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डूसू चुनाव मतलब,विधान-सभा की हार की कुंठा, जीत का बेहयापन

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डूसू चुनाव( दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ ) के विज्ञापन राजनीतिक पार्टियां एफएम चैनलों पर भी देने लगे हैं. पूरी दिल्ली तो पोस्टर्स, किऑस्क, बिलबोर्ड से तो पहले ही पाट दिया है. फिलहाल इससे पैदा होनेवाले कचरे और खर्च की जानेवाली रकम पर बात न भी करें तो भी ये सवाल तो है ही कि आपको नहीं लगता राजनीतिक दलों ने इस चुनाव को विधान सभा चुनाव की ट्वंटी-ट्वंटी बना दिया है.

जो विधान सभा में बुरी तरह हार गए वो अपनी कुंठा इसके जरिए निकाल रहे हैं और ये एहसास कराने की कोशिश कर रहे हैं कि इसे जीत लिया तो समझो दिल्ली पर कब्जा और जो जीत गए उनका शक्ति प्रदर्शन, बड़बोलापन रॉक शो और पहले से की गई घोषणा- हम जीत रहे हैं, की शक्ल में दिखाई दे रहा है. निगम पार्षद की टिकट, विधान सभा की राजनीति की लांचिग पैड और लोकसभा चुनाव की जमीन के तौर पर देखे जानेवाले इस डूसू चुनाव में यूनिवर्सिटी के सवाल कहां है? क्या ऐसा नहींं है कि डीयू की जमीन पर लड़े जानेवाले इस चुनाव में खुद डीयू कहीं नहीं है और राजनीतिक दलों के शक्ति प्रदर्शन और लिटमस पेपर अखाड़ा बनकर रह गया है.

क्या एक विश्वविद्यालय का छात्रसंघ चुनाव सचमुच इतना बड़ा होता है कि उसके चुनावी प्रचार के लिए राजनीतिक दल विधान-सभा चुनाव जितने पैसे खर्च करे और वो भी बिना तर्क के ? कुछ नहीं तो एफएम चैनलों की ऑडिएंस और डूसू चुनाव के लिए मतदान करनेवाले छात्रों की संख्या का सही-सही आकलन कर लें तो अंदाजा लग जाएगा कि इस चुनाव को कैसे जांघ पर हुई दाद-खाज के पीछे पूरे शरीर को इंगेज करने का काम किया है. आज जबकि राष्ट्रीय स्तर की राजनीति स्टैंड अप कॉमेडी में तब्दील हो गई हो, वहां एक विश्वविद्यालय के चुनाव को ऐसी भयानक शक्ल दिया जाना, आपको हैरान नहीं करता.ठीक उसी तरह जैसे मैनेजमेंट और पीआर कंपनियों के बूते लड़े जानेवाले विधान सभा, लोकसभा चुनाव में उनके नहीं होते जिनकी तरक्की के लिए चुनाव जीते जाते हैं.
( तस्वीर साभारः न्यूज24 ऑनलाइन)

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