प्याला ट्रे में रखते हुए सुधा ने पूछा। और वो लड़का?
उसका तो कांड जितेन्दर भाई ने वहीं कर दिया था बंगलौर में। उर्मिला ने बड़ी सहजता से उत्तर दिया जैसे कुछ हुआ ही ना हो।
और पुलिस को क्या कहा तूने?
मैं मुकर गई, कह दिया मौसी के घर थी। मामला बिगड़ गया था बड़ा।
तू मुकर कैसे गयी उर्मिला?
जान से मार देते मुझे भी। देख आज भी शरीर पर निशान हैं मेरे, उर्मिला ने कोहनी की तरफ़ इशारा कर के कहा।
पर वो बेचारा तो जान से गया।
अब गया सो गया। अरे मुझे अपनी जान प्यारी थी। तू जानती नहीं क्या जितेन्दर भाई को।आंधी का सा मौसम हो रहा है, मैं एक-एक कप चाय और लाती हूँ तू ज़रा खिड़की बंद कर ले।इतना कह कर उर्मिला कमरे के बाहर चली गयी।
सुधा उठी और खिड़की पर जा खड़ी हुई। हवा में तेजी आ गयी थी, अगले तीन-चार मिनट में आंधी का आना निश्चित था। वो जब तक खिड़की बंद करती तब तक  हवा का एक तेज झोंका कमरे में घुस आया। उसने धूल-मिट्टी से बचने के लिए अपना मुँह फेर लिया।हवा के साथ कूड़ा-कर्कट भी फड़फड़ाता हुआ कमरे के अन्दर चला आया था। सुधा ने खिड़की बंद की तो देखा कि ताश का एक फटा पत्ता उड़ कर ड्रेसिंग टेबल के आईने से चिपक गया है। उसने जा कर पत्ता उठाया तो देखा की ये एक हुकुम की बेग़म थी।
हठात उसके दिल से निकला तुम जिसके भी पास रहीं उर्मिला उस पर दंड लगाती रहीं, फ़ाईन लगाती रहीं। उर्मिला तुम भी एक हुकुम की बेग़म हो उर्फ़ ब्लैक क्वीन, उसने कहा।
क्या? पीछे खड़ी उर्मिला ने पूछा।
कुछ नहीं, बस यूँ ही …………………………..

 

कहानी का भाग १ और २ पढ़ने के लिए दिए गए लिंक पर क्लिक करें

 

 

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