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एक बम की अभिलाषा: फीट भगत सिंह

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यह पंडित जी का फैसला था की असेंबली में बम फेंकने भगत नहीं जायेगा. और झुंझलाये हुए सुखदेव को समझ नहीं आ रहा था की दल का सबसे बेहतर प्रवक्ता कैसे और क्यों नहीं जायेगा. उसने भगत पर मोहब्बत का इलज़ाम लगाया पर भगत ने मोहब्बत के इलज़ाम को झूठा ठहराया.

पर भगत सुखदेव की झुंझलाहट को समझ रहा था और कहीं जनता था की सुखदेव जायज़ बात कर रहा है. इसलिए पंडित जी के लाख मन करने के बावजूद वह असेंबली बम काण्ड का हिस्सा बन गया.

अब असेंबली में जाने से पहले वह रणनीति तय कर रहे थे. सबके साथ बैठे थे. टेबल पर कुछ बम रखे हुए थे जिनमे से दो उन्होंने उठाने थे. भगत ने अपनी बात पूरी करि और कुछ देर के लिए सन्नाटा हो गया.

उसी सन्नाटे में एक बम ने अपने दिल की बात कही, अपनी अभिलाषा व्यक्त की.

उस अंदाज़ ए बयान का क्या कहना
सब सुनते हैं खामोशी से

महफ़िल मैं अभी है सन्नाटा
पर तूफ़ान छुपा है हर दिल मैं

बेपर्दा हुए अरमान सभी
जो कैद थे दिल की धड़कन मैं

पर खौफ ए खुलासा क्यों हो जब
इकराम ए निगाह आशिक़ की है

वाकिफ है दिल ए उषाक से वह
बारूद की है पहचान उसे

चिंगारी लिए वह हाथों मैं
आतिश की तमन्ना रखता है

एक लौ को तलाश रहा है वह
जो आगाज़ ए विस्फोट करे

उस लौ मैं फन्ना होने की तमन्ना
हम दिल मैं दबाये बैठे हैं

हूँ राख मुझे यह खौफ नहीं
यह तो मेरा मंसूबा है

अरमान है तो बस इतना सा
की रौशनी का आगाज़ हो जब
हो कत्ल अँधेरा लाज़मी है

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