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एपीटीएन, रॉयटर और हाँ टाइम्स नाउ का बाप

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पूरे देश का मीडिया जिस ललित मोदी के पीछे पड़ा है, वही ललित मोदी ट्विट करके मीडियाकर्मियों को बता रहे हैं कि तुम्हारे बॉस ने अपने फायदे के लिए तुम्हारी वो कई सारी स्टोरी दबाकर बैठ गए जिसमे उनका नफा-नुकसान छिपा था..ऐसे मीडिया को लात मारो और हमें ज्वायन करो.

आपको याद है आज से कुछ महीने पहले अरविंद केजरीवाल भी इसी तरह के स्वयंभू ब्यूरो, न्यूज एजेंसी हो गए थे और ऐसा माहौल पैदा करने की कोशिश की थी कि लोगों को मेनस्ट्रीम मीडिया की स्टोरी बेहद फीकी लगने लगी थी. कभी रिलांयस इन्डस्ट्रीज का काला चिठ्ठा लेकर प्रेस रिलीज जारी करते, कांफ्रेंस करते तो कभी बिजली कंपनियों के खिलाफ सड़क पर उतरते लेकिन आज देखिए कि एक तरफ ये शख्स मीडिया का सबसे बड़ा विरोधी और उसी मीडिया में सबसे ज्यादा विज्ञापन छपवाने वाला मुख्यमंत्री बन गया.

ललित मोदी मीडिया को जो ललकारने का काम कर रहे हैं और खुलेआम बता रहे हैं कि अपने फायदे के लिए संस्थानों के बॉस ने स्टोरी दबा दी, संभव है इसमे सौ फीसद सच्चाई हो और ऐसा नहीं है कि टेलीविजन-अखबार देखते-पढ़ते आप और हम महसूस नहीं करते लेकिन अगर आप गौर करें तो मेनस्ट्रीम मीडिया को गैरजरुरी और लाचार बनाने का तरीका बदला है. ये कहने के बजाय कि मीडिया जो कुछ दिखा रहा है, गलत है..ये कहना फैशन में आ गया है कि हम जो बता रहे हैं, उसके आगे मीडिया में आयी खबरें कुछ भी नहीं. 

आप कह सकते हैं कि भारत में इसके जनक अरविंद केजरीवाल हैं जो कभी विकीलिक्स बनने की कोशिश कर रहे थे और अब ललित मोदी ने उनकी कॉपी करनी शुरु कर दी है..हां जिसकी अंडरटोन ये है कि ज्यादा मुझ पर हाथ डालने की कोशिश की तो एक-एक को इसी ट्विटर पर नाप दूंगा..केजरीवाल की तरह हमे बांस-तंबू, माईक जुटाकर प्रेस कांफ्रेस करने की जरुरत भी नहीं पड़ेगी.

अब जो भी चर्चा में है, इस आत्मविश्वास के साथ है कि मीडिया चलाना और उसे चराना उसकी क्लिक भर की दूरी पर है.

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