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पापा की कलम

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शब्द मेरे पापा के होंगे

मैं पापा की कलम बनूँगी

रचना होगी मेरे पापा की

फिर मैं रचना खूब लिखूँगी

ईर्ष्या, द्वेष और नफरत को

हम जग से दूर भगाएँगे

छुआ-छूत और ऊँच-नींच का

भेद मिटाकर भाई चारा लायेंगे

धर्म, जाति का भेद मिटाकर

अमीर, गरीब मिटाएंगे

प्यार की सब कोई भाषा बोले

ऐसा सुंदरतम संसार रचूंगी

शब्द मेरे पापा के होंगे

मैं पापा की कलम बनूँगी

 

जहाँ पर होगी मां की ममता

और पिता का होगा प्यार जहाँ

भाई चारा भाव भी होगा

ऐसा रचूंगी मैं सारा जहाँ

नारी पुरुष बराबर होंगे

कोई न होगा भेद वहाँ

सब कोई सबकी करेगा इज्ज़त

मैं जग में अनुपम प्यार भरूंगी

शब्द मेरे पापा की होंगे

मैं पापा की कलम बनूँगी

 

मां, बहनों की जहाँ इज्ज़त होगी

और भाई का होगा प्यार जहाँ

ज्ञान की जहाँ पर बहेंगी नदियाँ

होगा गुरु-शिष्य का मान जहाँ

विद्या पाकर विद्यार्थी कोई

ना विद्या की अर्थी ढोयेगा

मेहनत से वह भी काम करेगा

और जग में नाम कमायेगा

जहाँ आनन्द का सागर होगा

ऐसा मैं संसार रचूंगी

शब्द मेरे पापा के होंगे

मैं पापा की कलम बनूँगी

 

मानवता को हर कोई पाले

और दानवता को दूर करे

मैं ही हूँ सभी कुछ यहाँ पर

ना कोई ऐसा गुरूर करे

मैं हूँ सबकी सब कोई मेरे

ऐसा मैं प्रचार करूँगी

‘प्रियम्वदा’ नाम है मेरा

मैं सबको सबका ‘किन्थ’ करूँगी

शब्द मेरे पापा के होंगे

मैं पापा की कलम बनूँगी

 

ना कोई होगा भ्रष्ट जहाँ पर

और भ्रष्टाचार का होगा नाम नहीं

लूट-पाट और आतंक का

जहाँ होगा बिल्कुल काम नहीं

बलात्कार और अत्याचार का

जहाँ पर होगा कलंक नहीं

मानव, मानव को बस मानव समझे

ऐसा मैं संसार रचूंगी

शब्द मेरे पापा के होंगे

मैं पापा की कलम बनूँगी

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