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गांधी और हिन्दू धर्म पर एक सोच

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‘अहिंसा’ और ‘सत्याग्रह’ ऐसे घटक हैं जो सार्वभौमिक तौर से महात्मा गांधी के साथ जुड़े हुए हैं। एक आध्यात्मिक व्यक्ति होने के साथ, गांधी के हिंदू धर्म के प्रति विचार पारंपरिक हिंदू अनुष्ठानों से अलग थे;

  1. गांधी ने रस्मों और प्रथाओं की सदस्यता नहीं ली, जो हिंदू शास्त्रों मे एक एहम भूमिका निभाती है। उन्होंने बिना शर्त के वेद या भगवद गीता जैसे ग्रंथों की पक्षता भी नहीं ली। गौतम बुद्ध की तरह, गांधी ने ग्रंथों में दी गई सीख पर सवाल उठाने से संकोच नहीं किया। जो ‘अहिंसा’ और ‘सत्याग्रह’ की कसौटी पर खरा नहीं उतरता था, गाँधी उसे कबूल नहीं करते थे। इस व्यव्यहार ने गांधी को हिंदू कट्टरपंथियों का मुख्य प्रतितिद्वंदी बनाया।
  2. गांधी ने जाति व्यवस्था को पूरी तरह से अस्वीकार नहीं किया। इसके अंतर्गत, वह साधारण ब्राह्मण को ‘बेहतर ब्राह्मण’ बनाना चाहते थे। गांधी के मन मे ‘ब्राह्मण’ वो ‘आत्माएं’ थीं , जिन्होंने अपनी बाधाओं को छोड़ समाज मे पिछड़े अछूतों, जिन्हें गांधी ‘हरिजन’ कहते थे, उन्हें भी स्वीकार करने का संकल्प किया। कर्म ना की जन्म- यह गांधी के मूल सोचों मे से एक थी। उस वक़्त जब ज़्यादातर हिन्दू समाज जन्म-सिद्ध लक्षणों के आधार पर विभाजित था, गांधी की यह सोच अपने आप मे क्रांतिकारी थी। जब हिन्दू समाज मे जातिप्रथा और कुसंस्कार की परंपरा अपनी चरण सीमा पर थी, गांधी के इस सोच ने विवेकशील हिन्दुओं और अन्य धर्मों के लोगों को साहस और प्रेरणा दी।
  3. गांधी ने भगवद गीता को एक पाठ के रूप में चित्रित करने की कोशिश की जो ‘अहिंसा’ और ‘सत्याग्रह’ के आदर्शों को शामिल करता है। गांधी गीता में मौजूदा पात्रों की ‘वीर पूजा’ को बढ़ावा देने के खिलाफ थे। उदहारण तौर पर गांधी ‘कृष्ण’ को एक दिव्य चरित्र के बजाय एक ऐतिहासिक व्यक्ति के रूप में प्रचलित करना चाहते थे। गीता को एक अलग दृष्टिकोण से सोच गांधी ने ‘अनासक्तियोग’ नामक लेख भी लिखा। इसमे उन्होंने गीता मे उपस्थित ‘अहिंसा’ और ‘सत्याग्रह’ के मूल तत्व को उजागर करते हुए पाठक से निवेदन किया कि ‘इन्हीं दो तत्वों का परिपालन कर मनुष्य मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है।’

गांधी के विचार, क्रांतिकारी और आधुनिक होने के बावजूद, आधुनिक भारतीय के लिए सही हैं और हर एक व्यक्ति को इस पर विचार करना चाहिए। हालांकि अंत में गाँधी को कट्टर नाथूराम गोडसे ने गोली मार दी फिर भी आज के संदर्भ में उनके शब्द और आदर्श उतने ही ज़रुरी हैं जितने यह उनके जीवनकाल मे थे। भारत मे प्रचलित आरएसएस और विहिप यदि इन आशयों पर वाकई मे अमल करती है तो भारत धर्म निरपेक्षता और आधुनिकता की नई मिसाल कायम करेगा।

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