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गरीबी हटायेंगे लेकिन कैसे?

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आज ‘अंतर्राष्ट्रीय गरीबी हटाओ दिवस’ है। संयुक्त राष्ट्र ने आज से ठीक पच्चीस साल पहले आज के दिन को इस नेक कार्य के लिए चुना था। पिछली सदी शायद मानवता के लिए सबसे भीषण और दर्दनाक समय रहा है। दो विश्व युद्ध, परमाणु हमलों, ‘कोल्ड वौर’ जैसे संकटमय क्षणों के अलावा कई गुलाम देशों को आज़ादी मिली। अफ्रीका, एशिया और दक्षिण अम्रीका के कई देशों ने स्वतंत्रता की सांस ली। लेकिन इसी स्वतंत्रता के साथ इन देशों के प्रशासन और लोगों को गरीबी, भूखमरी और पिछड़ेपन का सामना करना पड़ा। अगर अपने देश भारत की बात करें तो दो मुल्कों के बटवारे से कई लोग बेघर, अनाथ और बर्बाद हुए। अफ्रीका के जो देश आज़ाद हुए वहाँ भी मानवाधिकारों का कई बार उल्लंघन हुआ। कुछ देशों मे ऐसी समस्या आज तक उपस्थित है।

हाल ही मे प्रकाशित ‘वैश्विक भूख सूचकांक 2017’ के अनुसार अफ्रीका के ज़्यादातर देश भूखे हैं। उप-सहारा अफ्रीका मे कुपोषण से मरने वाले बच्चों की संख्या मे भी कोई बदलाव नहीं दिखा है। 2007 से लेकर 2017 तक कुपोषण की संख्या 22 प्रतिशत से कम नहीं हुई है। आतंकवादी संगठन जैसे की बोको हारम, अल-शबाब, आईएसआईएस के गतिविधियां भी बढ़ती गरीबी का मुख्य कारण है। इसके अलावा प्राक्रतिक हादसे जैसे कि बवंडर, भूकंप, बाढ़ एवं बढ़ती गर्मी के प्रकोप ने भी दुनिया के लगभग सभी देशों पर अपना कहर बरसाया है। हाल ही मे मेक्सिको मे आये हुए भूकंप, विएतनाम मे तूफ़ान खानून और अफ्रीका मे बढ़ती सूख ने भी लोगों के जीवनशैली को काफी हद तक प्रभावित किया है।

ऊपर दिए गए ज़्यादातर मामलों आर्थिक असमानता, भ्रष्टाचार और लालच से उत्पन्न हुए हैं क्योंकि जब तक जीवन व्यापन के लिए पर्याप्त रोटी, कपड़ा, मकान और नौकरी नहीं होगी, तब तक आतंकवाद और असमानता का चक्रव्यूह चलता रहेगा। इसको मद्दे नज़र रखते यदि सरकार और जनता दिए हुए सुझावों पर गौर फरमाए तो यह लाभदायक साबित होगा। यह ध्यान रखना आवश्यक है की गरीबी सिर्फ एक चीज़ नहीं बल्कि कई विषयों से तालुकात रखती है। इसमे से कुछ एहम विषयों पर सुझाव प्रस्तुत करने की कोशिश की गई है;

1. खेतीबाड़ी के मामले को लेकर काफी गरमा-गर्मी चल रही है। क़र्ज़-माफ़ी से लेकर भारी छूट से लेकर तकनीकी हस्तक्षेप तक सरकार घटती उत्पादकता के मामले को कई तरीकों से सुलझाने की कोशिश कर रही है। लेकिन भारत और अन्य देशों के लिए जैविक खेतीबाड़ी ही अच्छी आमदनी और भरपूर उत्पादन का एकमात्र रास्ता है। भारत मे यदि सिक्किम ‘पूर्ण जैविक खेतीबाड़ी’ का खिताब हासिल कर सकता है तो और सब राज्य और देश भी इसे हासिल कर सकते हैं। यदि प्रसिद्ध पर्यावारंविद जैसे की वंदना शिवा, एम्. एस स्वामीनाथन एवं सुन्दरलाल बहुगुणा के सुझावों और अनुसंधान पपेरों पर केंद्रीय सरकार अपना पूर्ण योगदान दे तो देश मे खुशियाली और वास्तविक हरित क्रान्ति लाना असंभव नहीं है।

2. महिला शिक्षा पर अब भी कई देशों की प्रतिक्रिया बेकार रही है। ‘वैश्विक लिंग अंतर सूचकांक 2017’ के अनुसार अब भी कई अफ़्रीकी और एशियाई देशों मे महिलाओं का राजनैतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों और योजनाओं मे हिस्सा बहुत कम या ना के बराबर रहा है। यदि भारत की बात करें तो महिलायों के लिए आर्थिक अवसर, शिक्षा और स्वास्थय प्रणाली तक पहुँच बेहद कम है। 144 देशों की सूची मे भारत पूर्वकथित मुद्दों पर 136 वे, 113 वे और 142 वे स्थान पर है। जब तक महिलाएं के साथ समान व्यवहार नहीं किया जाएगा, तब तक प्रगति सिर्फ कहने की बात रह जायेगी। आरक्षण से भी ज्यादा आवश्यक है महिलायों के लिए सकारात्मक आर्थिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक योजनायें बनाना और उन पर पूरी सख्ती और निष्ठा के साथ अमल करना। ‘सुकन्या समृद्धि योजना’, ‘बेटी बचाओ, बेटी पढाओ’ योजनाओं तभी असरदार होंगी जब इन पर काम किया जाए। इस सन्दर्भ मे भारत और कई अन्य देश आइसलैंड के 1975 महिला क्रांति और महिला भागीदारी योजनाओं से सीख सकते हैं। ‘वैश्विक लिंग अंतर सूचकांक’ मे आइसलैंड लगातार 6 साल से सर्वप्रथम देश रहा है।

3. बढ़ती आबादी को नियंत्रण करने के साथ यह भी ज़रुरी है की आम जनता के पास काम करने के पर्याप्त मौके हों। ‘विश्व बैंक’ के अनुसार अब भी भारत मे 58% लोग रोज़ 3.10$ यानी करीब 200 रुपये से भी कम कमाते हैं। अब भी श्रम शक्ति खेतीबाड़ी (47%) पर केन्द्रित है। इसको ठीक करने के लिए आवश्यक है कि नौकरी बाज़ार मे वृद्धि हो। ज्यादा स्तार्तुप्स को बढ़ावा देना सही है लेकिन इसके साथ स्थिरता भी आवश्यक है। हाल ही मे ‘आर्थिक  सहयोग और विकास संगठन 2017’ के सर्वेक्षण के अनुसार 30% भारतीय युवा के पास अब भी नौकरी हासिल करने के लिए ज़रुरी शिक्षा या अनुभव नहीं है। भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन, क़र्ज़ मुक्त कंपनियां और सुदृढ़ मौद्रिक प्रणाली इसके लिए आवश्यक हैं। इस सन्दर्भ मे यदि हम वर्त्तमान सिंगापुर के निर्माता ली कुआन यु के प्रशासनिक और राजनैतिक जीवनकाल से मदद लें, तो वाकई मे कई बहुमूल्य सीख मिलेंगे।

आखिरकार गरीबी प्राकृतिक नहीं, एक कृत्रिम आविष्कार है। ऊपर दिए गए सुझाव तभी असरदार होंगे जब पूरी निष्ठा, दृढ़ता और इमानदारी से वे लागू किये जाएँ।

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