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क्या यौन चर्चा देश हित से अलग है?


हाल ही मे सरकार ने निर्देश जारी करते हुए कहा कि सुबह 6 बजे से रात 10 बजे के बीच टीवी पर कंडोम विज्ञापन प्रसारित नहीं किये जा सकते। सरकार ने यह घोषणा अभिनेत्री सनी लियोनी की ‘अश्लील विज्ञापन’ के सन्दर्भ मे की थी। सरकार का यह तर्क था की इस तरह के विज्ञापन से बच्चों पर बुरा असर पड़ेगा और उनमे गलत खयालात उत्पन्न होंगे।

जब अश्लीलता के अलग-अलग मापदंड हैं, यह सोचने की बात है कि सरकार ने किस मापदंड को ध्यान मे रखा है? संभव है की उपर्युक्त विज्ञापन मे ‘वस्त्रहीन तस्वीर’ और ‘यौन प्रक्रिया के विविध रूप’ दिखाए गए हों, लेकिन क्या एक विज्ञापन की वजह से ‘सुरक्षित यौन’ के मुद्दे पर लगाम लगाना सही है? यदि राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (एनएसीओ) को असुरक्षित यौन से जुड़ी बीमारियों पर धारावाहिक या योजना की घोषणा करनी हो तो वर्तमान स्तिथि के रहते क्या वह ऐसा कर पाएगी? यदि ‘जनसँख्या नियंत्रण’ पर कोई गैर-सरकारी या उद्योग संगठन कंडोम के लाभ को दर्शाती हो, क्या वह ऐसा कर पाएगी?

टीवी पर ना सही, लोग अपने मोबाइल फ़ोन और कंप्यूटर पर यौन सम्बन्धी जानकारी हासिल कर सकते हैं, लेकिन क्या सरकार की इस तरह की प्रक्रिया चिंता का विषय नहीं है? प्रसारित दर्शक अनुसंधान परिषद (बीएआरसी) के अनुसार भारत मे कुल 20 करोड़ टीवी देखने वाली जनता है जो की निरंतर बढ़ रही है। क्या ऐसे मे ज़रुरी मुद्दे पर पाबंदी लगाना सही है?

जब भारत मे बढ़ती जनसँख्या धीरे-धीरे एक मुसीबत बनती जा रही है, क्या चुप्पी धारण करने मे समझधारी है? बिलकुल नहीं! अनियमित जनसँख्या को रोकने की आवश्यकता है। सुरक्षित यौन से सम्बंधित विज्ञापन का प्रसारण और भी ज़रुरी है। विश्व स्वास्थय संगठन (WHO) के 2015 के  सर्वेक्षण के अनुसार भारत अनचाही गर्भावस्था से जूझ रहे देशों मे सबसे ऊपर था। 2014 मे छत्तीसगढ़ मे अनियमित गर्भपात की प्रक्रिया से 13 औरतों की मौत हुयी थी। ऐसी अवस्था मे कंडोम की ज़्यादा उपलब्धि देश हित मे है। भारतीय प्रसारण विषय शिकायत परिषद (बीसीसीसीआई) के नियमों मे यह कहीं नहीं लिखा की एक ‘अश्लील विज्ञापन’ के चलते आप सभी सूचनात्मक प्रसारणों पर भी पाबंदी लगा दें।

कंडोम नसबंदी, खतरनाक गर्भपात की प्रक्रिया और गर्भ निरोध गोलियों के मुकाबले एक सस्ता, असरदार और सुरक्षित तरीका है। इस पर पाबंदी ना लगाकर सरकार को इस मामले पर खुलकर बात-चीत और वाद-विवाद करना चाहिए। इस वक़्त भारतीय शिक्षा प्रणाली और समाज को ‘यौन शिक्षा’ की बहुत ज़्यादा ज़रुरत है। जहाँ पर रोज़ अखबार मे बलात्कार, यौन शोषण, यौन हिंसा और इससे जुड़ी अन्य गतिविधियों बढ़ती चली जा रही हैं, ‘सुरक्षित यौन’ प्रबुद्ध भारत की जीवन-शैली मे एक चर्चित मामला होना चाहिए। इस पर डॉक्टरों  कानूनी सलाहकार, शिक्षा विशेषज्ञ, धार्मिक गुरु, गैर सरकारी संगठन इत्यादि सब को मिलकर काम करना पड़ेगा।

सुरक्षित यौन भी किसी मौलिक अधिकार से कम नहीं है!

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