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नोटबंदी किसी बेवकूफी से कम नहीं!

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नोटबंदी को आज एक साल हो गया है। मानो कल ही की बात हो। पिताजी का स्कूटर थामे मै एक बैंक से दुसरे बैंक के चक्कर काट रहा था इसी उम्मीद मे की कुछ पैसे मिल जाएँ जिससे की दादी अपने दवाई खरीद सके, दूधवाले को पैसे मिल सके और कामवाली को समय पर तंखा मिल सके। मेरी हालत फिर भी देश के कई मज़दूर, फलवाले और किसानों से बेहतर है। प्रधान मंत्री मोदी के 8 नवम्बर वाले फैसले ने मानो घड़ी का काँटा रोक दिया हो। मोदी जी का कहना था नोटबंदी देश मे छुपे हुए काले धन को सामने लाएगी, आतंकी वित्तपोषण की कमर तोड़ेगी और आम आदमी की ज़िन्दगी बेहतर करेगी। लेकिन उस ऐतिहासिक फैसले के एक साल बाद, वास्तविकता काफी अलग है। हाल ही मे मैं एक प्रसिद्ध पत्रकार का विडियो देख रहा था। उन्होंने कई अखबारों के ख़बरों को दर्शाते हुए बताया की नोटबंदी से 15 लाख नौकरियां चली गई हैं। साथ ही सकल घरेलु उत्पाद (जीडीपी) मे 6.1 % की गिरावट हुयी है। 86% प्रसारित मुद्रा को अचानक से वैद घोषित करना किसी बेवकूफी से कम नहीं है। इसी साल जून मे भारतीय रिज़र्व बैंक ने यह घोषणा की कि 99% अवैध मुद्रा सिस्टम मे वापस आ गया था। आखिर इसका क्या मतलब है? क्या रात-राती लोग इमानदार हो गए? बिलकुल नहीं।

मज़े की बात यह है की इस पूरे हादसे मे कई राजनैतिक नेताओं एवं दलों और बड़े उद्योगपतियों को नोटबंदी की पहले से ही खबर मिल चुकी थी जिससे की उन्होंने पहले से ही तैयारी कर ली थी। पूरी प्रक्रिया मे यदि कोई घायल हुआ है, कोई मरा है तो वो गरीब और बेबस व्यक्ति ही है। हैरानी की बात यह है की काले धन को छिपाने के लिए कपटी लोगों ने भी कई तरह के पैत्रें अपनाए। जन-धन खातों मे पैसा जमा करने से लेकर 3-4 बार कतारों मे खड़े हकर पैसा जमा करने तक, कई तरह के जुगाड़ लगाये गए। जिस ‘डिजिटल इंडिया’ की बात मोदी जी करते हैं, कपटी लोगों ने उन्ही माध्यमों से काला धन देश-विदेश मे जमा करवाया है। आखिरकार नोटबंदी से हमे क्या मिला? बिगड़ी अर्थव्यवस्था, नौकरियों मे गिरावट और भ्रष्टाचार को बढ़ावत।

मेरे हिसाब से यदि मोदी जी अर्थव्यवस्था को वाकई मे बदलना चाहते हैं तो बेहतर होगा की आरबीआई गवर्नर के अलावा पूर्व गवर्नर रघुराम राजन की किताब ‘आई डू व्हाट आई डू’ से अपने आप को वाकिफ करें। मोदी जी को यह समझने की आवश्यकता है की मशहूर अर्थशास्त्री और लेखक अमर्त्या सेन के हारवर्ड ज्ञान, जिसके बदौलत उन्होंने नोटबंदी पर टिप्पणी की, वो भी ‘हार्डवर्क’ का ही नतीजा है।

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