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चीनी मिट्टी – रेशम पानी – 2

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जून के नौ तपे के बाद भी अब तक रातें अब तक लू के असर से दहक रही थीं। ऐसी ही एक गर्म और अँधेरी रात में वो पराये,अंजान शहर में भटक रहे थे,जैसे अज्ञातवास में छुपे पांडवों को ढूंढ रहे हों। रिक्शे पर बैठे नानकमल शुगर ने इधर-उधर देखा,माथे पर आया हल्का पसीना कुर्ते की बांह से पोंछा और आँखें अँधेरे में यूँ गड़ा दीं मानो समय के पार झाँक रहे हो।

रात के निविड़ अँधेरे में निस्पंदित चुप्पी कभी-कभी किसी जुगनू की चमक से स्पंदित हो उठती थी। थोड़ी देर बाद ही सही पर नानकमल शुगर की आँखें उस अँधेरे में चीज़ें देखने की अभ्यस्त हो गयीं। कुछ दूर ईंटों की एक लम्बी मीनारनुमा चिमनी के पास एक बल्ब टिमटिमा रहा था, और कहीं पास से पानी के तेज बहने की आवाज़ आ रही थी। परिवेश से परिचित होने के बाद उन्होंने एक बड़े दरवाज़े के पास रिक्शा रुकवा लिया।

“क्यों भैया तेलमील कम्पाउंड का लड़कियों का हॉस्टल ये ही है?”

“है तो ये ही, पर किससे मिलना है पंडित जी?” चौकीदार ने पूछा।

“हमाई बिटिया है यहाँ।”

“नाम?”

“कीर्ति  ……. कीर्ति शुगर नाम है। ज़रा बुलवा देओ भैया। ”

“पंडित जी इतनी रात में तो लड़कियों से कोई मिल नहीं सकता, सुबह मिलना अब।”

“तो अब रात में कहाँ वापस जाईं हम ?”

“कहुएं नाईं, यहीं बैठो हमाई बेंच पे। ”

“अच्छा ये इतनी जोर का पानी कहाँ बह रहा है भैया?”

“ये सामने जो देख रहे हो पंडित जी ये गत्ता फैक्ट्री है, गत्ता गलाया जाता है यहाँ,सो वाई का गन्दा,सड़ा पानी बहता रहता है। ”

“काम तो इहाँ अच्छा है तुम्हारे शहर में। ”

“तुम कहाँ के रहने वाए हो पंडित जी?”

“मुज़फ्फ़र नगर।”

“ह्म्म्म्म्म्म्म, तम्बाकू खाओ पंडित जी ?”

नहीं,तुम्ही खाओ, हमने तो सालों हुए छोड़ दी। ”

“खायलो पंडित जी मैनपुरी की कपूरी है,अच्छे-अच्छे तरसते हैं इसके लिए। ”

“अच्छा लाओ चुटकी भर खिला दो फिर। ”

“एक बात बताओ पंडित जी ?”

“क्या?”

“ये शुगर कौन पंडित होते हैं ?पहली बार सुन रहे हैं। ”

“नईं भई वो तो हमाए बाप शुगर मिल में मुलाजिम थे तो गाँव-खेड़ा में शुगर के नाम के नाम से बुलाये जाने लगे। ”

“अच्छा, राजेश पायलट की तरह….हीहीही। ”

“सुनो क्या हम सो लें इस बेंच पर?”

“सोओ-सोओ पंडित जी हम तो वैसे भी राउंड लगाने जा रहे हैं। ”

अगली सुबह का सूरज बड़ी देर से निकला या पंडित नानकमल शुगर देर तक सोते रहे। देर गए जब उठे तो पूरा हॉस्टल लड़कियों के रंग-रूप से गुलज़ार था,पर एक वो ही नदारद थी जिसे ढूंढने वो बड़ी दूर से इस देहरी पर आ खड़े थे। दिन से दोपहर हुई,और अब तो दोपहर भी साँझ में ढलने को तत्पर दीख रही थी। बैठे-बैठे पंडित जी अब ऊबने लगे थे, और यूँ भी सुबह से लेकर अब तक उनकी कई बार पड़ताल की जा चुकी थी।

वो अनमने से बैठे थे कि एक लड़की उनके सामने आ खड़ी हुई।

दोनों ने एक-दूसरे को देखा और बीच में आये समय के लम्बे आठ सालों के अंतराल को पार कर के लड़की ही पहले बोली।

“बड़े पंडित जी आप?”

“पहचान लिया बिटिया, हम तो सोचे थे कि जेन इतने सालों बाद पहचानोगी भी या नहीं। ”

“कहिये, कैसे आना हुआ?”

“तुम्हारी मदद चाहिए।”

“कैसी ?”

“तुम चलो हमारे साथ वापस और चल कर पुराना काम संभाल लो। ”

“तो मेरे पास क्यों आये हैं ? चक्कूमल से कहिये, वो तो पहले ही संभाल रहे थे काम को,या साध्वी के आने से ग्लैमर आ जायेगा प्रवचनों में। ”

“वो कहाँ रहा अब। ”

“मतलब ”

“तीन साल हुए पीलिया बिगड़ गया था। बचा नहीं पाये। ”

“ओह !”

दुःख की एक छाया चेहरे पर ज़रा देर रुक कर वापस लौट गयी। पल भर में ही वो अपने रंग में लौट आयी।

“ये तो आज पहली बार देख रही हूँ बड़े पंडित जी, कि बछड़ा मर जाये तो गैया खुद मेमने को दूध पिलाने चली आये। ”

वो सकपका गए।

“चल के गद्दी सम्भाल लो तुम।”

“मैं ऐसे नहीं जा सकती पंडित जी।” कुछ देर चुप रह कर वो बोली। “क्यों?”

“यहाँ मुझ पर एक केस चल रहा है। पुलिस को सत्तर हज़ार चाहिए उसे रफ़ा-दफ़ा करने को। आप इंतज़ाम कर दो तो मैं इससे फ़ारिग हो कर साथ चल लूंगी, और हाँ आगे इसके बाद जो मुनाफ़ा वो फ़िफ्टी-फ़िफ्टी।ये सत्तर हज़ार अगल है पंडित जी, ये वापस नहीं होगा। “

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