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पुरुष मानसिकता और नारी (भाग-१)

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दुनियाँ के अन्य देशों की तरह भारत में भी नारी के प्रति दुर्व्यवहार ,अत्याचार और बलात्कार की घटनायें आमतौर पर होती ही रहती है | ऐसी ही एक वीभत्स घटना भारत की राजधानी दिल्ली में 16 दिसम्बर 2012 को घटित हुई जिसमे 6 पुरुषों  के द्वारा एक 23 वर्षीय युवती (निर्भया) के प्रति भयानक क्रूरता के साथ दुर्व्यवहार किया गया और सामूहिक बलात्कार के बाद घायल कर मरणासन्न अवस्था में उसके एक मित्र के साथ बस से नीचे फेंक दिया गया था | इस घटना ने दिल्ली के साथ-साथ पूरे भारत को ही हिला कर रख दिया था | इसके विरोध में भारत में हर जगह तीव्र प्रतिक्रिया हुई थी | इस घटना के सभी 6 दोषियों को गिरफ्तार कर जेल मे बंद कर दिया था और उनमे से पाँच को मृत्युदंड की सज़ा सुनाई गयी तथा एक जो नाबालिग था बाल सुधार ग्रह में तीन वर्ष के लिए भेज दिया गया था | इस प्रकार की घटनाओं को रोकने के लिए भारतीय कानून में परिवर्तन भी किया गया | इन सबके बावजूद आएदिन इस प्रकार की घटनायें लगातार हो रही है |

इस घटना से प्रभावित होकर ब्रिटिश फिल्म निदेशक लेसली उडविन ने 2013 में तिहार जेल में बंद दोषियों का इंटरव्यू इस उद्देश्य से लिया कि नारी के प्रति पुरुष वर्ग की सोच , उसकी मानसिकता का अध्ययन किया जा सके | अभी कुछ दिन पहले लेसली उडविन ने इस घटना पर  आधारित दोषी मुकेश सिंह आदि के इंटरव्यू को दिखाते हुए एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म “इंडियाज़ डॉटर” बीबीसी द्वारा रिलीज़ कराई जो मीडिया द्वारा प्रसारित हुई | सोशल मीडिया के माध्यम से इसका तीव्र प्रसार हुआ जिसकी भारत में तुरंत प्रतिक्रिया हुई |  संयोग से भारत की संसद चल रही थी | सरकार ने इस डॉक्यूमेंट्री फिल्म  को पूरी दुनिया में बैन कराने के लिए कार्यवाही की | शीघ्र ही देश में विभिन्न विचारकों  , एक्टिविस्टो द्वारा फिल्म प्रसारित करने के पक्ष और विरोध में विचार आने लगे | इस फिल्म में ऐसा क्या  था कि इसने पूरे देश में हलचल  मचा दी ? मुख्य रूप से इस फिल्म निदेशक लेसली उडविन के द्वारा तिहार जेल में आरोपी मुकेश सिंह का इंटरव्यू जो नारी के प्रति पुरुष वर्ग की मानसिकता का द्योतक था विवाद का विषय बना | विचारकों का एक पक्ष यह मानता है कि इस फिल्म को दिखाने से देश की छवि खराब होती है तथा नारी जाति का अपमान होता है वहीं दूसरा पक्ष मानता है कि फिल्म दिखाने में कोई बुराई नहीं है | यह फिल्म दिखाई जानी चाहिए ताकि समाज में नारी को पुरुष वर्ग द्वारा एक खिलौना, मनोरंजन का साधन तथा पुरुष की संपत्ति समझने की जो उसकी मानसिकता है वह उजागर हो सके ओर इस विषय में वाद-विवाद प्रारंभ हो सके और कुछ ऐसा हल निकल सके जिससे नारी को उचित सम्मान का व्यवहार मिल सके और उसे सम्पत्ति  या खिलौना ना समझा जाये | इस मानसिकता की जड़ को खोज कर उसका निदान किया जाये |

निर्भया के पिता ने इस फिल्म को दिखाए जाने के विषय में अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि समाज को आइना दिखाने में क्या बुराई है ? हमारी समाज प्रणाली कि जो एक कड़वी सच्चाई है उसे स्वीकार करने के लिए हम तैयार क्यों नही है ? 6 मार्च 2015 को निर्भया के पिता ने टाइम्स औफ इंडिया को बताया कि हमारे समाज में क्या बुराइयाँ हैं यह जानने के लिए हम सबको फिल्म देखनी चाहिए | लोगों से यह पूछा जाना चाहिए कि क्या दोषियों को समाज में खुला घूमते रहने देना उचित है ?

जहाँ एक ओर कुछ लोग यह मानते हैं की वर्तमान वातावरण, पश्चिमी सभ्यता, सिनेमा जगत, प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया इस प्रकार की घटनाओं को फैलाने और बढ़ाने में सहयोग दे रहे हैं| दूसरे कुछ लोग जो इस घटना के दोषी मुकेश सिंह की मानसिकता के हैं चाहे वे बाप, भाई,समाज के तथाकथित प्रतिष्ठित लोग, नेता और धर्म के ठेकेदार ही क्यों न हों, इसमें लड़कियों और स्त्रियों को ही दोषी ठहराते हैं| लड़कियों और स्त्रियों को यह करना चाहिए, वह नहीं करना चाहिए| ऐसे कपड़े पहनने चाहिए वैसे नहीं, यह नहीं खाना चाहिए, शाम के समय या रात को अकेले घर के बाहर नहीं निकलना चाहिए| उन्हें पुरुष दोस्तों के साथ नहीं घूमना चाहिए आदि आदि|

मेरे विचारानुसार पुरुष वर्ग द्वारा स्त्रियों के प्रति दुर्व्यवहार अत्याचार और बलात्कार जैसी घृणित घटनाओं के लिए मुख्य कारण तो पुरुष की मानसिकता ही है परंतु स्त्रियों का दोष भी कम नहीं है| स्त्रियों का दोष यही है की पुरुष वर्ग द्वारा उनके लिए जो भी, जैसे भी सामाजिक नियम बनाए गये चाहे वह खाने के संबंध में हों, पहिनने के संबंध में हों, दिनचर्या के संबंध में हों, चलने, उठने, बैठने से लेकर विवाह आदि के संबंध में, पति के मर जाने पर कठोर विधवा जीवन जीने के संबंध में, आजीवन पति की दासी बनकर सेवा करते रहने के संबंध में, धन संपत्ति के विषय में, पति को परमेश्वर मानकर सदैव पूजा करते रहने आदि के संबंध में जो भी नियम बनाए गये हमारी माताएँ, बहिने (सभी स्त्रियाँ) बड़ी ईमानदारी से इन नियमों का पालन करती चली जा रही हैं चाहे वह उनके लिए कितने भी घातक क्यों न हों|

मैं मानता हूँ की अल्प बुद्धि वाले अथवा कुत्सित विचार वाले लोगों पर सिनेमा मीडिया आदि का कुछ प्रभाव पड़ता है| अश्लील साहित्य का भी प्रभाव नवयुवकों पर पड़ता है| पर इनसे कहीं अधिक प्रभाव तो उन विज्ञापनों का पड़ता है जो पूंजीपति लोग अपने पैसे के बल पर सामान बेचने के लिए लोगों की मानसिकता बदलने हेतु स्त्रियों व पुरुषों से अत्यंत कम व छोटे कपड़ों में और कभी-कभी तो नग्न शरीर के प्रदर्शन के माध्यम से करवाते हैं लेकिन उनको इन घटनाओं को बढ़ावा देने के लिए ज़िम्मेदार नहीं माना जाता|

क्रमशः भाग

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