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ऐसे संस्कार दो

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संस्कार दो,

मानव को, ऐसे संस्कार दो ॥

जिसमें जाति – जाति भेद मिटे,

धर्म – धर्म भेद मिटे,

देश – देश सीमा टूटे,

प्रांत – प्रांत एक हो ।

संस्कार दो,

मानव को, ऐसे संस्कार दो ॥

 

क्षेत्र – वाद ख़त्म हो,

राष्ट्रवाद ख़त्म हो,

भाषावाद भाव मिटे,

मानववाद प्रसार हो ।

संस्कार दो,

मानव को, ऐसे संस्कार दो ॥

 

आर्थिक लोभ मिटे,

सामाजिक भेद मिटे,

राजनीति मोह मिटे,

मानव को मात्र प्यार दो ।

संस्कार दो,

मानव को, ऐसे संस्कार दो ॥

 

प्यार ही धर्म हो,

प्यार ही मर्म हो,

प्यार ही कर्म हो,

बस प्यार ही प्यार दो ।

संस्कार दो,

मानव को, ऐसे संस्कार दो ॥

 

जहाँ न कभी नारी का शोषण हो,

जहाँ न कभी अत्याचार पोषण हो,

मारकाट, लूटपाट और आतंक का,

बंद ये बाज़ार हो ।

संस्कार दो,

मानव को, ऐसे संस्कार दो ॥

 

घृणा, द्वेष, ईर्ष्या का नाश हो,

ऊँच – नीच, छुआछूत, ग़रीब – अमीर विनाश हो,

जिसमें विश्व बंधुत्व का भाव हो,

ऐसा नया संसार दो ।

संस्कार दो,

मानव को, ऐसे संस्कार दो ॥

 

जहाँ शिक्षा समान हो,

जहाँ शिक्षक महान हो,

गुरुदक्षिणा में शिष्य से अंगूठा माँगे,

न कोई ऐसा गुरु द्रोणाचार्य हो ।

संस्कार दो,

मानव को, ऐसे संस्कार दो ॥

 

जहाँ न कोई हैवान हो,

जहाँ न कोई शैतान हो,

मानव, मानव को बस प्रेम करे,

मानव, बस मात्र इंसान हो ।

संस्कार दो,

मानव को, ऐसे संस्कार दो ॥

 

मनुष्य जिससे स्वतंत्र हो,

समता विकास करे,

भ्रातृत्व भाव बड़े,

मानवता का कल्याण हो ।

संस्कार दो,

मानव को, ऐसे संस्कार दो ॥

 

मानवीय मूल्य बढ़े,

सुसंस्कृति प्रसार हो,

‘किन्थ’ भावना जगे,

ऐसा अनुपम प्यार दो ।

संस्कार दो,

मानव को, ऐसे संस्कार दो ॥

मानव को बस प्यार दो,

उसे ऐसे संस्कार दो ॥

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