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Crime Poetry Terrorism World

दरिंदगी

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This is my first post as an author of MSK. These lines I had written after the brutal attack on kids in Pakistan.

आज मौत मायूस बैठी है, आज मौत से भी भयानक गलती हुई है,

वोह चली और ले आई मासूम बच्चों को अपने साथ,
वोह बच्चे जो गए थे पढ़ने ना की मरने.
वोह बच्चे जो गए थे कुछ नया सीखने.

पेशावर की ऐसी घटना जो हर इंसान को सोचने पे मजबूर करती है इंसानियत की मौजूदगी.
ये सच है की आतंकवादी का कोई मज़हब नहीं होता, लेकिन इस घटना से ये भी साबित हो गया की आतंकवादी इंसान भी नहीं होता. यहाँ तक की जानवर भी इनसे भले होते हैं.

आँखों में सपने लिए गए थे बच्चे हर रोज़ की तरह, क्यों उन मासूमों के सपने उजाड़े, ये कोई बताये ज़रा.
कोई भागा, कोई कूदा, कोई छुपा, किसी ने मरने का नाटक किया तो कइयों की साँसे थम गयी.
हैवान हैं मारने वाले इन्हे, क्या गलती थी उनकी, मारा है इन दरिंदो ने जिन्हे.

खून से सनी लाशें, खून में भीगे उनके कपडे और जूते अपने आप में ही मातम सा माहौल बनाते हैं.
फटी किताबें. खून के धब्बे दीवारों पे, फर्श पे, फर्श पे, कुर्सियों पे एक साथ चीख रहे हैं और बदला मांग रहे हैं.
सिपाहियों की वेशभूषा में आतंकवादी, कौन विश्वास दिलाएगा इन मासूमों को की सिपाही अच्छे होते हैं.

अम्मी घर में बैठे इंतज़ार कर रही थी अपने लाल का, वहां लाल, लाल रंग में डूबी हुई जन्नत की सैर के लिए निकल पड़ा था.
अब्बु गए थे अपने चाँद के टुकड़े को पाठशाला से लेन, और ले ए उसकी लाश अपनी बाहों में.

मारने वाले इस्लाम का नाम लेते हैं, वोह मज़हब जिसकी क़ुरान-ए-शरीफ में बच्चों और औरतों को मारना गुनाह है.
अब तो बस यही ख़याल आता है की क्या मारने वालों के खुद के बच्चे नहीं होंगे, क्या मारने वाले खुद कभी बच्चे नहीं होंगे.

अल्लाह जवाब दे अब…….

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