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बलूचिस्तान सिर्फ झगड़े का इलाका नहीं है!

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ईरान में चाबहार बंदरगाह और पाकिस्तान में ग्वादर बंदरगाह क्रमशः नई दिल्ली समझौते (2003) और चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरीडोर (सीपीईसी) के तहत बातचीत के महत्वपूर्ण बिंदु हैं। भौगोलिक और संसाधन मूल्य के अलावा, इन दोनों क्षेत्रों के बीच स्थित बलूचिस्तान  कुछ अनोखी सांस्कृतिक संभावनाएं पेश करता है जिससे भारत अपने सासंकृतिक और राजनैतिक शक्ति को और सुदृढ़ कर सकता है;

  1. ग्वादर पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में स्थित है। ‘बलोच’ लोग, जो पाकिस्तान और ईरान के 3.6% और 2% आबादी के अंतर्गत आते हैं, एक विविध संस्कृति के उत्तराधिकारी हैं जो इस्लाम, हिंदू धर्म, सूफीवाद, पारसीवाद और यहां तक ​​कि भारत-ग्रीक रिश्तों से प्रभावित है। प्राचीन सिल्क रोड मार्ग के करीब यह क्षेत्र प्राचीन और वर्तमान समय मे विभिन्न संस्कृतियों, विश्वासों और विचारों का चौराहा माना जाता है। यह भारत और पाकिस्तान के बीच सांस्कृतिक संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए एक उपयुक्त क्षेत्र है। यह ज़रूरी  नहीं की बलूचिस्तान सिर्फ लड़ाई का मुद्दा रहे।
  2. यह क्षेत्र आध्यात्मिक विविधता का प्रतीक भी है। बलूचिस्तान में जगद जननी माता के तीन रूप – नाना (कुशान वंश की देवी), इश्तार (मेसोपोतेमिया की देवी) और हिंगलाज (हिंदू धर्म की देवी) की पूजा की जाती है। हिंगलाज मंदिर हिंदुओं के लिए एक महत्वपूर्ण ‘शक्तिपीठ’ है, जिसका सुरक्षा मे कई बलोच मुस्लिम अपना एहम योगदान देते आये हैं। ये लोग हर वर्ष अप्रैल मे होने वाले चार दिवसीय तीर्थ यात्रा में भी भाग लेते हैं। इस तरह की धर्मनिरपेक्ष बंधन की बात-चीत आखिर क्यों नहीं होती? भारतीय और पाकिस्तानी प्रशासन से जुड़े कर्मियों को इस बात पर और ध्यान देना चाहिए।
  3. धर्म और संस्कृति के अलावा, दोनों देश की सरकारें इस क्षेत्र मे ग्रामीण स्तरीय कौशल विकास योजनायें भी लागू कर सकती हैं। हिंदुओं और बलोच पशुपालन और कृषि समुदायों की कर्मठता और अनुशासन को देखते हुए इस क्षेत्र में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) की स्थापना भी की जा सकती है जिससे अंततः भारत और पाकिस्तान दोनों को बड़ी मात्रा मे मुनाफा पहुंचेगा और दोनों देशों के बीच शत्रुता घटेगी।

हालांकि दोनों देशों के बीच क्लेश और भिड़ाव दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे हैं, दोनों देशों के नीति निर्माताओं, विदेश सचिवों और लोगों को शत्रुता छोड़ मित्रता अपनाना चाहिए। हाँ, इस तरह की आशा करना भी शायद कुछ लोगों के नज़र मे फ़िज़ूल सोच होगी लेकिन जब उम्मीद पर दुनिया कायम है तो क्यों ना उम्मीद की भावना से मनुष्यता का कल्याण हो ना की बर्बादी? अखंड अखंड से भी ज्यादा अखंड  मनुष्यता की आवश्यकता है। क्या यह सोच गलत है? आप बताएं!

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