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कट्टरपंथी सोच भारत के लिए खतरनाक है

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हाल ही मे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) मे छात्रायों के शान्ति धरने पर पुलिस की एक ही प्रतिक्रिया थी- लाठीचार्ज। जब छात्राएं अपने एक सहेली के ऊपर यौन उत्पीड़ण, बिगड़ती सुरक्षा प्रणाली, शरारती तत्व, गुंडागर्दी और लिंग भेदभाव से जुड़े कई एहम मुद्दों पर विश्वविद्यालय के कुलपति से बातचीत करने की अपेक्षा की तो उन पर लाठियों की बौछार हुई। दुःख की बात है की शिक्षा और आध्यात्मिकता के इस मंदिर मे इस तरह की बर्बरता का सामना छात्रों को करना पड़ा। प्रमुख न्यूज़ संगठनों ने तहकीकात कर पाया की विश्वविद्यालय मे लिंग भेदभाव रोज़मर्रा की बात हो चुकी है।

लड़कियों को रात के 8 बजे के बाद होस्तेल्स के बाहर जाने की अनुमति नहीं है जबकि लड़कों को है, लड़कियों के हॉस्टल मे मासाहारी खाना उपलब्ध नहीं कराया जाता जबकि लड़कों पर ऐसी कोई पाबन्दी नहीं है। यहाँ तक लड़कियों को पुस्तकालय के अन्दर भी नियमित समय तक ही पढ़ने की अनुमति है जबकि लड़कों पर ऐसी कोई पाबन्दी नहीं है। उससे भी ज़्यादा हैरानी की बात यह है की लड़कियों को होस्तेल्स मे इन्टरनेट सुविधा भी नहीं दी गई है जबकि लड़कों पर ऐसी कोई रोक नहीं है।

यह सब तथ्य सुनकर लगता है मानो विश्वविद्यालय 20वी सदी के नियमों से बाहर ही नहीं निकला। इन सभी के बीच आरएसएस संगठनों पर सभी की नज़रें गड़ी हैं। जब कुछ वरिष्ट पत्रकारों ने विश्वविद्यालय की छात्रायों से बात की तब ‘नैतिक पोलिसकरण’ या ‘Moral Policing’ का मुद्दा भी सामने आया। विश्वविद्यालय के प्रशासन पर कट्टरपंथी सोच का आरोप भी बताया जा रहा है।

आखिरकार, यदि सामान्यता की बात की जाए, तो वे सब पर लागू क्यों नहीं की जाती? यदि आज़ादी के साथ जिम्मेदारियों की सीख दी जाती है तो क्या वह सीख लिंगानुसार तय किया जाएगा? BHU कुलपति गिरीश चन्द्र त्रिपाठी ने ऊपर दिए गए सभी आरोपों का खंडन करते हुते बयान दिया कि, “BHU कभी भी लिंग भेदभाव मे विश्वास नहीं करता। जनतंत्र वातावरण BHU की एक मुख्य परिभाषा है।” चूँकि त्रिपाठी जी की नियुक्ति मोदी सरकार के अंतराल मे हुई थी, उन पर भी आरएसएस के ‘कट्टरपंथी’ विचार धारायों से प्रभावित होने और ‘भारतीय संस्कृति’ के हेतु BHU छात्रायों को ‘अनुशासित’ करने का आरोप है।

देश की राजधानी नई दिल्ली मे भी महिला संगठन ‘पिंजड़ा तोड़’ ने दिल्ली महिला विभाग को चिट्ठी के माध्यम से छात्रायों के साथ हो रहे लिंग भेदभाव के ऊपर रौशनी डाली। इसके तत्पश्चात विभाग ने 23 विश्वविद्यालयों को नोटिस भेजते हुए अपनी नाराज़गी जताई। दिल्ली विश्वविद्यालय के होस्तेल्स मे भी BHU की तरह माहौल है।

दक्षिण भारत के केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय मे लिंग भेदभाव इतना तीव्र है की यदि किसी छात्रा ने पढ़ाई के खातिर भी हॉस्टल आने मे देरी की, तो उससे ‘क्षमा पत्र’ देना पड़ता है। इसके साथ हॉस्टल वार्डन और मैट्रन की ‘तहकीकात’ भी शामिल है जो की कई बार मानसिक उत्पीड़न से कम नहीं है। कर्फ्यू का समय 8 बजे है जिसका उल्लंघन करने पर दोषी छात्रा को सख्त सज़ा भी मिलती है। महिला छात्रायों अपने बीच मलयालम मे मज़ाक करती हुयीं कहती हैं कि, ‘वेगम! कूत्तिल केरन संयम आई’ यानी ‘जल्दी करो! पिंजरे मे घुसने का वक़्त हो गया है।

यदि विश्वविद्यालयों मे ‘कट्टरपंथी’ सोच अपना गढ़ बना लेते हैं, तो ‘बातचीत’, ‘वाद-विवाद’ और ‘अन्य विचाधारा’ जैसी आदर्श ख़त्म हो जायेंगे। यह अति-आवश्यक है कि सरकारी संगठन एकता और सामान्यता की बात को सिर्फ बोलकर नहीं करके दिखाएँ। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी लिंग-भेदभाव के विरोध मे महिला संगठनों ने अनोखे रास्ते अपनाए हैं। इरानी पत्रकार मसीह अलिनेहाड ने ‘मेरी गूढ़ स्वंतंत्रता’ नाम की ऑनलाइन साईट का निर्माण किया जिसमे उन्होंने सार्वजनिक स्थानों पर ‘हिजाब’ पेहेन्ने या न पेहेन्ने की इच्छा औरतों को देने का आग्रह किया है। उनके इस प्रस्ताव से कई इरानी औरतों को हौसला मिला और उन्होंने बिना हिजाब के अपने तस्वीर भी साईट पर अपलोड किये और अपनी आजादी का जश्न मनाया। टर्की मे भी सार्वजनिक स्थानों पर महिलायों पर काफी पाबन्दी है। इसको मद्दे नज़र रखते एक महिला संगठन ने ‘Süslü Kadınlar Bisiklet Turu’ अथवा ‘ फैंसी वीमेन ओन बाइक्स’ नामक एक अभियान की शुरुआत की जिसमे उन्होंने ‘टर्की’ के पितृत्व संस्कृति का विरोध किया। रंग- बिरंगे पोशाक पहन साइकिल पर सवार, यह महिलाएं अपने अस्तित्व का प्रमाण देना चाहती हैं। इनका तरीका वाकई मे काबिलेतारीफ है।

भारत मे भी यदि इस प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं, तो इससे ज़रूर महिलाओं को बढ़ावा मिलेगा और वो और भी सक्षमता के साथ मर्दों के साथ कदम से कदम रख देश की उन्नति मे भागीदार बन सकेंगी। किसी भी देश की प्रगति के लिए लिंग सामान्यता एक मौलिक तथ्य है।

 

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