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चीनी मिट्टी- रेशम पानी – 2

माई की जै, माई की जै ……… हर ओर से उठती आवाज़ें उसके अंदर सिरहन पैदा कर रही थीं। उसने अपनी पसीजी हथेलियों को देखा फिर एक दूसरे में यूँ चिपका दिया जैसे सामने बैठी भीड़ को नमस्कार किया हो। पंडाल में दूर-दूर तक औरतें क़तार की क़तार दम साधे माई को सुनने के लिए बैठी थीं।

इतनी भीड़ देख कर वो सकपका गई,सोचा की भाग जाए पर दुनिया को ठगने वाली यूँ ज़रा सी भीड़ देख भाग जाये तो उसकी बरसों की ट्रेनिंग पर लानत होगी।

काली किनारी की सफ़ेद तांत में उसने खुद को सामान्य से अलग दिखने का एक प्रयास किया था और जिसमें वह सफल भी हो गयी थी। कम उम्र सी एक अद्भुत चमक थी उसके चेहरे पर ,जैसे शांत निर्मल ईश्वर की छाया पड़ गयी हो। पर वो जानती थी ये कमाल उसके प्रसाधन भोगी हाथों का है।

ऊंचे तख़्त पर बैठ कर उसने एक नज़र सामने डाली,एक हुजूम को अपने सामने नतमस्तक देख उसके आत्मविश्वास की पतवार वापस तन गयी। उसने सधी आवाज़ में कहना शुरू किया।

“प्रेम हर मस्तिष्क में एक गर्भाशय रोप देता है। इस गर्भाशय में अनगिनत यादें संतति के रूप में पनपती रहती हैं। प्रेम सफल तो अच्छी,सुखद यादों की संतान जन्म लेती है और अगर असफल तो बुरी,दुखद यादों की संतान जन्म लेती है। प्रेम में संतति का जन्म निश्चित है और संतति कैसी हो ये प्रेम की सफलता-असफलता पर निर्भर करता है।”

भीड़ दम साधे सुनती रही उसे। कहीं पत्ता भी खड़कने की आवाज़ नहीं थी। गूँज रही थी तो बस माई की आवाज़। उसने देखा उसके शब्दों का जादू चल गया और सब मंत्रमुग्ध से जड़ हो गए हैं। वो झटके से उठी और मुड़ कर वापस अंदर चली गयी। ये नयी अदा सीखी थी आजकल उसने, एक रहस्य का माहौल तैयार करो और फिर सबको उस आवरण में छोड़ कर निकल जाओ। पीछे जय-जयकार की आवाज़ गूंजती रहे।

अंदर कमरे में उसने देखा कि चक्कूमल मेज़ पर चढ़ कर बैठा हुआ है।

“आओ! बहुत बढ़िया बोला तुमने। जै-जै की आवाज़ यहाँ तक आ रही है। ”

“थक गयीं।”

“हूँ ”

“अच्छा, आओ यहाँ बैठो मेरे पास। “उसने मेज़ पर एक तरफ खिसकते हुए कहा।

“नहीं ठीक है, पहले ज़रा ये मेकअप उतार लूं। ”

“एक सलाह दूं। ”

“क्या?”

“यूँ ही प्रेम का पथ दिखाती जाओ लोगों को,भला होगा का।”

बालों में से जूड़ा पिन निकालते-निकालते हाथ एक दम रुक गए उसके,चेहरे पर हल्की विद्रूप की लहर आई और आँखों में ठहर गई।

“क्या बचता है बाद में बवंडरों के,आँधियों के,बगूलों के  …… ? कुछ भी नहीं सिवाय होठों पर रेत और हलक़ में चटकती प्यास के  ……. खुलूस के नाम पर पंडित जी आप लोगों को प्यार की सीख बांटते हैं यानि की बवंडर बांटते हैं,आंधी बांटते हैं,बगूले बांटते हैं,प्यास बांटते हैं। मुझे इसलिए आप की दो कौड़ी की नसीहतों में राई-रत्ती भी इंट्रेस्ट नहीं पंडित जी।”

जानते हो ये प्रेम हल्की डोरियों की तरह पीठ पर कसा होता है। धीरे-धीरे ये डोरियाँ घिस जाती हैं, बदरंग हो जाती हैं,टूट जाती हैं ……. एक बार ये टूटीं तो कोई भी दर्ज़ी इनका टांका नहीं जोड़ सकता।इनके टूटने से पीठ और छाती दोनों का नंगापन चमकने लगता है। कोई बिरला ही अपनी पीठ पर ये डोरियां कसी रख पता है। कोई बिरला ही प्रेम निभा पाता है चक्कूमल।

लाउड स्पीकर से आता शोर अब थम गया था।  नेपथ्य का जय-जयकार भीड़ के साथ विदा ले चुका था। अब यूँ लगता था मानो वो दोनों ही अकेले छूट गए हो यहाँ और बाकी सब परिधि लांघ गए हों।

“ज़रा चारमिस तो पकड़ाना।” उसने कहा।

“तो फिर हम साथ क्यों हैं?उसने क्रीम पकड़ाते हुए पूछा।

“प्यार के लिए। ”

“मतलब?”

“मतलब कि हम अपनी ज़रूरतों को प्यार का नाम पहना देते हैं। हम अपनी सुविधा के लिए अलग-अलग चीज़ों को एक दूसरे पर आरोपित कर देते हैं।”

“कैसी ज़रूरतें ?”

“देह की, पैसों की,हंसने-बोलने की, कपडे-लत्तों की,खाने-पीने की। एब्सकोंडर हैं हम तुम, भगोड़े हैं अपने-अपने जीवन से। मैं एक शादीशुदा लड़की जो अपनी नीरस उबाऊ शादी से भाग आई धोखाधड़ी करके, वो तो भले लोग थे कि कोई तमाशा नहीं किया उन्होंने। और तुम गणित के मास्टर जो चार ट्यूशन भी नहीं जुटा पाया अपने लिए। अब थक-हार के पिता की पंडिताई को ही आगे बढ़ा रहे हो न। बोगनबेलिया के कई-कई रंग वाले फूलों को एक साथ सजाने से कहीं इंद्रधनुष बनता है,उसके लिए धूप-पानी की ज़रुरत होती है। मैं और तुम खेत-मंडवे की मिट्टी और पोखर का पानी हैं जिन्हें अपने ऊपर,अपने असली रंग-रूप पर बेतरह शर्म है,इसलिए जो अपने ऊपर ‘चीनी मिट्टी-रेशम पानी ‘ का मुलम्मा चढ़ाये रखते हैं। हमारी ज़िंदगी मेटाफ़र पर टिकी है। हम हर बीतते क्षण,बीतते पल जीवन के पुराने बीते हुए या बीतने वाले बदरंग हिस्से को किसी न किसी काल्पनिक सुंदर चीज़ से बदल देते हैं। तुम मेरे झुर्रियों वाले चेहरे को चाँद कहते हो और मैं तुम्हारी साँसों को आग की लपट। पर जानते हो चक्कूमल मैंने तुम्हें कभी नहीं बताया कि तुम्हारी सांसें कितनी ठंडी हैं और तुम कितने बुरे खर्राटे लेते हो। पता है मैं जब जब तुम्हारे रुकी एक दिन भी इन आवाज़ों की वजह से सो नहीं पाई। न ही तुम ने ही कभी कहा की ये झुर्रियां मुझे बदसूरत बना रही हैं। ”

“हम फ्रॉड हैं बेहतर हो एक-दूसरे को छोड़ दुनिया को ठगें …… ये चाँद-वाँद छोडो और असल ज़िंदगी में लौट आओ पंडित जी। ”

“अच्छा !तुम्हारा लेक्चर ख़त्म हो गया हो तो सोने चलें।”

“नहीं, थक गई हूँ ,आज यहीं अपने कमरे में सोऊँगी। चलो बाय , गुड नाइट। ”

“बाय। ”

एक सुबह वो भाग गई, सब ले कर फ़रार, उसके सर पंडाल और होटल का खर्च और बटुए में सात हज़ार रुपये छोड़ कर। अब चाहे वो घर जाये या चीज़ों का बिल चुकाए।

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