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दिल मछली कांसे की – भाग – २

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घर के पिछली तरफ़ जहाँ रूथ और सोफ़ी का कमरा हुआ करता था उसकी खिड़की से स्कूल का मेन गेट दिखा करता था|उसने खिड़की खोली तो सामने ही स्कूल का बड़ा सा बोर्ड चमक रहा था| कितनी-कितनी बातें रूथ के मन में हलचल सी मचाने लगीं|

“ मॉम देखो सोफ़ी आज फिर मेरी स्कर्ट पहन के भाग गयी| अब मैं स्कूल कैसे जाऊँगी?”

“तुम उसका स्कर्ट पहन कर चली जाओ रूथ, एक ही साइज़ है हनी|”

“मॉम उसका नहीं उसकी| वो अपनी गंदी स्कर्ट बेड पर फेंक कर गयी है|”

“ओह! गॉड ये लड़की भी न टेंथ तक आ कर भी बच्ची बनी हुई है|”

“आप ही ने बनाया हुआ है ऐसा|”

“वो तुम से छोटी है रूथ|”

“व्हाट !! कितनी छोटी, सिर्फ सात मिनट सत्रह सेकंड| हम ट्विन्स हैं ये क्यों भूल जाती हो|”

“अच्छा-अच्छा !मुझे देर मत करो हॉस्पिटल के लिए और तुम स्कूल जा रही हो या नहीं?”

“जाऊँगी उसकी वही गन्दी स्कर्ट पहन कर|”

रूथ को अब तक याद है कितनी डांट पड़ी थी उसे स्कूल में स्कर्ट के लिए| कौन नहीं जानता था शहर भर में कि फ्रंसिस्कन नन्स का स्कूल कितना स्ट्रिक्ट है| उसने कॉफ़ी मग उठाया और बाहर लॉन में आ गयी| यही लॉन जो अब मिट्टी के मैदान सा हो गया है कभी सच का लॉन हुआ करता था,जिसमें लिली,बोगनवेलिया और भी जाने कितने फूल हुआ करते थे और पैर के नीचे घास| इसी लॉन में टिन शेड के नीचे कोने में उनकी साइकिल खड़ी रहती थीं| एक जैसी,ठीक उन्हीं की तरह जुड़वां | डैडी उन्हें नए खुले शो रूम से पहले ही दिन लाये थे| उन दिनों वो आठवीं में थीं| उसी साल डैडी की डेथ हुई थी| उसके बाद मॉम को उनकी जगह हॉस्पिटल में नौकरी मिली| धीरे-धीरे मॉम हॉस्पिटल की शिफ्ट्स पर ज्यादा और घर में कम रहने लगीं| ये वही दिन थे जब दोनों बहनें दोस्ती के गहरे बंधन में बंध रही थीं| इस घर से कितनी यादें जुडी थीं उसकी| यही घर जो कभी शीशे सा चमकता था, आज कैसा खंडहर सा हो गया है| रूथ ने आँख से बहता आँसू पोंछा| आज उसे डैडी की बहुत याद आ रही थी| आज होते तो सेवेंटी फोर के होते| मॉम-डैड में डैडी उसके ज्यादा क़रीब थे और मॉम सोफ़ी के| उसने उठ कर लॉन की लाइट बुझा दी और ड्राइंगरूम का दरवाज़ा खोल दिया| उसे ऐसा लगा जैसे पीछे से सोफ़ी ने आकर उसे जकड़ लिया हो, वो अक्सर ऐसा ही किया करती थी|

“ओके बाबा आई एम् सॉरी, मेरी वजह से तुमको सिस्टर की डांट पड़ी| प्रॉमिस आगे से तुम्हारी यूनिफार्म पहन के नहीं जाऊँगी|” सोफ़ी ने उसके गले में झूलते हुए कहा|

“ सोफ़ी छोड़ो, मेरा दम घुट रहा है|”

“ अच्छा चल डियाज़ के घर चलते हैं| उसकी मदर हर फ्राइडे प्रॉन नूडल्स बनाती हैं| आज भी बनाये होंगे| चल खा कर आते हैं|

“अच्छा!और डियाज़ की मॉम से क्या कहेंगे ??”

“तुम कुछ मत कहना, तुम बस साथ चलो |मैं कह दूंगी कि डियाज़ से ट्रम्पेट का कुछ सीखना है|”

“मैं फिर भी नहीं जाऊँगी|”

“व्हाई?”

“मुझे उसकी मॉम को देख कर हंसी आती है|”

“हैं???”

“याद नहीं एनुअल फंक्शन पर क्या पहन कर आयी थीं गाना गाने|”

“बी डिसेंट रूथ ,वो हमारी टीचर हैं|” कह कर सोफ़ी खिलखिला कर हंस पड़ी|

“ वैसे मुझे लगता है डियाज़ लाइक्स यू|”

“यक ……. आई डोंट लाइक हिम|”

“हाँ वैसे भी मुझे उसकी मॉम हुडुकचुल्लू सी लगती हैं, अगर तेरी मदर इन लॉ बन गयीं तो|” रूथ ने कहा|

“हाँ मदर इन लॉ ऐसी और हसबैंड बैंड के संग होटल, चर्च में ट्रम्पेट बजाता हो| छी-छी! एंड बाय द वे, व्हाट दिड यू से? कहाँ सीखा ये वर्ड?”

“लीला मिस से|”

“पूअर लेडी, बड़ी डीमोटीवेटेड लगती हैं मुझे वो|” सोफ़ी ने कहा|

“मे बी …. वरना कन्वर्ट हो कर क्रिश्चियन क्यों बनती|”

कभी-कभी मजाक में कही बात सच हो जाती है| सोफ़ी और डियाज़………..!, कल स्कूल जाऊँगी क्या पता कोई पुराना स्टाफ़ ही मिल जाये| हाउ टाइम फ्लाइज़| उसने सोचा|

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