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प्रदुषण से चाहिए आज़ादी!

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“जंगल-जंगल पता चला है, चड्डी पहेन के फूल खिला है”। मोगली और उसके जंगली दोस्तों के कारनामों से भरा यह गाना आज भी मन को उसी तरह भाता है जैसा यह आज से तकरीबन 20 साल भाता था। वाकई मे जंगल का दृश्य अध्बुध है। प्रकृति का यह अनमोल तोफा ना जाने मनुष्य को कितने सदियों से जीवित रख रहा है। लेकिन दुःख की बात है की लालच और क्रूरता मे लुप्त मानव ने वन-वातावरण को काफी ठेस पहुँचाया है। यदि हम अपने देश भारत की ही बात करें, तो वन आवरण की मात्रा गिरती जा रही है। पश्चिम बंगाल के मशहूर सुंदरबन जंगलों ने1986 से 2012 के बीच 125 वर्ग किलोमीटर मैन्ग्रोव वन खो दिए। आंध्र प्रदेश के कृष्णा-गुंटूर क्षेत्रों मे कम से कम 25000 तक वन क्षेत्र को परिवर्तित कर दिया गया है जिसका सीधा प्रभाव लोगों और मौसम पर पढ़ रहा है। घटते वन की वजह से तेंदुए और हाथी भी इंसान के क्षेत्रों मे घुसकर तांडव मचा रहे हैं। महाराष्ट्र और तमिल नाडू के कई जिलों मे लोग इन जानवरों के प्रकोप का शिकार हुए हैं। ऐसे मे क्या उपाय किया जाए?

दुनियाभर मे कई नीतियाँ और समझौते आपनाए गए। लेकिन यदि हम सबसे बड़ा और प्रभावशाली नीति की बात करें जिससे वन आवरण की मात्रा वाकई मे बढ़ जाए तो वह ‘बौंन चैलेंज’ होगा। इसके अन्तरगत विश्वभर मे विभिन्न देशों के नेताओं ने इस बात पर अपनी सहमति दी की दुनिया भर मे बंजर क्षेत्र और कम पेड़ वाले क्षेत्रों को फिर से 2020 तक 150 मिलियन हेक्टर और 2030 तक 350 मिलियन हेक्टर तक वनिकारित किया जाए। भारत ने इस समझौते के अंतर्गत 21 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र को वनिकरित करने का वादा किया है। इससे देश मे तकरीबन 100 करोड़ गाड़ियों से निकलने वाले कार्बोन डाई-ऑक्साइड की मात्रा मे गिरावट होगी।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विशेषज्ञों का कहना है की 21वी सदी के पहले 16 वर्ष पृथ्वी के जीवन काल मे सबसे गरम रहे हैं। ऐसे मे ज़्यादा पेड़ लगाना, जंगलों मे घटते वनिकरन को रोकना और पशु-पक्षियों के घर को स्वस्थ अवस्था मे रखना बहुत ज़रुरी है। आप और मैं इस कार्यक्रम मे भी अपना एहम योगदान दे सकते हैं। अपने घर पर यदि हम नियमित रूप से 10-15 पेड़ लगाये तो गर्मी मे भी शीतलता बरकरार रहेगी और ए.सी को चलाने की ज़रुरत भी नहीं होगी। नेहरु प्लेस मे स्थित पहारपुर उद्योग केंद्र इस हरित क्रान्ति की जीती–जागती मिसाल है। यहाँ ए.सी से ज़्यादा पेड़ हैं। तकरीबन 2500 पेड़ पूरे ऑफिस मे हवा को साफ और स्वच्छ रखते हैं। एक बार यदि समय मिले तो यहाँ पर ज़रूर जाईएगा। सूत्रों के अनुसार ऑफिस के अन्दर की हवा हिमालय की हवा का मुकाबला कर सकती है।

साथ ही सिग्नल पर इंजन बंद करना, सार्वजनिक परिवाहन का प्रयोग करना और कम्पोस्टिंग करने से भी हम पर्यावरण को काफी हद तक विनाश से बचा सकते हैं।

अंततः, जब तक मनुष्य प्रकृति से दूर भागता जाएगा, उसका विनाश निश्चित है। हमारी कोशिश इसके विपरीत रहनी चाहिए।

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